स्वाधीनता आन्दोलन में राष्ट्रभाषा हिन्दी का योगदान

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स्वाधीनता आन्दोलन में राष्ट्रभाषा हिन्दी का योगदान

इला पारीक

इला पारीक

व्याख्याता हिन्दी

राजकीय उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थान, बीकानेर।

भारतवर्ष को प्राचीन काल में आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था ।इसके उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय तथा सुदूर दक्षिण में अथाह सागर हिलोरे ले रहा है। जिसकी महान संस्कृति ने वैदिक संस्कार, सदाचार एवं सुव्यवस्थित, सुदृढ़ सामाजिक परंपराओं को जन्म दिया है। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा गुण है जो समुद्र की भांति अनेक नदियों और धाराओं को अपने अंदर धारण करने की क्षमता रखती है। यहाँ राजनैतिक सामाजिक एवं आर्थिक सभी परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव आए किंतु इसकी सहिष्णुता की नीति में यह सदैव विजयी रही है। हिंदी साहित्य में भक्ति और श्रृंगार की त्रिवेणी संगम दृष्टिगोचर होता है। इसमें भक्ति की धारा की शैली के साहित्य को तो कहीं महाकवि बिहारी की नायिका का श्रृंगार और कई घनानंद के वियोग भरे कविता के साथ-साथ भूषण का राष्ट्रप्रेम उजागर होता है। भारत के इस पावन भूमि में धर्म संस्कृति और संस्कारों की त्रिधारा प्रवाहित होती है, जो जनजीवन को अमृतमय जीवन प्रदान कर रही है। यहां के कवि लेखक “स्वान्तः सुखाय” के साथ-साथ “पर जन हिताय” साहित्य का सृजन करते हैं। कवियों में तुलसी सूर जायसी कबीर अपनी वाणी से समूह को भक्ति और प्रेम की धाराओं से आनंदित करते हैं तो भारतेंदु प्रेमचंद प्रसाद साहित्य के द्वारा राष्ट्रप्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार के साहित्यकारों पर हम भारतीयों को गर्व है।

       स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का वह युग है, जो पीड़ा, कड़वाहट, दंभ, आत्मसम्मान, गर्व, गौरव तथा सबसे अधिक हुतात्माओं के रक्त को समेटे है। स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में समाज के प्रत्येक वर्ग ने अपने-अपने तरीके से बलिदान दिए। इस स्वतंत्रता के युग में साहित्यकार और लेखकों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया। अंग्रेजों को भगाने में साहित्यकारों ने अपनी भूमिका निभाई। क्रांतिकारियों से लेकर देश के आम लोगों तक के अंदर लेखकों ने अपने शब्दों से जोश भरा।

          प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ उपन्यास हो या भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘भारत-दर्शन’ नाटक या जयशंकर प्रसाद का ‘चंद्रगुप्त’ – सभी देशप्रेम की भावना से भरी पड़ी है। इसके अलावा वीर सावरकर की ‘1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने में सफल हुईं।

       उपन्यास और कहानी के अलावा कवियों ने अपनी कविता से लोगों में देशप्रेम की ऐसी अलख जगाई कि लोग घरों से बाहर निकल आए और क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया है। भारत में स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि हमारी परतंत्रता का इतिहास। यह देश 1,000 वर्ष से भी अधिक समय तक परतंत्र रहा, परंतु इसका सांस्कृतिक स्वरूप अक्षुण्ण बना रहा। भारत की राष्ट्रीयता का आधार राजनीतिक एकता न होकर सांस्कृतिक एकता रही है।

स्वदेशवासियों को विस्मृति की निद्रा से जगाकर उनसे स्वदेश के गौरवपूर्ण इतिहास को पुनः पढ़ने का आग्रह कर रही हैं, जो देशवासियों को जगाने और अपने अतीत के गौरव को पुनः स्थापित करने का आह्वान कर रही है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिन्दी साहित्य के जिस आधुनिक युग का प्रारंभ किया, उसकी जड़ें स्वाधीनता आंदोलन में ही थीं। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने युग चेतना को पद्य और गद्य दोनों में अभिव्यक्ति दी। इसके साथ ही इन साहित्यकारों ने स्वाधीनता संग्राम और सेनानियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भारत के स्वर्णिम अतीत में लोगों की आस्था जगाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों द्वारा निरीह भारतीय जनता पर हो रहे अत्याचार व लूट-खसोट का बढ़-चढ़कर विरोध किया। उन्हें इस बात का क्षोभ था कि अंग्रेज यहां से सारी संपत्ति लूटकर विदेश ले जा रहे थे। इस लूटपाट और भारत की बदहाली पर उन्होंने काफी कुछ लिखा। ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ नामक व्यंग्य के माध्यम से भारतेंदु ने तत्कालीन राजाओं की निरंकुशता, अंधेरगर्दी और उनकी मूढ़ता का सटीक वर्णन किया है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है:-

 

“भीतर भीतर सब रस चुसै, हंसी हंसी के तन मन धन मुसै।

जाहिर बातिन में अति तेज, क्यों सखि साजन, न सखि अंगरेज।”

 

       द्विवेदी युग के साहित्यकारों ने भी स्वाधीनता संग्राम में अपनी लेखनी द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी आदि ने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवाररूपी कलम को पैना किया। मैथिलीशरण गुप्त ने भारतवासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए वर्तमान और भविष्य को सुधारने की बात की।

    

“हम क्या थे, क्या हैं, और क्या होंगे अभी।

आओ विचारे मिलकर ये समस्याएं सभी।’

 

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ में उन्होंने लिखा-

 

“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।

वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।।”

     जयशंकर प्रसाद ने ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ सुमित्रानंदन पंत ने ‘ज्योति भूमि, जय भारत देश।’ बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने ‘विप्लव गान’ लिखा।

      इन सबके अलावा बंकिमचंद्र चटर्जी का देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत ‘वंदे मातरम्’ ने लोगों की रगों में उबाल ला दिया। अब किसी कीमत पर देश के लोगों को पराधीनता स्वीकार नहीं थी।

 

“‘वंदे मातरम्!

सुजलां सुफलां मलयज शीतलां

शस्यश्यामलां मातरम्! वंदे मातरम्!”

       देशप्रेम की भावना जगाने के लिए सुमित्रानंदन पंत ने ‘ज्योति भूमि, जय भारत देश।’ निराला ने ‘भारती! जय विजय करे। स्वर्ग सस्य कमल धरे।।’ कामता प्रसाद गुप्त ने ‘प्राण क्या हैं देश के लिए। देश खोकर जो जिए तो क्या जिए।।’ इकबाल ने ‘सारे जहां से अच्छा हिदुस्तां हमारा’ तो बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने ‘विप्लव गान’ में लिखा:-

 

‘”कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए

एक हिलोर इधर से आए, एक हिलोर उधर को जाए

नाश! नाश! हां महानाश!!! की

प्रलयंकारी आंख खुल जाए।”

 

        रणबांकुरों में नई चेतना का संचार किया। इसी श्रृंखला में शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामनरेश त्रिपाठी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, नाथूराम शर्मा शंकर, गयाप्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, सियाराम शरण गुप्त, अज्ञेय जैसे अगणित देशभक्ति से ओतप्रोत कविताएँ लिखी।

      नौजवानों में स्वतंत्रता की अलख जगाने एवं अपनी पवित्र मातृभूमि के प्यार की भावना के लिए कविवर जयशंकर प्रसाद की कलम भी बोल उठी-

 

“‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।”

       कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भागीदारी निभाने में पीछे नहीं रहे और मृतप्राय: भारतीय जनमानस में उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक नई ताकत व एक नई ऊर्जा का संचार किया। प्रेमचंद की कहानियों में अंग्रेजी सरकार के प्रति एक तीव्र विरोध तो दिखा ही, इसके अलावा दबी-कुचली शोषित व अफसरशाही के बोझ से दबी जनता के मन में कर्तव्य-बोध का एक ऐसा बीज अंकुरित हुआ, जिसने सबको आंदोलित कर दिया। उन्होंने लिखा:-

 मैं विद्रोही हूं जग में विद्रोह कराने आया हूं, क्रांति-क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूं।’

       कविवर रामधारी सिंह दिनकर भी कहां मौन रहने वाले थे। मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग करने वाले बहादुर वीरों व रणबांकुरों की शान में उन्होंने कहा:-

 

“कलम आज उनकी जय बोल जला अस्थियां बारी-बारी

छिटकाई जिसने चिंगारी जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर

लिए बिना गर्दन का मोल

कलम आज उनकी जय बोल।”

 

      कवि गोपालदास नीरज का राष्ट्रप्रेम भी उनकी रचनाओं में साफ परिलक्षित होता है। जुल्मो-सितम के आगे घुटने न टेकने की प्रेरणा उनकी रचनाओं से प्राप्त होती रही-

 “देखना है जुल्म की रफ्तार बढ़ती है कहां तक

देखना है बम की बौछार है कहां तक।”

      आज श्यामलाल गुप्त पार्षद का यह गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ भले ही हम गुनगुना रहे हों और इकबाल की यह नज्म भी कि ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा’, लेकिन देश की मौजूदा परिस्थिति इससे भिन्न है। आज के समय में भी वैसी ही धारदार रचनाओं की जरूरत है, जो जन-जन को आंदोलित कर सके, उनमें जागृति ला सके। भ्रष्टाचार व अराजकता को दूर कर हर हृदय में भारतीय गौरव-बोध एवं मानवीय-मूल्यों का संचार कर सके।आज के हमारे कवियों और साहित्यकारों का यह महती दायित्व बनता है कि वे इस देश के बारे में सोचें और उसी परंपरा को जीवित रखें, जो मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा है, प्रेमचंद की परंपरा है, नीरज की परंपरा है।

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