नाटक ‘अवरुद्ध बचपन’ का प्रभावी मंचन                                        

Read Time:5 Minute, 38 Second
Page Visited: 74
नाटक ‘अवरुद्ध बचपन’ का प्रभावी मंचन                                        

प्रस्तुति देख भावुक हुए दर्शक  

अवरुद्ध बचपन- एक समीक्षात्मक रिपोर्ट

रमेश शर्मा,रंगकर्मी  

शाद्वल@बीकानेर। कला साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, राजस्थान के सहयोग से रंगकर्मी सुरेश आचार्य के निर्देशन में नाटक “अवरुद्ध बचपन” की प्रस्तुति देख दर्शक भावुक हो गए! बांग्ला लेखक सुकमल मोइत्रा की कहानी पर आधारित नाटक में दिखाया गया है कि देश में बच्चों के मानसिक और शारीरिक शोषण के कारण उनका बचपन अवरुद्ध हो रहा है। जिस उम्र में बच्चों के गुड्डे, गुड़िया और खिलौने से खेलने की होती है तब ये शोषित बालक घर, दुकान, फैक्ट्री आदि में मजदूर बन चुके हैं। नाटक की मुख्य पात्र ‘दिया’ की भी यही त्रासदी है। उसके मालिक और मालकिन उसे अपने घर में बंद करके मेले में चले जाते हैं। दिया उस बंद घर में अपने गांव को, अपने घर को, अपने दोस्तों को और प्रकृति को याद करके दुखी होती है। दिया मलिक के घर में उसके साथ हो रही शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाओं के कारण स्वयं को मालिक के घर से बाहर आज़ाद करने की लोगों से गुहार लगाती है।  

‘दिया’ के किरदार के अलावा, अभिनेत्री प्रियंका आर्या ने कई अन्य भूमिकाओं में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को भावुक कर दिया। अभिनेत्री रिद्धिमा आचार्य व गुंजन उपाध्याय ने भी नाटक में अपने अभिनय से प्रभावित किया।

दरअसल एक-पात्रीय नाटक में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि मुख्य कलाकार को दूसरे कई किरदारों, जो मंच पर शारीरिक रूप से मौजूद नहीं होते, को इस तरह से निभाना होता है कि दर्शकों को उनकी मौजूदगी का एहसास हो। एक बेहतरीन एक्टर या एक्ट्रेस की पहचान इस बात से होती है कि वे कितनी आसानी से एक किरदार से दूसरे किरदार में ढल जाते हैं। अपनी बॉडी लैंग्वेज, हाव-भाव और बोलने के अंदाज़ को बदलते हुए, और साथ ही हर रोल की खास ज़रूरतों के हिसाब से उसे पूरी तरह से निभाते हैं। यही कारण है कि इस नाटक में अभिनेत्री प्रियंका आर्या ने दिया के मुख्य किरदार के अलावा बाकी सभी काल्पनिक किरदारों को अपनी शानदार अदाकारी से जीवंत कर दिया!   

21 जून, 2026 को श्री नरेंद्र सिंह ऑडिटोरियम में मंचित नाटक “अवरुद्ध बचपन” में संगीत मोहित शर्मा ने दिया, प्रकाश प्रभाव दीपांशु पांडे और ध्वनि प्रभाव वसीम राजा का रहा। नाटक के प्रदर्शन प्रभारी वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप भटनागर थे।

नाटक का संगीत प्रभाव किरदारों को वातावरण देने में सहायक रहा!         नाटक में मोहित शर्मा द्वारा गाया गया गीत नाटक की विषय वस्तु को सार्थक करता है, सीमित साधनों के बावजूद दीपांशु पांडे का नाटक में प्रकाश-प्रभाव प्रभावशाली रहा।

एक अभिनेता होने की नाते मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव भी है कि यदि आपको किसी एक-पात्रीय नाटक में मंच पर उतरना है तो सबसे पहले उस नाटक का कथानक अत्यधिक प्रभावी और समसामयिक होना आवश्यक है ताकि नाटक के पहले 5 मिनट में ही आप दर्शकों को नाटक के प्रवाह में अपने साथ बहा ले जाएं। वैसे देखा जाए तो वन एक्ट प्ले में  निर्देशक और स्वयं अभिनेता कई पहलुओं जैसे संगीत, संवाद बोलने का तरीका और दूसरे किरदारों को गढ़ना (जिसमें उनका चरित्र-चित्रण और बॉडी लैंग्वेज शामिल है)—पर काफी मेहनत करनी पड़ती है। साथ ही, उन्हें बिना किसी स्टेज प्रॉप्स के इस्तेमाल के, सिर्फ़ अपनी एक्टिंग के ज़रिए ये सारी बातें दर्शकों तक पहुँचानी होती हैं।

सशक्त कथावस्तु ओर समकालीन प्रासंगिकता के साथ एक अच्छे अभिनेता को चुनौती देने वाले कुछ चुनिंदा एक-पात्रीय नाटकों में, डॉ नंदकिशोर आचार्य का नाटक गांधी, मानव कौल का शक्कर के पांच दाने (त्रासदी), आशीष पाठक का संक्रमण, सुरेश आचार्य का फिर ना मिलेगी जिंदगी’ आदि हैं, जो खेले जाने चाहिए।                   

0 0
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %