बीकाणै री गणगौर

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बीकाणै री गणगौर

राजाराम स्वर्णकार

मरूथळ मेळां रौ घर। ताळ-तळाव तिरियां मिरियां, जठै मंडै मेळा-मगरिया। लोक-जीवण रै सुख-दुःख, आस-निरास उच्छाव-उमंग रै समंदरियै मांय ल्हैरावतो तीज-तिंवार आणंद रौ इमरत रस बरसावतो सा बरस री जिनगाणी दिरावता रैया धर कूंचा धर-मंजळा चालण रौ नेम निभावतो दरसावै ।

चावै काळ-दुकाळ होवो, चावै खेती-बाड़ी री हरियाळी, होळी होवो चावै दिवाळी-इण माटी रा लोग सदीव मतवाळी चाल-ढाळ सागै मेळा-मगरियां रौ आणंद लिरावता रैया है।

जुगां-जुगां सूं बीकाणै री धरती मन-मरजी रा मेळा मनावती रैयी है। अठै रा लाखीणा लोग जिनगाणी रो भरपूर आणंद-उच्छाव रा हबोळा लेवता जीवण जींवता रैया है। राजा-महाराजा, सेठ, साऊकार, बामण-बाणियां अर हिन्दू-मुसळमान समेत सगळी जात रा लोग मेळा-मगरिया रा मन मोवणा अर सुगणा-सोवणा भाव दरसावता रैया है।

गणगौर या गवर रौ तिंवार चैत रै चाँदण पख में आवै। गढ़-कोटां सूं लेय’र आखै परकोटे रै बारै-मांयनै मेळां-मगरियां देसी-परदेसी लोगां रै मांय नुवो उमंग-उच्छाव निपजावता रैया है।

परदेस कमावणियां प्रीतम आप री घर-धणियाणी री ओळू करतां सावण-भादवै बीकानेर आवण सिरखो मन बणावता। धणियाणी री उडीक हिचक्यां रै सायरे ओळू री सरसता हिवड़ै मांय सरसावती थ्यावस बांधै। मेळां-मगरियां रौ आणंद जोड़ी रै ढोलां सागै मरवणां री मांग पूरती करती, रळियावणी मनसावां रौ फळ दिरावती लखावै। अठै रा मिनख कमावण नै कळकत्ता, मद्रास आद सैरां में जावै पण तीज तिंवार पर आपरै घरां बीकाणै पूग जावै। पग-पग माथै मिंदर, देवळ्यां अर पीरां री मजारां धोकीजे। लोग-लुगायां मेळे-समेळे  जावै। कठेई देसनोक री करणी माता रौ मेळो भरीजे तो कठेई नागणेची री मूरत सामै दरसण मेळा होवै। 

होळी रै बाद आखो बीकानेर गणगौर पूजण सारू लाग्योड़ो रैवे। कुंवारी कन्यावां घुड़लै सूं लेय’र गणगौर तांई रा गीत घर-घर उगेरती रैवे। मोहल्ला गळी-गुवाड़ गौरी रा गीत गावता मालूम पड़े। चैत महीने री तीज-चौथ माथै गढ़ री गणगौर चौतीणे कुवै राजसी ठाठ-बाट अर जूनी परम्परावां नै समेटती निजर आवै। चौतीणे कुवै पाणी अरोगै अर फेरूं आपरी परिकमा सागै पाछी गढ़ मांय पूगे।

गणगौर रौ मेळो सांगो-पांग। धींगा गवर, बारै मासी गवर रै सागै-सागै ढढ्‌ढां रै चौक मांय चांदमल ढढ्‌ढै री गणगौर रो भारी मेळो भरीजे। सुनारां री गणगौर अर इसर पूरी न्यात में खोळो भराय पंचायती भवन, महर्षि दयानंद मारग में जावै। बठै लुगायां गीत गावती चारूंमेर घूम-घूम’र घूमर घाले। इण बखत बारै गुवाइ रै चौक, नत्थूसर बास, बडो बाजार, आद में गणगौरां री चैल-पेल रैवै। तीज-चौथवाळी दम्माणी चौक अर जसोळाई तळाई मोहल्ला ‘गणगौर’ रौ खास आकर्षण है। गणगौर दौड़ प्रतियोगिता भादाणी (पुरोहित) अर देराश्री समाज री गणगौर चौतीणे कुवै सूं दौड़ै अर कोटगेट तांईं दौड़ती दरवाजे मांय बावड़ै बीं नै परम्परागत राज री तरफ सूं पुरस्कार मिळै। गणगौर दौड़ बरसां सूं होंवती रैयी है। बीं बखत लोगां रौ उमंग-उच्छाव देखण जोग बणै।

गणगौर रौ महत्व न्यारो-निरवाळो। इणरा श्रृंगारपरक गीत रीतिकालीन साहित्य री याद दिरावै- गोरड्यां गीत गावै ‘गढ़ी ए कोटां सूं गवरळ उतरी है जी बां रै हाथ कंवळ कैरौ फूल अे रूड़ो अै नजारो तीखै नैणां रो’। लाड कंवरियां अर परण्योड़ी लुगायां इण गीतां ने मधुर कंठां सूं उगेरती आखै बीकानेर में इमरत रस बरसावै। लोग लुगायां रै हिडदै मांय उच्छाव अर आणंद रौ समंदर लैरावे। गीतां री सुमधुर सोवणी मनमोवणी राग मन मांय आणंद री मघरी-सीतळ पून चलावै अर हिडदै नै राग-रंग सूं सरसावै।

परदेसी प्रीतम आयां बिना गवर कींकर मनावै? इण बात रौ साखीधर औ दूहौ है-

चैत महीनो चाकरी, जे कोइ ठाकर जाय।

गवर न पूजै गोरड़ी, चित में मोटी चाय।।

सिव-पारवती रै रूप में ईसरजी अर गवर चैत सुद तीज रै दिन मिंदर में ऊभा करै। घणा रूपाळा गैणा-गाभा पैराय घी-गुड़ रो भोग लगावै। आकरै वार (सूरज, मंगळ या शुक्र) रा गणगौर नै भोळावै। ईसरजी अर गवर सैंजोडे निवांण माथै ले जावै। लुगायां गीत गावै अर कंवारी छोकरियां फुलड़ा लाय चढ़ावै। कंवारी वर मांगै, अर सुहागण आपरो सुहाग मांगै।

‘भंवर म्हांनै खेलण दौ गणगोर’ मीठा गीत गाईजे। इण भांत गणगौर रौ तिंवार घणे चाव सू मनाईजै। लुगायां गवर नै भोळाय पाछी आवे। पण गवर तो हर बरस भळे त्यार हो जावै, ऊमर बीत जावै। औ जूनौ दूहौ पढ़णजोग है-

नर जांणै दिन जाय है, दिन जांणै नर जाय।

गई भोळावणहारियां, गवर भोळाय भोळाय।।

गणगौर रौ ऊजमणौ करै, जद सोळे तीजणियां गवर री, पांच पीपळियै री अर चार चौथ री मिलाय दो साखियां समेत निमत नै गवर ईसरजी नै चढ़ावौ करै। तीजणियां ओरण मांय सू कैर रा दांतण लावै। पींपळियै अर चौथ री कंवारी कन्यावां नै एक-एक नारेळ झिलावै। अकडोडिया, दूब, पुसब चढ़ाय धोक देवै, अर लाड-कोड सूं सगळां नै जीमाय आसीस लेवै।

गणगौर राग-रंग अर उमंग रौ तिंवार है। अखी सुहाग रौ सिणगार है। लुगायां गणगौर रा गीत घणै हरख सूं अे गीत गावै-

पूजण दो गणगौर, खेलण दो गणगौर रे मारू, पूजण दो गणगौर / होजी म्हाने गणगोर्यो रो घणो चाव, गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर / होजी म्हारी गवरल रा दिन चार, गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर / होजी म्हारी सहेल्यां जोवे है बाट, गढ़ा रे मारू खेलण दो गणगौर / गढ़न हे कोटो सु गवरल ऊतरी होजी बेरे हाथ कमलन रो फूल है / गवरल रूडो है नजारो तीखो नेोगो मे शीश है नारेळो गवरल सारियो होजी बेरे बीणी बासक नाग / हे गवरल भँवारे भँवरो फिर होजी बेरे लिलवट आंगळ चार हे गवरल / आंखडल्यों रतने जड़यो, नाक सुआ केरी चोंच हे गवरल / होठ हे परेवा गवरल रेखीया, होजी बेरे जीभ कमल के रो फूल हे गवरल॥

गौर अे गणगौर माता खोल किवाड़ी अे, बाहर उभी थांनै पूजण वाळी / पूजो अे पुजार्यां बायाँ, आसण-कासण मांगो / मांगो अे म्हे, अन्न धन ल / कान कँवरसो बीरो मांगा, राई सी भौजाई / राते धुड़ले बेनड़ मांगा, सांवळियों बेन्दोई / हाथ दे हथाळी दे, ननोणे फिर आयो, जूती रे मचाळके, चोवटे फिर आयो / ढोल रे ढमाके, बीरो लाडी लेय’र घर आयो / जठे बाई गवरजा, देवे हे आसीस्यों / बीरा म्हारो बधजो, बैल जोताईजो, भावज म्हारी जणजो, पूत सपूता / सातों ने सुपारी देसों, आठों ने पतासा, साल केरी सुइ अम्मा, डालके रा बागा / झटपट सीऊं म्हारे भाई- भतीजों रा बागा / आवो रे भतीजों, थोंरी भुवा लाई बागा, भुवा रे भरोसे, भतीजा रेयग्या नागा / नागा-नागा क्या करो, म्हे और सिवासों।

चून्दड़ी

इये चून्दड़ली रो म्हारी गवरजा बाई ने कोड / ले दोनी ओ ब्रह्मदतजी रा छावा चून्दड़ी म्हे तो फिरि आया घिरी आया, राजा-राणी देस-परदेस / कंटोड़े ने लाधी सवागण चून्दड़ी / आ तो लाधी रे लाधी हेमाचलजीरी प्रोळ (हाट) ओढोनी ओ भरमलजी री बेनड़, चून्दड़ी।

टीकी

आ टीकी म्हारी गवरल बाई ने सोवे तो, ईसरदासजी बैठ घडावे ओ राज / टीकी रमाक झमा, टीकी पणाक फूलां, टीकी हर्यो कसूंबो अे। टीकी दो बाई टीकी दो, आ टीकी म्हारी गवरजा बाई ने सोवै तो गवरजा बाई रो सुसरो गयो अजमेर, पाणीड़ो पिलाय गयो।

हीन्डो

चम्पे री डाळी हीन्डो मान्ड्यो तो, रेशम री गज डोर, ज्यों में हीन्डो मान्ड्यो तो, इये रे हिंडोळे ईसरदासजी पधार्या, तो ले बाई गवरजा ने साथ, ज्यों में हीन्डो मान्ड्यो तो, हौळे से हीन्डा देई पातळिया तो, धीमे से झोटा देई रे पातळिया तो डरपैला भरमल री बैन, ज्यों में हीन्डो मान्ड्यो।

दांतणिया

दांतणिया दराऊं म्हारी गवरल अे / काशीजी सूं टीकी मंगाऊं म्हारी गवरल अे / जयपुर सूं चून्दड़ी मंगाऊ म्हारी गवरल अे / आगरे सूं घाघरो मंगाऊं म्हारी गवरल अे / मथुरा सूं पेड़ा मंगाऊं म्हारी गवरल अे / बीकानेर सूं भुजिया मंगाऊं म्हारी गवरल अे।

बासो (पाणी पावण रा गीत)

  • बासो तो बसियो अे राणी गवरजा अे बाई गवरजा अे / बासो हमें बसियो जिकेरो, घर बसियो अे विष्णु बापजी तणो / अै विष्णु बापजी तणो, ज्यों रे घर लिछमी दे बऊनार / मीठा तो बोलीअे राणी गवरजा अे बाई गवरजा अै / बासो हमें बसियो जिकेरो, घर बसियो अे ब्रह्मा बापजी तणो / अै ब्रह्मा बापजी तणो, ज्यों रे घर गायत्री दे बऊनार / मीठा तो बोले राणी गवरजा अे बाई गवरजा अै।
  • ओ तो गैरो-गैरो गवरजा बाई रो ढोलो रंगरसिया, गैरोजी फूल गुलाब रो / थे तो घणो ही कमायो, अब घर आवो बालम रसिया, गैरोजी म्हारे माथै में मैंमद लाओ रंगरसिया / गैरोजी म्हारी रखड़ी बैठ जड़ाओ रंगरसिया, गैरोजी गैरो सासूजी थांरो जायो रंगरसिया / गैरोजी म्हारी हथेळी फरूके रुपिया लाओ रंगरसिया, गैरोजी फूल गुलाब रो।

सूवा

ईसरजी रा सुवा रे, हेठे तो ले लूं गोद में / तनै चुगो चुगाउं रे, लोंग सुपारी डोडा इलायची तनै पाणीड़ो पिलाउं रे / सोने री झारी गवरजा बाई रे हाथ में तनै ऐसो जिमाऊं रे / रबड़ी रो प्यालो गवरजा बाई रे हाथ में तनै बायरो ढुलाऊं रे / खस खस री पंखी म्हारे हाथ में थारे संग संग नांचू रे / सोने री झांझर म्हारे पांव में थारो नाच कराऊं रे / मोहर्यां तो वारूं थार नाच पर तनै इस्सो उड़ाऊं रे / उड़तो ना दीखे चारूं खूंट में ईशरजी पूरब जाइजो जी / ईसरजी पछिम जाइजो जी म्हारो नव तोळो रो नयो कंदोळो आंवता लाइजो जी / गवरजा कद पैरोंला जी, गवरजा कद पैंरोला जी म्हारे तीज चौथ रो मंडे मगरियो, जद पैंरौला जी।

आवो आवो छैल भँवरजी

  • चाँद चढ्यो गिगनार, किरत्यां ढळ रैयी है जी ढळ रैयी है / बाई गवरल घरां पधार, माऊजी मारेला जी मारेला / बाबोजी देसी गाळ, बडोडा (भरमल) बीरो बरजेला जी बरजेला / म्हारी (गवरल) बाई ने मत दो गाळ, बाई म्हारी परदेसणजी परदेसण / आ आज उड़े परभात, सवारे बाई उड़ जासी जी उड़ जासी / गवरल रा दिनड़ा चार, ईसरजी ले जासी जी ले जासी। चाँद चढ्यो गिगनार, किरत्यां ढळ रैयी है जी ढळ रैयी है।
  • ईशरजी तो पेचों बांधे गवरजा बाई पेच संवारे ओ राज / म्हें ईसर थांरी साळी छों, साळी छों, मतवाली ओ राज / भंवर पटां पर वारी ओ राज केसर की सी प्यारी ओ राज / लूंगा की सी बाड़ी ओ राज / म्हे ईसरजी तो आंगण आया गवरजा बाई चरण परवारे ओ राज / म्हे ईसरजी तो बागो पैरे गवरजा बाई कळी संवारे ओ राज / म्हे ईशरजी जामों पैरे गवरजा बाई इतर लगावै ओ राज / म्हे ईसरजी तो धोती पैरे गवरजा बाई लांग सवारे ओ राज।

घुड़लै री प्रथा (इतिहास री दीठ सूं)

घुड़लै रै लारै ख्यात है अर वा भी घणी इखियात है। सं.पन्दरह सौ अड्चास चैत सुद तीज रै दिन पीपाड़ में गवर री तीजणियां नै अजमेर रै सूबेदार मल्लूखां लूटी। वे तीजणियां उण घड़ लेखां ने सूप दी, जिणरी खबर सुण जोधपुर सू राव सातल (राव जोधा रा बेटा) री फौज लारे चढ़ी। कोसांणै गुढ़े दोनू तरफ तरवारां कढ़ी। घमासांण जुद्ध हुयो। घड़ लेखां रौ डील वींधीजग्यौ, अर उणरी मौत हुयी। तीजणियां कुसळ पाछी आई, उण जीत री खुसी में घुड़लै री रीत सरू हुयी। गवर भोळायां पछै घुड़लौ या तौ निवांण में न्हाख देवै, या वधार नै ठीकरियां घरे ले आवै, जके टाबर नै खुलखुलियौ हुवै उण टाबर रै गळे रै बांध देवै । घुड़ले री भेंट आयोड़ा आखा अर नारेळ सब साथणियां चिटकां बांट लेवै। काया रूपी घुड़लै में जीव रूपी जोत री ओपमा देतां थकां डिंगळ-गीत रा अे बोल अणमोल है –

मांटी रौ ठांम जोत जिण मांही, घण त्रिय फेरै घरी घरे।

घुड़लो कितीक वार घूमसी, फोड़ण बाळा लार फिरे॥

घुड़लै रौ तिंवार जीत रौ सुभ सूचक मंगळीक तिंवार गिणीजै, इण खातर घणौ हरख-उछाव करीजै। चैत सुद तीज सूं चैत सुद छठ तांई घुड़लै रौ तिंवार मनावै। माटी रै घुड़लै में घणा सारा ठींढ़ा हुवै, अर मांय दीवळो मेल कांनां रै सूत री आठी लपटावै। छोटी कंवारी छोरी नै उखणाय दूजी साथणयां घरो घर घूमती जावै अर गीत गावै – घुड़लौ घूमेला जी घूमेला / सुहागण बारै आव, घुड़लौ घूमैला। पी’र रौ पीळो लाव, घुड़लौ घूमेला / मण भरिया आखा लाव, घुड़लौ घूमेला जी घूमेला। म्हारो तेल बळे घी घाल, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / घुड़ले रे बांध्यो सूत, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / सुहागण बारै आय, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / ईसरदासजी रे जायो पूत घुड़लो घूमेला जी घूमेला / म्हारो तेल बळे घी घाल, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / सोने रो थाळ बजाय, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / मोत्यां रा आखा घाल, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / सोनो टक्को घाल, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / सुहागण बारै आय, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / जाये रा लाडू लाय, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / पीवर रो पीळो लाय, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / म्हारो हाथ बळे घी घाल, घुड़लो घूमेला जी घूमेला / म्हांरी रूई बळे रेशमदार, घुड़लो घूमेला जी घूमेला।

इयाँ सोळै दिनां रो ओ गणगौर रो तिंवार दुर्लभ मिनखा जूण रा लाखीणा बरस मैनत, मनवार, रगत-पसीणै री कमाई करता थकां आप री आस्थावां रा दिवळा संजोवै।

शिवनिवास, बर्तन बाजार, बीकानेर

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