महाशिवरात्रि की महिमा

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महाशिवरात्रि की महिमा

डॉं. बसन्ती हर्ष

प्रधान सम्पादक

पुष्करणा संदेश (मासिक पत्रिका), बीकानेर

हमारे देश में वर्ष पर्यन्त अनेकानेक प्रकार की पूजा, व्रत – उपवास, आदि प्रचलित हैं। उनमें ‘शिवरात्रि’ का व्रत व पूजन जनमानस में अत्यधिक आस्था एवं भक्ति का प्रतीक है। लगभग समस्त देश में क्या स्त्री – पुरूष, क्या बच्चे, क्या बड़े प्रायः सभी किसी न किसी रूप में भगवान शिव की पूजा – अर्चना अत्यन्त श्रद्धा व भक्ति के साथ करते हैं। शिवरात्रि के दिन पूजा, व्रत और उपवास के साथ – साथ रात्रि जागरण करके भी महादेव की आराधना की जाती है। हमारे वेदवक्ता महर्षियों ने भी दस सर्वोत्तम उपवासों में शिवरात्रि व्रत को सबसे अधिक महत्ता प्रदान की है।

भगवान् शिवशंकर के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक ‘महाशिवरात्रि’ व्रत पर्व फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन मनाया जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिपदा आदि सोलह तिथियों के अग्नि आदि देवता स्वामी होते हैं। अतः जिस तिथि का जो स्वामी होता है, उस देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से उपासक को उस देवता की विशिष्ट कृपा की प्राप्ति होती है। चूंकि चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव है अथवा दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि भगवान शिव की तिथि चतुर्दशी है।

अतः इस तिथि की रात्रि में व्रत करने के कारण इस व्रत का नाम ‘शिवरात्रि’ कहलाना समीचीन जान पड़ता है। भगवान शिव के अनन्य उपासक प्रत्येक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करते हैं। ईशान संहिता के अनुसार – फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्धरात्रि में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ अतः यह पर्व ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि शिवलिंगतयोद्भूत कोटिसूर्य समप्रभः।

अर्थात् फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंग रूप में प्रकट हुए।

शिवलिंग की उत्पति विषयक एक रोचक कथा पुरानों में प्राप्त होती है जिसके अनुसार सृष्टि के आरम्भिक काल में भगवान ब्रह्मा स्वछन्द विचरण करते हुए क्षीरसागर पहुंचे। जहां भगवान विष्णु शेष-शैया पर लेटे हुए थे। श्री महालक्ष्मीजी, श्री देवी, भूदेवी आदि अनेक चरणों की सेवा में संलग्न थीं। गरूड, नन्द, सुनन्द, पार्षद गन्धर्व, किन्नर आदि नतमस्तक वहां खड़े थे। श्री ब्रह्मा जी को यह सब देखकर आश्चर्य मिश्रित क्रोध आ गया।

ब्रह्माजी ने अभिमानपूर्वक विष्णुजी को कहा कि मैं तुम्हारा स्वामी व पिता हूँ। तुम कौन हो? उठो। शेष-शैया पर विराजमान भगवान विष्णु बहुत सहज भाव से मुस्कुराते हुए उन्हें आशीर्वाद देकर बैठने को कहा। उनके अनुसार श्री ब्रह्मा जी उनके नाभिकमल से पैदा होने के कारण उनके पुत्र हैं। इस प्रकार दोनों स्वयं को सृष्टा व स्वामी बताते हुए झगड़ने लगे।

श्री ब्रह्माजी ने पाशुपत और श्री विष्णुजी ने माहेश्वर अस्त्र उठाकर लड़ना प्रारम्भ कर दिया। जिससे सब जगह प्रलयकारी हाहाकार मचने लगा। देवगणों ने घबराकर कैलाश पर्वत पर भगवान भोलेनाथ की शरण ली । सब घट घट के वासी विश्वनाथ सारी स्थिति को भांपकर उन दोनो के मध्य में अनादि अनन्त ज्योतिर्मय स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। माहेश्वर व पाशुपत अस्त्र भी शांत होकर उसी ज्योतिर्लिंग में समाविष्ट हो गये। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ। तब से लेकर आज तक लिंग पूजा विश्व में अनेक स्थानों पर विभिन्न तरीको से की जाने लगी है।

ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अतः इस चतुर्दशी को शिवजी की पूजा आराधना श्रद्धा व आस्था पूर्वक करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। शिव पुराण की कोटिरूद्रसंहिता में व्यक्ति के लिए भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति हेतु शिवरात्रि व्रत के महत्व को बताया गया है। अतः इसे अवश्य करना चाहिए। यह सभी वर्गों व वर्णो के स्त्री पुरूषों के लिए धर्म की प्राप्ति का उत्तम साधन है।

धर्म तु साक्षात् भगवत् प्रनीतः न वै विदुर्ऋषयो नादि देवाः।

‘धारणात् धर्म’ अर्थात् धर्म धारणकारी है। वस्तुतः समस्त विश्व में सभी पदार्थ व द्रव्यों के संयोग से जीवन का धारण होता है। धर्म का उद्भव ही इस निर्वाह के लिए है। धर्म के आश्रय से ही इस लोक में अभ्युदय की प्राप्ति होती है तथा परलोक में निःश्रेयस् रूप से मुक्ति मिलती है।

इस पृथ्वीतल पर वैदिक आर्यों ने सूर्योदय काल से लेकर रात्रिकाल तक के अनेकानेक प्राकृतिक दृश्यों को देखा तथा सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, समुद्र तथा प्राकृतिक लीलाओं को विस्मयपूर्वक अनुभूत किया। इस चराचर जगत् की गतिविधियों को भलीभांति समझने के लिए उन्होंने भिन्न – भिन्न देवी – देवताओं की कल्पना की। इन्हीं देवताओं की अनुकम्पा तथा अनुग्रह से समस्त जगत् के क्रिया – कलाप भलीभांति संचालित होते हैं।

उनमें सूर्य, चन्द्रमा के साथ – साथ गणेश, विष्णु, राम, कृष्ण तथा शिव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वैदिक कालीन धर्म की विशिष्टता भी यही रही है कि जिस देवता की स्तुति मन्त्रों द्वारा की जाती है। वही देवता स्तुतिकाल में सबसे अधिक हितकारी माना जाता है। तद्नुसार जन साधारण में अनेक देवी देवताओं के प्रति प्रबल श्रद्धा की भावना व्याप्त रहती है। लोक जीवन में भगवान शिव के प्रति आस्था व विश्वास भी बड़े स्वाभाविक रूप में परिलक्षित होती है। प्राचीन कहानियों व बातों में वे अनेकशः प्रकट होकर अपनी अलौकिक शक्ति व प्रभाव के द्वारा जन आस्था को और अधिक सृदृढ‌ करते हैं।

राजस्थानी कथा कहानियों में भी शिव – पार्वती की जोड़ी अनेक बार प्रकट होती है। वे कृपा पूर्वक भक्तों व उपासकों की सहायता करते हैं। किंवदन्ती के अनुसार मरवण को पीवणा सांप समाप्त कर देता है तो यह जोड़ी प्रकट होकर संकट दूर करती है। शिवपुराण में भी शिवजी की उपासना, प्रत्येक मास का रात्रि व्रत तथा फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के महाशिवरात्रि व्रत का विशेष माहात्म्य बताया गया है।

जिस प्रकार अमावस्या के दुष्प्रभाव से बचने के लिए उससे ठीक एक दिन पूर्व चतुर्दशी को शिवजी की उपासना की जाती है, उसी प्रकार क्षय होते हुए वर्ष के अन्तिम महिने फाल्गुन में (चैत्र मास के प्रारम्भ से ठीक एक माह पूर्व तक) शिवजी की उपासना का विधान, शिवपुराण आदि शास्त्रों में मिलता है।

हमारे महर्षियों ने विषय निवृति तथा आध्यात्मिक साधना हेतु ईश्वर की

उपासना में उपवास को परम आवष्यक माना है। जैसा कि गीता में कहा गया है –

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। (गीता – 2/49)

अर्थात् व्रत उपवास आदि के द्वारा इन्द्रियों व मन पर नियन्त्रण करने वाला व्यक्ति ही रात्रि जागरण आदि द्वारा अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है । व्रत के साथ – साथ रात्रि जागरण को गीता में भी दर्शाया गया है –

या निशा सर्वभूतेषु तस्यां जागर्ति संयमी (गीता – 2/69)

यही कारण है कि शिव के उपासक तथा भक्तजन महाशिवरात्रि को व्रत उपवास के साथ – साथ जागरण कर शिवजी की पूजा अर्चना करते हैं । शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन उपासकों को प्रातःकाल उठकर स्नान संध्या आदि नित्य नैमितिक कार्यो से निवृत होकर मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड तिलक लगाकर गले में रूद्राक्ष माला धारण करके शिवालय में जाकर शिवलिंग का पूजन अर्चन करके व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिए –

शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येऽहं महाफलम।

निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।

तत्पश्चात् उपासक को चार प्रहर में चार बार शिवजी को पंचामृत से स्नान कराकर ऋतुकाल के फल – पुष्प, चन्दन, अक्षत्, वस्त्रादि से सुसज्जित एवं श्रृंगारित करके आरती करनी चाहिए। रुद्राभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी, रूद्रीपाठ तथा पंचाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय) का जाप करना चाहिए। चार प्रहर पूजा सम्भव न हो तो प्रथम प्रहर में अवश्य पूजा करनी चाहिए।

यदि विधि विधान से भगवान शिव की पूजा सम्भव न हो सके तो शिव पंचाक्षरी (नमः शिवाय) मंत्र का जप करते हुए पंचामृत से शिवजी का अभिषेक अवश्य करना चाहिए। शास्त्रोत विधि से इस दिन की गई पूजा – आराधना से दुःख, शोक, पाप, मृत्युभय का निवारण होता है तथा अनन्त सुख की प्राप्ति होती है।

वस्तुतः महाशिवरात्रि व्रत की महिमा का शब्दों के द्वारा पूर्ण रूप से वर्णन करना सम्भव नहीं है। इतना ही कहा जा सकता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा – अर्चना, आराधना, उपासना मानव – मात्र के कल्याण का महत्वपूर्ण पंथ है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। अतः कल्याण के इच्छुक सभी मनुश्यों को अनुपम सामंजस्य वाले भगवान शंकर के इस महान् शिवरात्रि पर्व को हर्षोल्लास पूर्वक मनाना चाहिए। समस्त मानव मात्र को सह- अस्तित्व प्रदान करने में इस पर्व का अनुपम योगदान सिद्ध होगा।

शिवाय नमः

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