
डॉ. कृष्णा आचार्य
साहित्यकार, कवयित्री
बीकानेर
वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया नेपाल व भारत में हिन्दुओं व जैनियों द्वारा नये उद्यम, विवाह सोने या अन्य संपति जैसे महंगे निवेश और किसी भी नई शुरूआत के लिए शुभ मानी गई है। यह पर्व उन प्रियजनों को याद करने का भी है जो दिवंगत हो गये हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं उनका अक्षय फल मिलता है, इसी कारण इसे अक्षय तृतीया या आखा तीज कहते हैं जो कि स्वयंसिद्धा मुहूर्त की तिथि मानी गई है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य कर सकते हैं तभी तो इस दिन बाजारों में भीड़ देखते हैं, विवाह भी खूब होते हैं, नये घर का मुहूर्त, नई दुकान, नई संस्था का उद्घाटन करते हैं। पुराणों के अनुसार इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिण्डदान अथवा किसी भी प्रकार का दान अक्षय फल प्रदान करता है।
सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्।
अर्थात सभी महीनों की तृतीया में श्वेत पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर शांत चित्त से भगवान की पूजा करना, बड़ों का आशीर्वाद लेना, प्रकृति की रक्षा का, जीवों की रक्षा का प्रण लेना शुभ माना गया है। जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान देना, भोजन कराना भी परमार्थ सुख का हिस्सा माना गया है। चूंकि यह तिथि बसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ का दिन भी है इसलिए वैज्ञानिक सोच के अनुसार अब घड़े (मटकी का पानी) का ठंडा पानी पी सकते हैं, पंखे का सेवन, कुल्हड़ सकोरे में दूध / दही का सेवन, खरबूजा, इमली, ककड़ी का सेवन प्रारंभ करते हैं तो इन्हीं का दान भी पुण्य का काम माना गया है क्योंकि लोक विश्वास है कि जिन वस्तुओं का दान करते हैं वे ही हमें आगे मिलती है। मान्यता तो सत्तु खाने की भी है क्योंकि आगे लू भरी गरमी से बचने के लिए कामकाजी मनुष्य सत्तु / सत्तवा खाकर गरमी के प्रकोप से बचते हैं। ये अक्षय दिन है तो मनुष्य अपने कर्मों तथा आचरण में शुभता / सत्यता को धारण कर अपने जीवन को सुखी बना सकता है। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ। भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव इसी दिन हुआ। प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं, इसी दिन महाभारत का युद्ध की समाप्ति हुई, द्वापर युग का समापन भी।
मदनरत्न के अनुसार-
अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुत न दतं तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया। उद्दिष्य दैवपितृन्क्रियते मनुष्यै तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव।
अक्षय तृतीया की अनेक व्रत कथाऐं भी प्रचलित हैं जिसमें एक वैश्य धर्मदास की है जो नेक, सदाचारी, दानी, पुरूष था, परिवार वालों के विरोध के बावजूद उसने अपना सत्य का मार्ग, दान का कर्म सदाचार का मार्ग नहीं छोड़ा, यही वैश्य अगले जन्म में कुशावती का राजा बना ऐसी किवदंती है। एक और राजा त्रिदेव की कथा आती है जो आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में महान राजा हुआ।

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को माता रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने जामदग्न्य (परशुराम) के रूप में जन्म लिया। दक्षिण भारत उत्तर भारत में परशुराम जयंति को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता तो यह भी है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों अपने वंशज व गुरू रूप में धूमधाम से मनाते हैं। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गये। अपने साथ एक परशु रखते थे, तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।
जैनधर्म में अक्षय तृतीया की महत्ता है व महान धार्मिक पर्व के रूप में मनाते हैं इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात् इक्षु (गन्ने) रस से परायण किया था। जैन मत के अनुसार गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं तो यह दिन इक्षु तृतीया के नाम से भी विख्यात हो गया।

भगवान श्री आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस की तपस्या के पश्चात् परायण किया था। यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी। अतः जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्म वर्षीतप की आराधना करने वाले को धन्य मानते हैं। यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्णपक्ष की अष्टमी से आरंभ होकर दूसरे वर्ष वैशाख शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के दिन परायण कर पूर्ण होती है। यह तपस्या धार्मिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है ही वहीं आरोग्य जीवन बिताने के लिए भी उपयोगी मानी गई है। संयम जीवन यापन करने के लिए इस प्रकार की क्रिया से मन को शांत, विचारों में शुद्धता, धार्मिक प्रवृतियों में रूचि और कर्मों को सदाचार से जोड़ने में सहयोग मिलता है। इसी कारण इस अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्ता समझी जाती है क्योंकि मन, कर्म, वचन से शुद्ध व्यक्ति ही महान माना गया हे।
इस प्रकार भारतीय संस्कृति में यह अक्षय तृतीया अपना अद्भुत अनूठा संयोग बनाये हुए सामाजिक, धार्मिक, जीवन में रच बस सी गई है। गांवों में पहले तो इस दिन बाल विवाह भी खूब देखने को मिलते थे परंतु वर्तमान में यह प्रथा बंद हो गई है।
भारत में विभिन्न प्रांतों में यह दिन त्योहार के रूप में मनाया जाता है- बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से वैशाख पूर्णिमा तक बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें कुंवारी कन्याएं अपने भाई, पिता तथा गांव-घर और कुटुम्ब के लोगों को शगुन बांटती हैं और मंगल गीत गाती हैं। अपने राजस्थान में बारिश हेतु चौघड़िया निकालते हैं, वर्षा की कामना करते हैं, लड़कियां मंगलगीत गाती हुई घर-घर शगुन बांटती हैं। पतंगे खूब उड़ती हैं, धान की पूजा होती है, कोरी मटकी छानी जाती है। मालवा में भी नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पल्लव रख कर पूजते हैं। माना जाता है कि इस दिन किसान अपने खेती-बाड़ी का काम भी आरंभ करते हैं जिससे देश में हरियाली खुशहाली की मनोकामना होती है।
बीकानेर में अक्षय तृतीया

जल ऊँडा थळ ऊजळा नारी नवळे वेस, पुरुष पटाधर नीमडौ, अइयो मरुधर देस।
ऊँट मिठाई इस्तरी सोनो गहणो साह, पाँच चीज प्रिथ्वी सिरे, वाह बीकाणा वाह।
वैसे तो बीकानेर की खास पहचान पूरे विश्व स्तर पर दूर-दूर तक फैले सुनहरे रेतीले धोरे शांत चांदनी में नहाते उनका अद्भुत सौन्दर्य, यहाँ की हवेलियाँ, छतरियों, राज प्रासादों की कोरणी और उनकी कला-कृतियों, वैभवशाली इमारतें, भवन यहाँ के तीर्थ स्थल चारों दिशाओं में विराजमान रक्षक देवी-देवता, चित्र वल्लरियों, गजनेर झील में विचरण करते देश-विदेश के परिन्दों, अभ्यारण्य में घूमते वन्य पशु-पक्षी, यहाँ की संस्कृति, मेले, त्यौंहार ये सब अनूठी बेमिसाल पहचान है। इसी पहचान ने कई दोहों का रूप लिये इसकी महत्ता को बढ़ाया है।
सियाळो खाटू भलो, ऊनाळो अजमेर,
नागौर नित रो भलो, सावण बीकानेर।
जोधपुर (मारवाड़) के राठौड़ शासक जोधा के बड़े पुत्र राव बीका द्वारा अपने लिए नए राज्य की स्थापना करने की इच्छा से राठौड़ों का बीकानेर क्षेत्र में आगमन हुआ। राव बीका द्वारा बीकानेर राज्य की स्थापना करने से ही इस क्षेत्र में एक नए युग की शुरूआत हुई। राठौड़ों से पूर्व यहाँ सांखला राजपूतों का शासन रहा, परन्तु वे इस क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि न पा सके क्योंकि उनके समय इस क्षेत्र में बिलोचियों के आक्रमण यदा-कदा होते रहते थे जिनसे परेशान होकर अधिकतर सांखला इस क्षेत्र को छोड़कर भाग गए। इन्हीं समसामयिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर राव बीका ने भाटियों व जाटों को परास्त करके वि.सं. १५४२ (१४८५ ई.) में किले की नींव रखी। इस किले के निर्माण के पश्चात् राव बीका ने वि.सं. १५४५ वैशाख सुदी २ (१२ अप्रैल १४८८) को राती घाटी पर बीकानेर नगर की नींव रखी। विधिवत स्थापना के सम्बन्ध में उक्त दोहा उल्लेखनीय है-
पनरै सौ पैताळवे, सुद वैशाख सुमेर ।
थावर बीज थिरपियो, बीके बीकानेर।।
राठौड़ वंशीय बीका द्वारा स्थापित बीकानेर में राठौड़ राजवंश पहला राजवंश था जिसने कई वर्षों तक लगातार शासन कर इस क्षेत्र को राजनीतिक स्थिरता प्रदान की मान्यता है कि दूसरे दिन अक्षय तृतीया होने से स्थापना समारोह धूमधाम पूर्वक मनाया गया। राव बीकाजी ने खुशी व उल्लास में चन्दा उड़ाया था। तब से अब तक नगरवासियों द्वारा चन्दा व पतंगे उड़ाकर आकाश को रंग-बिरंगा सजाकर अपनी प्रसन्नता व उमंग-जोश के साथ पारम्परिक रूप से पर्व मनाते हैं।
अक्षय तृतीया अथवा आखातीज का पर्व हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित सांस्कृतिक सामाजिक परम्पराओं की याद दिलाता है, जिसमें लोग परस्पर प्रेम, सदभावना, सहकारिता, समरसता व प्राकृतिक नैतिकता बद्ध आचण करते हुए स्वस्थ समाज वर राष्ट्र निर्माण की कल्पना संजोया करते हैं। आखातीज अथवा अक्षय तृतीया को विवाह संस्कार के लिए अबूझ सावा मानकर इसमें सामूहिक विवाह करने की परम्परा प्रचलित हुई। आज भी राजस्थान में पहले के कई गांवों मे इस दिन बाल-विवाह होते थे जो कि अब सरकार द्वारा प्रतिबंधित है।
सांस्कृतिक पर्व अपनी ही संस्कृति की खुशबू और माटी की महक से सराबोर रहता है। पर हम भौतिक युग में अपने सुख-सुविधा हेतु नये नये परायेपन की संस्कृति में उलझते जकड़ते जाते हैं। वर्तमान में पतंगों में नये प्लास्टिक कागज की पतंगे व देशी मांझे की जगह चाइनीज मांझा प्रयोग करने लगे जिससे निरीह प्राणियों को अंग-भंग कर मार भी सकता है, मनुष्यों में भारी चोट पहुंचा सकता है अतः हमें मानव हित, प्राणीहित को ध्यान में रखकर अपने पावन पर्व को खुशी व उल्लास, उमंग से मनाना चाहिए।
अक्षय तृतीया का पर्व तथा बीकानेर स्थापना का शुभ दिवस उदय होता गर्मी का मौसम, हरी-भरी प्रकृति, तैयार फसल सभी कई प्रेरणास्पद शिक्षाएँ प्रदान करती है। यहाँ के नगरवासियों का आपसी प्रेम-व्यवहार, परस्पर मिलजुल कर रहना, सहयोग व मानवता का पाठ पढ़ाते आपसी भाईचारे से रहते विभिन्न समुदायों के लोग, देश-विदेश में अपना परचम अपनी पहचान बनाये हैं। जिस प्रकार हमारी पतंगे दूर आकाश की ओर उड़ती जाती है और पूरे नगर में शोर, उल्लास, जोश व मिठास के साथ अक्षय तृतीया तक दो दिन पूरी खुशी व अल्हड़ मन नाच कर मस्त होकर पतंग व मांझे की डोर के साथ अपना स्वर मिला जीवन रस पाता है। उसी प्रकार हमारे शहर वासी शिक्षा, संस्कार व कला-साहित्य द्वारा सदैव विकास की ओर बुलंदियों को छूकर अपनी कीर्ति पताका फहरावें तथा साथ ही अपने धरातल से भी जुड़े रहें। तभी अक्षत या मंगल मय स्थिति बनाये रखने में सफल हो पायेंगे।
बीका ने दी पहचान बीकाणा
पतंग संग डोर-सा उड़े बीकाणा
समरस-सा समभाव बीकाणा
कहते हैं सब वाह बीकाणा

