वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप

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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप

मधुबाला शर्मा, जयपुर

अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।  

नान्हों सो अमरचो चीख पड़्यो, राणा रा सोयो दुख जाग्यो।।  

हूँ लड़्यो घणो, हूँ सह्यो घणो, मेवाड़ी मान बचावण नै।  

हूँ पाछ नहीं राखी रण में, बैरयां में खून बहावण में।।

यह कविता वीर शिरोमणि, राजस्थान के सपूत, मेवाड़ की धरा के देदीप्यमान सितारे, प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप के विषय में है। राजपूतों की सर्वोच्चता एवं स्वतंत्रता के प्रति दृढ़ संकल्पवान वीर शासक एवं महान् देशभक्त महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। महाराणा प्रताप महान् व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी देशभक्ति एवं अपार वीरता के कारण ही आज भी हम सभी उनका सम्मान करते हैं।

*महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम संवत 1597, ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया तदनुसार 9 मई, 1540 ई. को कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था।* प्रताप की माता का नाम जैवन्ता बाई था। इनके पिता का नाम महाराणा उदयसिंह था। महाराणा प्रताप को बचपन में ‘कीका’ के नाम से पुकारा जाता था। उन्हें बचपन से ही अच्छे संस्कार, अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान और धर्म की रक्षा की प्रेरणा अपने माता-पिता से मिली थी।

प्रतापी महाराणा प्रताप गुहिल राजवंश के एक ऐसे देदीप्यमान रत्न थे, जिन्होंने बप्पा रावल, महाराणा कुंभा और राणा सांगा की वीरता एवं शौर्य को विरासत के रूप में प्राप्त किया था। उनके पितामह राणा सांगा का लोहा राजस्थान में ही नहीं, सम्पूर्ण भारत में माना जाता था। प्रताप ने अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलकर भारतीय इतिहास में एक अनूठा अध्याय जोड़ा।

सन् 1572 ई. में जब प्रताप गद्दी पर बैठे, तब चित्तौड़ पर अकबर का अधिकार था। गद्दी पर बैठते ही राणा प्रताप ने सभासदों के सामने माँ भवानी की शपथ लेकर कहा, “सुनो, मेवाड़ के सूरमाओ! आज मैं माँ भवानी की शपथ लेकर एक प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक चित्तौड़ पर विजय नहीं पा लूँगा, चैन से नहीं बैठूँगा। तब तक धरती पर सोऊँगा और ऐसा भोजन करूँगा, जो पराधीन को मिलता है।” यह कठोर प्रतिज्ञा सारे मेवाड़ में घर-घर गर्व के साथ कही और सुनी गई। राणा प्रताप ने मेवाड़ में नई आशाओं का सूरज चमकाया और राजपूती शासन का जो इतिहास राणा सांगा के काल में था, उसे जीवित किया।

सादा जीवन और दयालु स्वभाव वाले महाराणा प्रताप की वीरता और स्वाभिमान तथा देशभक्ति की भावना से मुगल सम्राट अकबर भी बहुत प्रभावित हुआ था। जब मेवाड़ की सत्ता महाराणा प्रताप ने संभाली, तब आधा मेवाड़ मुगलों के अधीन था और शेष मेवाड़ पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए अकबर प्रयासरत था। राजस्थान के कई परिवार अकबर की शक्ति के आगे घुटने टेक चुके थे, किन्तु महाराणा प्रताप अकबर के आगे नतमस्तक नहीं हुए और अडिग रह कर आक्रमणकारियों से अनवरत संघर्ष करते रहे।

महाराणा प्रताप का एक घोड़ा था, जिसका नाम था—चेतक। वह सफेद रंग का था। ऐसा सफेद, जैसा हंस होता है। पूरा पाँच फीट ऊँचा था। वह जितना सुंदर था, उतना ही ताकतवर भी था। बड़े-बड़े नदी-नालों, ऊँची-ऊँची कँटवाड़ों को कूद जाना उसके लिए मामूली बात थी। वह गज़ब का फुर्तीला था। जिस समय चलता ऐसा मालूम होता, मानों मोर बादलों की घटा को देखकर नाच रहा हो। वह इतनी तेज दौड़ता, मानों हवा से बातें कर रहा हो। महाराणा प्रताप को वह घोड़ा अपने प्राणों से भी प्यारा था। वे उस पर जी-जान से न्यौछावर थे। वे कभी-कभी सोचने लगते कि जब यह घोड़ा नहीं रहेगा, तो मैं क्या करूँगा? उसी चेतक घोड़े ने महाराणा प्रताप का इतिहासप्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में स्वामिभक्ति से साथ दिया।

हल्दीघाटी का वह रण-क्षेत्र, जहाँ प्रताप के पास न तोपें थीं और न बंदूक। सिर्फ चौबीस हजार सैनिक थे, जो देश के नाम पर अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार थे। प्रताप ने समझदारी से छापामार युद्ध-पद्धति अपनाई और डटकर मुगल सेना का सामना किया। टिड्डी दल की तरह फैली मुगल सेना में उन्होंने तबाही मचा दी।

रणक्षेत्र में प्रताप और चेतक दोनों पर चारों ओर से बाणों की वर्षा हो रही थी। प्रताप अकबर के सेनापति मानसिंह को ढूँढ़ रहे थे। इतने में मानसिंह दिखाई दिया, जो एक हाथी पर सवार था। उसे देखकर प्रताप ने चेतक के एड़ लगाई। चेतक अपने मालिक का इशारा समझ गया। पल भर में वह मानसिंह के हाथी के पास जा पहुँचा और लपक कर अपने आगे के दोनों पैर उसके सर पर टिका दिए।

उन दिनों लड़ाई के हाथियों को सूँड में तलवार पकड़ना सिखाया जाता था, जिससे मौका पड़ने पर वे भी दुश्मन को घायल कर सकें। मानसिंह के हाथी की सूँड में भी एक तलवार थी। जिस समय चेतक उसके सिर पर कूदा उस समय हाथी ने जोर का झटका मार कर उसका पीछे का एक पैर काट दिया। महाराणा प्रताप को, इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने घोड़े को नीचे खींचकर फिर से युद्ध शुरू कर दिया। भयंकर मार-काट हुई। चेतक के भी कई घाव लगे। वह खून से लथपथ हो गया। लेकिन अपनी चाल में, अपनी दौड़ में, उसने तनिक भी धीमापन नहीं दिखाया। वह इस तरह दौड़ता और लपकता था, मानो उसके चारों पाँव ठीक थे। कई बार उसने अपने स्वामी को संकट में पड़ने से बचाया।

मौका पाकर प्रताप रणभूमि से बाहर निकल गए। लेकिन निकलते वक्त दो मुगल सिपाहियों ने उन्हें देख लिया। वे प्रताप का पीछे करने लगे। दुश्मनों को पीछे आते देख प्रताप ने घोड़े की बाग ढीली कर दी। घोड़ा सरपट भागने लगा। रास्ते में एक बरसाती नाला पड़ा। चेतक उसे आसानी से पार कर गया। किन्तु दुश्मन के घोड़े उसे पार नहीं कर सके।

लेकिन चेतक इस नाले से अधिक दूर न जा सका। वह बेहोश होकर गिर पड़ा। इतने में प्रताप के भाई शक्तिसिंह भी वहाँ आ गए। दोनों भाई दौड़कर नाले से जल लाए। एक भाई धीरे-धीरे उसके मुँह में जल टपकने लगा, दूसरा अपने दुपट्टे से हवा करने लगा। थोड़ी देर के बाद चेतक ने आँखें खोलीं। वह थरथरा रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। घोड़े की ऐसी अवस्था देखकर राणा भी अधीर हो गए। उनके टपाटप आँसू गिरने लगे। उन्होंने उसके सिर को अपनी गोद में ले लिया और बार-बार चूमने लगे। घोड़ा थोड़ी देर तक छटपटाता और पैर पटकता रहा। फिर इस संसार से चला गया और वह दिन 18 जून 1576 ई. का था। जिस स्थान पर घोड़ा मरा था, वहाँ एक चबूतरा अभी तक बना हुआ है। जब भी कोई हल्दीघाटी की यात्रा पर जाता है, तो ‘चेतक का चबूतरा’ अवश्य देखकर आता है।

इतने पर भी मुगल सेना राणा प्रताप के पीछे पड़ी रही। वे जंगलों में अपने परिवार को सुरक्षित रखते हुए मुगलों का मुकाबला करते रहे, परन्तु उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की। जंगल-जंगल भटकते हुए अपनी पत्नी एवं बच्चे को विकराल परिस्थितियों में अपने साथ रखते हुए भी उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। यद्यपि जंगलों और पहाड़ों का जीवन अत्यंत कष्टकारी था, किन्तु उन्होंने आदर्शों का पथ नहीं छोड़ा। महाराणा प्रताप के मजबूत इरादों ने अकबर के सेनानायकों के प्रयासों को लगातार नाकामयाब किया। उनके धैर्य और साहस का ही प्रभाव था कि 30 वर्ष के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी न बना सका।

यह सत्य है कि हल्दीघाटी के शुरू में प्रताप को पराजय का मुँह देखना पड़ा, किन्तु हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अपनी शक्ति को संगठित करके, शत्रु को पुन: चुनौती देना, प्रताप की युद्ध-नीति का ही एक अंग था। महाराणा प्रताप ने भीलों की शक्ति को पहचान कर उनके अचानक धावा बोलने की कार्यप्रणाली को समझा और उस छापामार युद्ध-पद्धति से अनेक बार मुगल सेना को कठिनाइयों में डाला। महाराणा प्रताप ने अपनी स्वतंत्रता का संघर्ष जीवनपर्यंत जारी रखा।

अकबर से लड़ते-लड़ते जब महाराणा के खजाने में फौज खर्च के लिए रुपए नहीं रहे तब एक दिन महाराणा प्रताप मेवाड़ छोड़कर जाने लगे। उनके साथ थोड़े से भील और अपने परिवार के लोग थे। इसका पता उनके वृद्ध मंत्री भामाशाह को लगा। वे घबराए हुए आए और महाराणा के घोड़े की लगाम को पकड़ कर रास्ते में खड़े हो गए। फिर गद्गद कंठ से कहने लगे, “अन्नदाता! यह आप क्या कर रहे हैं? मेवाड़ की अनाथ प्रजा को छोड़कर कहाँ पधार रहे हैं?” कहते-कहते भामाशाह का गला रुक गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

अपने वृद्ध मंत्री की यह दशा देखकर प्रताप घोड़े से उतर गए। उन्होंने कहा, “मंत्रीजी! मेवाड़ की प्रजा का दुःख अब अधिक नहीं देखा जाता। चाहता हूँ, देश को आजाद करूँ। लेकिन कोई साधन नहीं है। कोई उपाय नहीं है। पास में न पैसा है, न फौज।”

यह कहकर प्रताप वापस घोड़े पर चढ़ने लगे। भामाशाह ने उनके पाँव पकड़ लिए और कहा, “पृथ्वीनाथ! यह आप क्या फरमा रहे हैं। हमने जो इतना रुपया इकट्ठा कर रखा है, वह किसका है। वह भी आप ही का तो है। मेरे पास इस समय 20 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियाँ हैं। इन सबको मैं आपके चरणों में अर्पण करता हूँ। अन्नदाता! घोड़े की बाग मोड़िए। भामाशाह की प्रार्थना को मंजूर फरमाइए।”

भामाशाह की बात सुनकर प्रताप गद्गद हो गए। उनके होठों पर मुस्कराहट खेलने लगी। मेवाड़ को आजाद कराने की आशा उनके मन में फिर से हरी हो गई। महाराणा लौट पड़े। इस धन से उन्होंने एक बहुत बड़ी फौज इकट्ठी कर ली और मुगल सेना पर धावा बोल दिया और देखते-देखते अनेक किलों को अपने अधिकार में ले लिया।

महाराणा प्रताप अपने शौर्य, उदारता और अच्छे गुणों से जन समुदाय में अत्यंत प्रिय थे। महाराणा प्रताप सच्चे क्षत्रिय योद्धा थे, उन्होंने अमरसिंह द्वारा पकड़ी गई बेगमों को भी सम्मानपूर्वक वापस भिजवा कर अपने विशाल हृदय का परिचय दिया।

महाराणा प्रताप को स्थापत्य, कला, भाषा और साहित्य से भी अत्यंत लगाव था। वे स्वयं विद्वान तथा कवि थे। उनके शासनकाल में अनेक विद्वानों और साहित्यकारों को आश्रय प्राप्त था। अपने शासनकाल में उन्होंने युद्ध में उजड़े गाँवों को पुनः व्यवस्थित किया। अपनी नवीन राजधानी चावण्ड को अधिक आकर्षक बनाने का श्रेय महाराणा प्रताप को ही जाता है। उनकी राजधानी के भवनों पर कुम्भाकालीन स्थापत्य की अमिट छाप देखने को मिलती है।

महाराणा प्रताप में अच्छे सेनानायक के साथ-साथ अच्छे व्यवस्थापक के गुण भी मौजूद थे। वीर महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर भी दुःखी हुआ था। अकबर की उच्च महत्त्वाकांक्षा, शासन-निपुणता एवं साधनयुक्त होना भी महाराणा प्रताप की अदम्य वीरता, दृढ़ साहस और उज्ज्वल कीर्ति को परास्त नहीं कर सकी। आखिरकार शिकार के दौरान लगी चोटों की वजह से 19 जनवरी, 1597 ई. को चावण्ड में उनकी मृत्यु हो गई।

जब दिल्ली में बैठे अकबर को राणा की मृत्यु का समाचार मिला तो वह बहुत दुःखी हुआ। उसके दिल में दर्द और आँखों में वीरानापन था। वह सोच रहा था कि अकबर की जिंदगी में दोस्त बनकर अनेक लोग आए, परन्तु सभी मतलब के दोस्त थे। दुश्मन एक ही मिला और वह भी ऐसा कि जिसने सही मायने में दुश्मनी का हक अदा किया। काश वो मित्र बन जाता तो शायद वह भारत पर एक छत्र राज्य का सौभाग्य प्राप्त कर लेता।

प्रताप भारत की स्वाधीनता, चेतना, परम्परा, निरंतरता और अस्मिता के एक मात्र प्रतिनिधि थे। उनका ध्वज राष्ट्रीय स्वाधीनता का ध्वज था, जिसकी परम्परा राजा इक्ष्वाकु से लेकर पिछले 5 हजार वर्षों तक अनवरत रूप से भारत की राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्रतीक थी।

महाराणा प्रताप महान् पुरुष थे। निःसंदेह महान् पुरुष। भारतीय इतिहास में किसी खून में इतनी चमक नहीं थी। स्वतंत्रता के लिए किसी ने इतनी कठिन परीक्षा नहीं दी। जननी जन्मभूमि के लिए प्रताप ने कठोर तपस्या की। महाराणा प्रताप देशभक्त थे, लेकिन देश पर एहसान जताने वाले नहीं। राजा थे, लेकिन स्वेच्छाचारी नहीं। उनकी उदारता और दृढ़ता का सिक्का शत्रुओं तक ने माना। शत्रु से मिले भाई शक्तिसिंह पर भी उनकी दृढ़ता का जादू चल गया। अकबर का दरबारी पृथ्वीराज राणा प्रताप की कीर्ति गाता था। भील उनके इशारे पर चलते थे। भामाशाह ने उनके चरणों में अपना सब-कुछ समर्पित कर दिया था। मानसिंह राणा प्रताप से आँख मिलाने की जुर्रत नहीं कर सकता था। अकबर उनकी वीरता का सम्मान करता था। रहीम खानखाना उनकी तारीफ में पद्य रचना करना अपना सौभाग्य समझते थे। जानवर भी उनसे प्यार करते थे और घोड़े चेतक ने उन पर अपनी जान तक न्यौछावर कर दी थी। स्वतंत्रता की देवी के वे प्यारे सपूत थे और उन्हें स्वतंत्रता की देवी प्यारी थी। वे चित्तौड़ के दुलारे थे और चित्तौड़ भूमि उन्हें दुलारी थी।

ऐसे महान् व्यक्तित्व बिरले ही होते हैं, जिनके पैदा होने पर धरती माँ भी गौरवान्वित महसूस करती है। इसीलिए तो प्रताप की मृत्यु के 400 वर्ष बाद भी स्वतंत्र भारत उनसे प्रेरणा ले रहा है। भारतीय जनता आज महसूस करती है कि प्रताप ने स्वाधीनता की जो लड़ाई लड़ी, वह भारतीय स्वाधीनता का प्रतीक हो गई। आज भी महाराणा प्रताप का नाम असंख्य भारतीयों के लिए प्रेरणास्रोत है।

महाराणा प्रताप का स्वाभिमान भारत माता की पूंजी है। वे अजर-अमरता के गौरव तथा मानवता के विजय-सूर्य हैं। महाराणा प्रताप की देशभक्ति पत्थर पर अमिट लकीर है। ऐसे पराक्रमी भारत माँ के सपूत महाराणा प्रताप को शत-शत नमन। हल्दीघाटी की बलिदान भूमि से आज भी एक आवाज़ सुनाई पड़ती है :  

माई ऐड़ा पूत जण, जेड़ा राणा प्रताप।  

अकबर सूतो ओजकै, जाण सिराणै साँप।  

ॐॐॐ

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