बीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध पंजाबी साहित्यकार : भाई वीर सिंह

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बीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध पंजाबी साहित्यकार : भाई वीर सिंह

प्रो. नव संगीत सिंह

डॉ. भाई वीर सिंह बीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध पंजाबी लेखक और युगपुरुष हो चुके हैं, जिनको भारत के दार्शनिक डॉ. एस. राधाकृष्णन ने ‘भारत की सनातनी विद्वता का प्रतिनिधि’ कहा है। डॉ. मुल्कराज आनंद ने भाई साहिब को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नामित किया है जो रचनात्मक गति को जीवन और दुनिया के संतुलन का आधार समझते थे। श्री हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने भाई साहिब को ‘पांच दरियाओं की भूमि के छठे दरिया’ की उपाधि दी है। डॉ. मोहन सिंह दीवाना ने लिखा है कि वे सिख नव-चेतना के ऐसे स्तंभ थे, जिन्होंने अपने जीवन, कविता, गल्प और गद्य के माध्यम से बहुतों के जीवन को प्रेरित किया और पंजाबी साहित्य में अभिव्यक्ति के नए मानक स्थापित किए।

भाई वीर सिंह का जन्म 5 दिसम्बर, 1872 ई. को अमृतसर (पंजाब) में डॉ. चरण सिंह के घर माता उत्तम कौर की कोख से हुआ था। उनका वंश दीवान कौड़ा मल से संबंधित है, जो अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लाहौर के दीवान और मुल्तान के शासक बने। उनके दादा काहन सिंह (1788-1878) संस्कृत के विद्वान थे और उन्होंने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। भाई साहिब के पिता डॉ. चरण सिंह (1853-1908) संस्कृत और ब्रज भाषा के विद्वान थे। भाई साहिब के नाना ज्ञानी हजारा सिंह (1828-1908) गुरुवाणी के प्रसिद्ध टीकाकार थे।

स्पष्ट है कि भाई वीर सिंह के पैत्रिक-धन में दीवान कौड़ा मल का राजसी महत्व, बाबा काहन सिंह का साधुतव, डॉ. चरण सिंह का बौद्धिकतावाद और ज्ञानी हजारा सिंह का पारमार्थिक ज्ञान शामिल था। पंजाबी समालोचक प्रिंसिपल संत सिंह सेखों के अनुसार, “ऐसे पैतृक-धन वाला व्यक्ति 19वीं शताब्दी के भारतीय जागृति आध्यात्मिक वातावरण में एक महान कार्य के लिए पैदा हुआ और यह महान कार्य निश्चित रूप से भाई वीर सिंह के हिस्से में चिह्नित किया गया था।”

भाई साहिब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ज्ञानी हजारा सिंह और उनके साथियों से प्राप्त की। आठ वर्ष की आयु तक उन्होंने (सिख धर्म ग्रंथ) श्री ग्रन्थ साहिब का पाठ भी कर लिया था। 1891 में उन्होंने अमृतसर के मिशन स्कूल से प्रवेश (10वीं) परीक्षा उत्तीर्ण की और जिले में टॉप करने के लिए उन्हें जिला बोर्ड द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के दो वर्ष पूर्व (1889 में) उनका विवाह अमृतसर में ही बीबी चतुर कौर से हो चुका था, जिनकी कोख से करतार कौर और सुशील कौर नामक दो बेटियां पैदा हुईं। मैट्रिक के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के बारे में नहीं सोचा क्योंकि अपने पिता के प्रभाव और उनके सफल जीवन से उनके मन में समाज की खुली सेवा की धुन बज रही थी। साहित्य में उनकी रुचि बहुत अधिक थी और उन्होंने उसी के अनुसार अपने व्यवहार को चुना। अपने पिता के एक सहयोगी वजीर सिंह के साथ उन्होंने ‘वजीर हिंद प्रेस’ नामक एक प्रिंटिंग हाउस शुरू किया। फिर खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी की नींव रखी। 1899 में उन्होंने साप्ताहिक ‘खालसा समाचार’ प्रकाशित किया, जिसके माध्यम से उन्होंने पंथक समाचार को प्रकाशित करने के साथ-साथ सिख सिद्धांतों, गुरुवाणी और गुरुमति की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने का काम शुरू किया। यह समाचार पत्र अभी भी ‘भाई वीर सिंह साहित्य सदन’ दिल्ली से नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है।

भाई साहिब ने साहित्य के क्षेत्र में बहु-आयामी भूमिका निभाई। कविता के अलावा उन्होंने उपन्यासों, नाटकों, गद्य, संपादन और सटीक के क्षेत्र में काफी गंभीर कार्य देकर नई नींव डाली। उनके प्रमुख कार्यों का विवरण इस प्रकार है :

कविता:

निनाण भरजाई दी सिखियादायक वार्तालाप, राणा सूरत सिंह, लहरां दे हार, मटक हुलारे, बिजलियां दे हार, प्रीत वीणा, कंबदी कलाई, कंत महेली दा बारामाह, मेरे साइयां जीओ।

उपन्यास:

सुंदरी, बिजय सिंह, सतवंत कौर, बाबा नौध सिंह।

नाटक :

राजा लखदाता सिंह।

गद्य:

गुरु नानक चमत्कार, श्री गुरु कलगीधर चमत्कार, अष्ट गुरु चमत्कार, गुरबालम साखियाँ (पातशाही पहली) गुरबालम साखियाँ (पातशाही दसवीं) सर्वप्रिय सिख धर्म, भर्तृहरि -जीवन ते नीति, देवी पूजन पड़ताल, संत गाथा भाग, भाई गुरदास सकंध।

संपादित और अन्य कार्य: गुरप्रताप सूरज ग्रंथ, सिखां दी भगतमाला, प्राचीन पंथ प्रकाश, पुरातन जन्मसाखी, पंज ग्रंथी स्टीक, गुरु ग्रंथ साहिब के पहले 600 पृष्ठों की टीका।

भाई वीर सिंह की रचनाओं के हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुए। उनकी बहुत सी रचनाएं उनकी मृत्यु के पश्चात विभिन्न लेखकों/ संस्थाओं द्वारा  संपादित की गईं। उनके जीवन, कार्य और व्यक्तित्व पर बहुत-से लेख, शोध पत्र, पुस्तकें और शोध प्रबंध प्रकाशित हो चुके हैं। मेरा मानना है कि वे एक ऐसे आधुनिक पंजाबी साहित्यकार हैं, जिनकी रचनाओं पर निरन्तर शोध अभी तक जारी है। कई पाठकों को यह बात भी दिलचस्प लगेगी कि श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सामने जो सुंदर फूल सजाए जाते हैं, वे आज भी भाई वीर सिंह के घर की फुलवाड़ी से आते हैं।

अपने समय के अनेक विद्वानों से उनके साहित्यिक सम्बन्ध रहे। आधुनिक काल के प्रारंभिक पंजाबी कवियों मौला बख्श कुश्ता, चरण सिंह शहीद, प्रो. पूरन सिंह, धनी राम चात्रिक आदि की रचनात्मक प्रतिभा को निखारने में भाई वीर सिंह का विशेष योगदान रहा। प्रो. पूरन सिंह ने इसे स्वीकार करते हुए लिखा, “उस सौभाग्य समय में, एक महान व्यक्ति (भाई वीर सिंह) के दर्शन हुए। और उनकी कृपा से पंजाबी साहित्य का सारा बोध और ज्ञान आ गया। कविता भी मिली और कृपा भी। मधुर साध वचन से मुझे पंजाबी भाषा अपने-आप गयी।”

भाई साहिब की कविताओं के विषय व्यापक हैं, जिनमें उन्होंने अपने काव्य सिद्धांतों के साथ-साथ कविता के रूप, सौंदर्य, नैतिक शिक्षा, व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति, प्रकृति का चित्रण आदि की व्याख्या की है। उन्हें लघु कविताओं के प्रमुख कवि और गुरुमति के प्रवर्तक होने का गौरव प्राप्त है। उनकी कविताओं के कुछ अंश हिंदी के पाठकों के लिए रुचिकर हो सकते हैं:

* वैरी नाग तेरा पहला झलका, जद अखिआं विच वजदा।

कुदरत दे कादर दा जलवा, लै लैंदा इक सजदा।

* जिंद जे ढहंदी खेड़ियों, ढह पैंदी देह नाल।

खेड़ा जिंदड़ी इक हन, इक दुहां दी चाल।

* रही वासते घत्त, समें ने इक ना मंन्नी।

तृखे आपणे वेग, गया टप बंन्ने बंन्नी।

* बैठ वे ज्ञानी! बुद्धि-मंडले दी कैद विच

‘वलवले दे देश’ साडियां लग गइयां यारियां।

* सुपने विच तुसीं मिले असानुं, असां धा गलवकड़ी पाई।

निरा नूर तुसीं हथ ना आए, साडी कंबदी रही कलाई।

* कविता दी सुंदरताई, उच्चे नछत्तरीं वस्सदी।

आपणे संगीत लहरे, आपणे प्रकाश लस्सदी।

* धोबी कपड़े धोंदिया, वीरा हो हुशियार।

पिछले पासियों आ रिहा, मुंह अड्डी संसार।

1949 में भाई वीर सिंह को पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट (डी. लिट.) की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया; स्वतंत्र भारत की स्थापना के बाद पंजाब के राज्यपाल ने उन्हें पंजाब विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित किया; 1954 में उन्हें सिख शैक्षणिक सम्मेलन बॉम्बे द्वारा ‘अभिनंदन ग्रंथ’ प्रदान किया गया; 1955 में उनकी पुस्तक “मेरे साइयां जीओ” को भारतीय साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया, जो किसी पंजाबी पुस्तक को दिया जाने वाला पहला पुरस्कार था;  1956 में उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया।

1957 की शुरुआत से भाई साहिब शारीरिक रूप से कमजोरी महसूस करने लगे थे। 1 जून को उन्हें बुखार हो गया और 10 जून को उनका निधन हो गया। भारत सरकार ने उनकी पहली जन्म शताब्दी (1972) पर 20 पैसे की एक डाक टिकट जारी करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी। अमृतसर में उनके निवास, जो लारेंस रोड पर स्थित है, उसे अब ‘भाई वीर सिंह मार्ग’ के नाम से जाना जाता है, को अब एक म्यूजियम के रूप में सुरक्षित किया जा चुका है। भाई साहिब अपने पीछे अपने व्यक्तित्व और कार्यों का ऐसा वैभव छोड़ गए हैं, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।

# 1, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-147002.

(9417692015)

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