गणगौर महोत्सव

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गणगौर महोत्सव

डॉ. (श्रीमती) बसन्ती हर्ष

मुख्य सम्पादक, पुष्करणा सन्देश (मासिक पत्रिका)

हमारे भारत देश में वर्षपर्यन्त मनाये जाने वाले अनेकानेक त्यौहारों की अपनी-अपनी अलग-अलग विशेषताएं हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर विभिन्न तरीकों से मनाये जाने वाले पर्वों की अपनी महत्ता व उपादेयता है। सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पक्ष को सुदृढ़ करने हेतु हमारे पूर्वजों ने इन पर्वों को परम्परागत रूप से मनाने का प्रचलन किया।

सामूहिक रूप से मनाये जाने के कारण इनसे एकजुटता, सहयोग व सद्भाव की प्रवृत्ति का निरन्तर विकास होता है। इन्हीं पर्वों के अन्तर्गत गणगौर पर्व का नाम उल्लेखनीय है जो चिरकाल से जनमानस के लिए आस्था व विश्वास का भाव जगाते हुए बालिकाओं को बाल्यकाल से संस्कारित शिक्षा-दीक्षा देने में अग्रगण्य है।

होली त्यौहार के पश्चात गणगौर पूजन के समय जब कन्याएं व महिलाएं इन अनेकानेक गीतों को आस्था पूर्वक गाती हैं तो इसकी सुर लहरियां समस्त वातावरण को गणगौरमय के साथ आध्यात्मिकता पूर्ण बनाती हैं। इन गीतों में आज भी उतनी ही रस व्यंजना व सामूहिकता की अभिव्यक्ति होती है जितनी आज से वर्षों पूर्व हुआ करती थी।

जी हां, मैं अपने अतीत के झरोखे में झांकती हूं तो गणगौर पूजन के सभी दृश्य साकार होते से प्रतीत होते हैं जब हम सभी कन्याएं गवर-पूजा करती थीं । साथ ही विविध प्रकार के मांडणे मांडकर अपनी कला को विकसित करने का अवसर भी प्राप्त होता था । प्रतिदिन समय पर एक साथ मिलकर गणगौर की पूजा व गीतों की झड़ी से समय की पाबन्दी के साथ एकजुटता, संस्कारितता व सहयोग व सौहार्द्रभाव बाल्यकाल से ही विकसित होने का अवसर प्राप्त होता है। परन्तु आज के युग में हम ‘गणगौर’ सदृश महत्वपूर्ण त्यौहार को बिसराने लगे हैं। गणगौर क्या है और आज के युग में इसकी क्या प्रासंगिकता है, आइये, इस विषय पर हम विचार करें।

गणगौर अर्थात् गण (शिव) गौर (पार्वती) को मिलाकर इस शब्द की निष्पत्ति जान पड़ती है। आदि देव शिव तथा उनकी अर्धांगिनी पार्वती की महिमा का शिव पुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख किया गया है। हिन्दू शास्त्रों में भगवान शिव को सदैव ध्यान-मग्न, समाधिस्थ तथा आत्मचिन्तन करते हुए दर्शाया गया है। इस चिन्तन के द्वारा वे सदैव विश्व का निरीक्षण करते रहते हैं। उनकी सहायिका शक्ति के रूप में पार्वती सदैव उनकी सेवा में विराजमान हैं। इस प्रकार दाम्पत्य प्रेम के उच्च आदर्श की शिक्षा देने हेतु इस पूजा का हमारे ग्रन्थों में विधान किया गया हैं। इसी पूजा विधान को हमारे यहॉं विशेष रूप से राजस्थान में ईश्वर-गौरी (ईश्वर-गणगौर) के महोत्सव के रूप मनाया जाता है।

होली के बाद ‘गणगौर’ पर्व का राजस्थान के जन जीवन में विशेष महत्व है। यह पर्व स्त्रियों की अपने पति के प्रति निष्ठा को प्रकट करने के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है।

होलिका दहन के दूसरे दिन यानी चैत्र कृष्णा से चैत्र शुक्ला 3 तक गणगौर का पूजन चलता है। ‘जयसिंह कल्पद्रुम’ तथा ‘गंगासिंह कल्पद्रुम‘ में श्री देवी प्रसाद जी शास्त्री ने स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा है- चैत्र शुक्ल द्वितीया-अस्यामुमा पूजा शिवाग्नि पूजा च कार्या सिधारेति देशाचारे।

निर्णय सिन्धु के वचनों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीयायां गौरीमीश्वरसंयुताम् सम्पूज्य दोलोत्सवं कुर्यात्। इन वचनों से चैत्र शुक्ला तृतीया को सौभाग्य तृतीया मानते हुए उस दिन विधिवत् पूजा का निर्देश है ।

होली की राख के पिण्ड बांधकर उनकी सात दिनों तक पूजा की जाती है। आठवें दिन शीतला सप्तमी के बाद गौर, ईशर (शिव) की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है। जौ बोये जाते हैं, उन्हें जवारें कहते हैं।

इस प्रकार यह पूजा 18 दिनों तक निरन्तर की जाती है। तत्पश्चात उन प्रतिमाओं को कुए या तालाब में विसर्जित किया जाता है। यद्यपि गणगौर का पर्व मध्यप्रदेश में भी मनाया जाता है, लेकिन सतियों के प्रदेश राजस्थान में इस पर्व पर महिलाओं में लोकगीतों के माध्यम से एक विशेष उत्साह व उल्लास प्रस्फुटित होता है। सौभाग्यवती स्त्रियां तथा कुमारियां नये वस्त्र व अलंकार धारण करके गौर पूजा प्रारम्भ करती हैं। गणगौर से धन, पुत्र, माता-पिता, भाई-भाभी, बहिन-बहनोई, श्रेष्ठ व चिरायु पति की कामना करते

हुए विविध गीतों की अपने स्वाभाविक कण्ठों से झड़ी लगा देती हैं।

प्रस्तुत गीत दृष्टव्य है –

गौर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी,

बाहर उभी थारी पूजण वाली

पूजो ऐ पूजायों बायों क्या फल मांगो

मांगां ए म्हें अन्न, धन, लाछ’र लछमी

जलहर जामी बाबुल मांगा राता देई मायड़

कान कंवर सो बीरो मांगा राई सी भौजाई

ऊंट चढ़्यो बहनोई मांगा, चुड़लैवाली बैनड़

पून पिछोकड़ फूफो मांगा मांडा पोवण भूवा।

कुमारियों के लिए गणगौर पूजन का महत्व दर्शाते हुए वर्णन किया गया है कि यदि तू रूठी हुई पूजा करेगी तो रूठा हुआ पति मिलेगा, देखिए –

जै तू रूठी कुठी तो रूठ्यो आवेजी

जै तूं पूजे नंगी धंगी तो नंग धड़ंगो आवेजी।

इसी प्रकार गणगौर पूजा के लिए बालिकाएं दूर्वा, पुष्प और जल लाने हेतु टोली बनाकर सुमधुर स्वरों में ये गीत गाती है –

बाड़ी वाला बाड़ी खोल

बाडी की किवाड़ी खोल

छोर्यां आयां पूजण नै।

इस प्रकार भक्ति भावना को तरंगति करने वाले इन लोक गीतों में जहां एक ओर कन्याओं की बाल सुलभ भावाभिव्यक्ति होती है, वहीं दूसरी ओर विवाहिताओं तथा महिलाओं के गीतों में गवर के रूप वर्णन, संयोग वियोग तथा श्रृंगार आदि भावनाओं की सुमधुर अभिव्यक्ति होती है, जिनके श्रवण मात्र से सहृदय जन इन गीतों के राग रस में आकण्ठ निमग्न हुए बिना नहीं रह सकता।

इन लोक गीतों में गौर एवं शिव के धरेलू जीवन की छवि दृष्टि गोचर होती है। वस्तुतः लोक जीवन में आदर्श प्रस्तुत करने के लिए इन देवी देवताओं को भी हमारे लोक साहित्य में जन साधारण की तरह लोक व्यवहार तथा परस्पर सहयोग करते दर्शाया गया है । शंकर पार्वती का कल्याणमय दाम्पत्य प्रेम अनुकरणीय है। कन्याएं श्रेष्ठ वर की प्राप्ति तथा महिलाएं सौभाग्य की अभिलाषा से पूजन करते समय विविध मिट्टी के मांडने या रंगोली आदि का चित्रण करती हैं, जिससे उनमें कला व भक्ति का निरन्तर विकास होने से जीवन का चहुंमुखी विकास सम्भव होता है।

परन्तु खेद का विषय है कि आज के युग में संयुक्त परिवारो के निरन्तर विघटन तथा वर्तमान शिक्षा पद्धति के कारण भारतीय संस्कृति में शनैः शनैः इन आदर्श जीवन मूल्यों का निरन्तर ह्रास होने लगा है। नवीन जागरण तथा भारतीय संस्कृति के नव निर्माण हेतु ये लोक पर्व विशेष सहायक सिद्ध हो सकते हैं। हां, इसके लिए संस्कृति के संरक्षक, साहित्य अन्वेषक तथा महिलाओं को सक्रिय भूमिका निभाकर हमारे इस अनुपम पर्व में एक नवीन संजीवनी शक्ति का संचार करना होगा, तभी हमारा सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान सम्भव है।

भारतीय संस्कृति का मूलमन्त्र ‘तप’ है। यह तप किसी भी रूप में हो सकता है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकता है। सफल दाम्पत्य जीवन के प्रतीक गण व गौर (गौरी) की आराधना व साधना आज भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। हमारी कन्याओं के सामने एक ही महान आदर्श पार्वती माता (गौर) का है। ‘गौरी-पूजा’ का रहस्य इसी महान स्वार्थ त्याग के भीतर छिपा हुआ है।

‘गणगौर’ पूजा का सन्देश हम तीन ‘सकार’ शब्दों में प्रकट कर सकते हैं-संयम, सौहार्द्र व सहयोग।

इन तीन सकारादि शब्दों का अनुसरण करते हुए यदि हम अपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करेंगे तथा निर्वहन करेंगे तभी परिवार को सुदृढ़ता प्रदान करते हुए सुख-समृद्धि को प्राप्त कर सकेंगे।

ईसर जी थारी गवरादे नै मेल

करां गवर री आरती।

आरतड़ी में हीरा मोती घाल

करां गवर री आरती।।

आज की महिलाओं का यह कर्त्तव्य है कि इन प्राचीन पर्वों को मनाने का महत्व समझें तथा इनके पुनरूत्थान में सक्रिय भागीदारी निभायें जिससे युवक-युवतियों को दाम्पत्य जीवन को सफल, सुखी व सुदृढ़ बनाने की प्रेरणा मिले व समाज में एकजुटता व सद्भावना का संचार हो सके।

इति शुभम्।

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