ऋतुराज वसंत और जीवन का नवोन्मेष

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ऋतुराज वसंत और जीवन का नवोन्मेष

डॉ. कृष्णा आचार्य

(साहित्यकार, कवयित्री), बीकानेर

द्रुमाः सपुष्पाः सलिलं सपद्मं

स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धि:।

सुखाः प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः

सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते।।       ऋतुसंहार (कालिदास)

वसंत ’ऋतुराज’ कहलाता है। जब शिशिर के शीत का प्रकोप शांत हो जाता है, रात-दिन का परिमाण बराबर हो जाता है। गरमी का प्रारंभ न हो पाने से वसंत ऋतु सर्वाधिक सुखद लगती है। यह यौवन का, सौंदर्य का, आकर्षण का, आह्लादकता और मादकता का पर्यायवाची माना गया है। वसंत जब आता है तो बागों में फूल खिलने लगते हैं, वृक्ष पुष्पित होकर वातावरण में अपनी खुशी हंसी और सुगंध बिखरने लगते हैं, सरोवरों में कमल खिल जाते हैं, नवयौवन मचलने लगता है, वायु सुवासित हो जाती है, ठंड न पड़ने से शाम सुहानी लगती है, दिन सुंदर-सुखद लगने लगते हैं, ऐसे में पूरी सृष्टि चारू से चारूतर होजाती है। चूंकि शिशिर के पतझड़ से झरे पत्तों का, वनस्पतियों का तप पूर्ण हो गया है। नव स्वत किसलयों में उनका यौवन और प्रस्फुटित फूलों में उनके नव जीवन का उल्लास फूट पड़ा है, सुरभित सुमनों की माला पिरों कर वे सज-धज कर स्वागत हेतु आतुर हैं, कोकिल पंचम स्वर में मधुर गान सुनाने का तैयार है; गुंजारते मधुकर मंत्रोच्चार कर रहे हैं, शीतल मंद सुगंध पवन पंखा झूला रहा है, और चहचहाते पक्षियों का कलरव जयध्वनि से गगन गूंज रहा है क्योंकि ऋतुराज वसंत अपने सहचर कुसुमायुध कामदेव के साथ पदार्पण कर रहा है। उत्तरायण होते सूरज की किरणों में सुखद उष्णता आ गई है, प्रकृति के कण-कण में और वृक्ष-वल्लरियों के पोर-पोर से अल्हड़ मस्त यौवन की आह्लादक मादकता छलक पड़ी है जिसके जिससे जड़-चेतन सभी में मद-विद्वलता छा गई है। धवल चंद्रिका के उजास में पवन धीमे-धीमे चल रही है-

“चांदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद्र

गंध ही के भारन बहत मंद-मंद पौन।’’

कवि पद्माकर के अनुसार भौंरों की गुंजार में पहले की अपेक्षा कुछ अधिक मादक विशिष्टिता आ जाती है, तरुणों के अल्हड़ यौवन में आकर्षक उफान आ जाता है और पक्षियों के कलरव में भी विशेष मादक मधुरता भर जाती है-

“औरे भांति कुंजन में गुंजरत भौरे भीर

और डौर झौरन में वौरन के हवै गए

बागन में बगियन में बगरयो वसंत है।’’

कवि कालिदास कहते हैं-शीत लहर से मुक्त सुखदायक पवन मंजरियों से लदी आम की डालियों को हिलाता हुआ, कोकिल के मधुर स्वर को दिशाओं में फैलाता हुआ और लोगों के हृदयों को हरता हुआ बहने लगता है।

“रनित भृंग घंटावली झरत दान मधुनीर।

मंद-मंद आवत चल्यो कुंजर कुंज समीर।।’’    (बिहारी)

मंदिर गंधभार से अलसाए कुंजसमीर को बिहारी मतवाले हाथी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। गुंजार करती भ्रमर-पंक्ति, जिसके गले में टुनुन-टुनुन करती घंटियां है और जिसके कपोलों से मधु (पुष्पों का रस) रूपी मदजल चू रहा है तो कभी सुदूर दक्षिण देश से आने वाला मलयानिल उन्हें थकित बटोही के रूप में दिखाई देता है जिसके शरीर से मकरंद कण रूपी पसीने की बूंदे चू रही हैं और जो प्रत्येक वृक्ष के नीचे विश्राम कर-करके अपनी थकान मिटाता हुआ धीरे-धीरे उत्तर दिशा में अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा है-

“चुवत स्वेद मकरंद कन तरू-तरु तर विरमाय।

आवत दच्छिन देस तैं थकित बटोही बाय।।’’

वसंत केवल ऋतुओं का राजा ही नहीं है, वह तो समस्त संसार को श्रृंगार से सजाने वाला महा गुरू है। वसंत न आये तो प्रकृति केवल प्राकृत बनकर रह जायेगी, धरती को हरियाली की चुनर से कौन सजायेगा, ना ही वासंती हवाओं का ’प्रकृति-स्वर’ प्रस्फुटित होगा। तभी तो ऋतुसंहार के मधुर गायक कविगुरू कालिदास गाते हैं- “अमृत भरे होठों के जैसे लाल-लाल अशोक के फूलों से प्रेम की सीख देने वाला अनंग का मित्र वसंत आप का युगों-युगों तक भला करे।’’

वसंत जहां उतरता है वहीं का वातावरण जड़-चेतन सभी में प्रेम-माधुर्य बरसने लगता है। हिमालय पर वसंत उतरा था, तभी शिव और पार्वती का मिलन हो पाया। मालविकाग्नि मित्रम् की पार्वती ‘वसंतपुष्पाभरणम्’ अर्थात् वासंती फूलों के गहने पहने ही सखियों के साथ शिवजी’ के दर्शनार्थ गई थी और व्यकीर्यत त्र्यम्बकपादमूले पुष्पोच्चयः पल्लव भंग भिन्नः, वसंत के पल्लव मिश्रित पुष्प ही भगवान शिव के चरणों में बिखेर दिये थे। प्रणाम के लिए झुकते समय पार्वती के नीले केशों से वसंत का नवकर्णिकार पुष्प भी गिरा था और भगवान शिव जलमूर्ति से अग्निमूर्ति बन गए थे। जितेन्द्रिय शिव की उसी अग्नि से कामदेव भस्म होकर अनंग हो गए थे मगर पार्वती ने शिव को पा ही लिया था।

वसंत में श्रीकृष्ण वासंती हो जाते हैं और गोपियों के साथ मधुबन में महारास रचाते हैं। राधिका का फूलों से श्रृंगार करते हैं और कोयल की कूक में अपनी बासुंरी से ‘वसंत राग’ बजाते हैं। परंतु सीता हरण के पश्चात वियोगी राम को वसंत बहुत सताता है, क्योंकि वसंत में संयोग ही मन को सुकून देता है सुख से भरता है, प्रिया का वियोग तो शोक से भरने वाला होता है, जैसे वाल्मीकि के श्रीराम बोल पड़ते हैं-

अयं वसंतः सौमित्रे नानाविह गना दितः

सीतया विप्रहीणस्य शोक संदीपनो मम

अर्थात् हे सुमित्रानंदन! नाना प्रकार के विहंगमों के कलरव से गूंजता यह वसंत का समय सीता से बिछुड़े मुझे राम के लिए बहुत शोक बढ़ाने वाला हो गया है।

वसंत प्रेम, सौन्दर्य, श्रृंगार, मिलन, सृजन की मधुमय ऋतु है। प्रकृति नववधू-सी सज जाती है और चारों ओर सृजन के गीत गूंजते हैं, तभी तो सृजन का सबसे बड़ा प्रतीक पर्व महाशिवरात्रि वसंत में ही मनाया जाता है।

वसंत में नवस्फुरण है-नवोन्मेष। भारतीय वर्ष का आरंभ और अंत दोनों वसंत में होते हैं। इससे भारतीय मनीषा की रंग-संरचना, काल की अवधारणा और दृष्टि बोध का पता चलता है। वसंत अपने ही भीतर का हरियाली क्षेत्र है। जितनी उल्लासपूर्ण श्रेष्ठताएं हमारे भीतर और बाहर हैं। वे वसंत का ही रूप है। वसंत एक रंग है जो छूटता नहीं, वह भाव-अनुभाव है और हमें अभिभूत करता है। वसंत में सहज ही छिपा है ज्ञान, तप और प्रेम। ज्ञान- हमें जीवन में दिशाबोध कराता है। तप-कठिन मेहनत-संघर्ष के रूप में अपना परिचय देता है और प्रेम-प्रेम हमें सभी के प्रति सकारात्मक, संवेदनशील व सृजनात्मक बनाए रखता है। ये तीनों ही मानवता की अर्थगर्भित गतिशीलता के लिए आवश्यक है। अतः वसंत का सारगर्भित अर्थ हुआ-अपने समय की ऊर्जा को महत्त्व देना, तरुणाई को मान देना और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रकृति के साथ तालमेल बैठाते हुए आगे कदम बढ़ाना।

वसंत प्रेम का ऐसा कुंभ है, जहाँ हम संजीवनी स्नान करते हैं। माघ शुक्ल पंचमी से ऐसी रसवंती धाराऐं चलने लगती है जिनमें संगीत, साहित्य, कलाएँ अवगाहन होती है। माता सरस्वती के प्रभाव से पंचमी से अद्भुत सृजन की क्षमता बढ़ती हैं- प्रेम की, विद्या की, लिपियों की। इसीलिये इस दिन को अबूझ मुहूर्त वाला माना जाता है- अर्थात् सब कुछ शुभ एवं मंगलदायक।

कविता व कला का बीज है-वसंत। प्रत्येक पुष्प-पत्ती-तितली-भौरा-कोयल मानो पूरी प्रकृति गा रही हो, कोई सुनने वाला हो, साथ गुनगुनाने वाला हो। हमारी आभा का सर्वोत्तम प्राण केन्द्र वसंत है। दुख कहीं नहीं, किंतु वसंत दुख को तिरोहित कर एक गहन प्राकृतिक राग देता है। यह जीवन और काल को संयुक्त करता है, आंतरिक मनोभावों में आत्मीय उल्लास भरता है। हम जीना सीखें, इंद्रिय व वैयक्तिकता का द्वार खोलें, सबको अपना बनाएँ, “सर्वे भवन्तु सुखिन’’ की कामना करें, तब जाकर कविता, कला व साहित्य में सार्थकता आयेगी।

“मैं सृजन का उत्साह अनंत, मैं प्रकृति में, प्राणी में प्रसृत मैं हूँ नवोढ़ाओं का प्रिय कत।’

“मैं मदमाती प्रकृति का सुवास, मैं रक्तिम, दहकता पलाश, मैं ही भ्रमर, मैं ही पराग मैं ही हूँ वियोग और श्रृंगार।’’

चूंकि यह महोत्सव राग, आग और फाग का उत्सव है और प्रकृति के उत्सव का सजीव चित्रण। खेत सरसों की पीली चुनर ओढ़ लेते हैं, फूलों की सुमधुर सुवास तन-मन की भूख प्यास जगा देती है। पुराने विकारों, विवादों और विषादों का त्याग कर मनुष्य उल्लास उमंग, उत्साह के नए वस्त्र धारण करें तो वसंत की सार्थकता बने। प्रकृति का श्रृंगार जितना आल्हादित करता है उतना ही प्रेरणा भी देता है- कहता है नई आशा, नया उल्लास नव धारणाएँ और नये विचारों से व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास हो। कवि सुमित्रानंदन पंत कहते हैं-

“पत्रों में मांसल रंग खिला, आया नीली-पीली लौ से

पुष्पों के चित्रित दीप जला अधरों की लाली से चुपके

कोमल गुलाब से गाल लजा, आया पंखुडियों को

काले पीले धब्बों से सहज सजा, कलि के पलकों में मिलन स्वप्न

अलि के अंतर में प्रणय गान, लेकर आया प्रेमी वसंत

आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण’’

गुलाबी ठंड और गुनगुनी धूप के मध्य, अमलतास की पीली चमक और टेसू की लालिमा, इंद्रधनुषी रंग छिड़कता है यह वसंत इसे केवल प्रेमी और सहृदय ही जान सकते हैं। भंवरे, कोयल, चिड़ियां, तितलियां और वासंती बयार मीठी तान छेड़कर वसंत आगमन के हजारों संदेश हम तक पहुंचाते है, जिसका रसास्वादन करते हैं- प्रेमी और प्रकृति का पोर पोर।

अज्ञान के तिमिर का पर्दा जब उठता है तो ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलने लगता है। इस अमृतमय प्रकाशवान उत्सव में व्यक्ति तमस गुणों से मुक्ति पाकर राजस, सात्विक गुणों को अंगीकार करता है इसलिये वाणी, बुद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की साधना आराधना करते हैं तथा ये मंगल कामना करते हैं कि सम्पूर्ण विश्व में अमन-शांति हो और ज्ञान की रोशनी चारों ओर फैले।

सरस्वती, कृष्ण और शिव वसंत के आराध्य देव हैं। ज्ञान की देवी-सरस्वती कृष्ण-आल्हाद और प्रेम के देव और शिव-सहांर और निर्माण के देवता, साथ ही अनासक्त और समभाव के प्रतीक भी। गीता के दसवें अध्याय में श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि ऋतुओं में जो कुसुमाकर है, वह मैं ही हूँ।

कुसुमाकर अर्थात् कुसुम दलों के संपूर्ण सृजन का आदि स्वरूप और सौंदर्य चेतना का चरम प्रस्फुटन वसंत स्वयं ही है। यह परमात्मा का साक्षात् स्वरूप माना गया है। इस ऋतु को प्रकृति के श्रृंगार की ऋतु भी कहा जाता है।

काव्यशास्त्र में नवरस की धारणा भी वसंत के ऋतुराज रूप में जुड़ी हुई है। इसी कारण रसों में श्रृंगार रस ही ‘रसराज’ कहा गया है।

यदि संयोग श्रृंगार में मिलन के साथ सृजन में घटित हो तो रस बरसता है, अन्यथा वियोग श्रृंगार बन जाए तो श्री राम की तरह आंखों से आंसुओ की धारा बहने लगती है।

चैत्र में चरम परम वसंत छा जाता है, वासंतिक नवरात्र में श्रीराम जन्मोत्सव मनाकर वैशाख तक खिलता है। ये उत्तरायण की ऋतु है जब देवताओं का दिन होता है और सूर्यदेव अपनी प्रभा से दमकते हैं। कर्म पर निकले देवताओं के स्वागत में बसंत सारी सृष्टि का श्रृंगार कर देता है।

फाल्गुन में फाग के रंग-रस की वर्षा होती है और सारे मन मिल जाते हैं होली का श्रृंगार मन के विकारों का नाश कर देता है और वासंती नवरात्र के समापन पर ’श्री राम’ का प्राकट्य होजाता है।

यह सत्य है कि मनुष्य का सच्चा श्रृंगार प्रेम और परोपकार है। प्राकृतिक संपदा लुटाने वाले पेड़-पौधे, धरती – आकाश नदी-पर्वत सब संत हैं जो निष्काम भाव से सभी को देकर खुश होते हैं, झूमते हैं, नाचते हैं, गाते हैं।

यह भी सत्य है कि वसंत भले ही कामनाओं का जगाता हो पर वह स्वयं कोई कामना नहीं रखता। प्रसन्नता उसका चरित्र है और देना धर्म। किसी ने इसी भाव से प्रेरित होकर उच्चारा होगा कि “’सदा दीवाली संत की, बारह मास वसंत।’’ सद् पुरुष सदा प्रेम, करुणा, दया, मानवता और परोपकार के ही फूल खिलाते हैं।

वसंत ऋतु कवियों को अत्यंत प्रिय है। अनेक कवियों के की लेखनी ने वसंत के शुभागमन तथा इसके मादक सौंदर्य का चित्रण किया है। कवि केदारनाथ अग्रवाल ने झूमती, इठलाती वासंती हवा का चित्रण इन शब्दों में किया है –

“हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ, सुनो बात मेरी अनोखी हवा हूँ बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला।’’

चैत्र मास ऋतु परिवर्तन का महीना है इस समय वसंत अपने पूरे रंग में आ जाता है और गर्मी का अहसास होने लगता है। इस असंतुलन से शरीर में कफ बढ़ने लगता है इसलिये खानपान में ध्यान रखना भी जरूरी है।

चैत्र में नवरात्र उपवास के बहाने संयम का संदेश देता है। शीतला अष्टमी जैसे पर्व संकेत देते हैं कि बस! गरम भोजन से बचो गर्मी आने लगी है, भोजन थोड़ा ठंडा करके ग्रहण करो। हल्के, सुपाच्य एवं शीतल प्रकृति के खाद्य पदार्थों का सेवन करें। वसंत भ्रमण पथ्यम् अर्थात् वसंत ऋतु में घूमना लाभकारी माना गया है। चारों तरफ स्वच्छ वातावरण तन-मन के लिये अत्यंत लाभकारी होता है। बसंत में खुले स्थानोंपर भ्रमण से तन-मन में ऊर्जा उमंग-उत्साह का संचार भरता है। इन दिनों में सूर्य की उष्णता भी अधिक नहीं होती तथा जलवायु उत्तम होती है। मनुष्य ही नहीं, समस्त प्राणी जगत के लिए वसंत ऋतु अत्यधिक लाभकारी होती हैं।

यहाँ यह भी चिंतन का विषय है कि आधुनिक नगर सभ्यता, जब प्रकृति ही नहीं तो उसे उल्लास और अनुराग से आपूरित करने वाला वसंत नगरों-महानगरों के परिवेश में कैसे मिलेगा? वसंत के आने और जाने का आभास शहरी व्यक्ति को कैसे हो पायेगा? रामविलास शर्मा लिखते हैं- “वीरान हो चुके हैं सब बगीचे और जिवह कर डाले गए हैं सारे के सारे दरख्त! विकास के नाम पर उग आया है शहर में सीमेंट का बियाबान जंगल। अमलतास आए और पलाश की तो बात ही क्या, दिखाई नहीं देती दूर-दूर तक सरसों की झूमती कतारें तक! भला बताओ, अब कैसे सोचे-समझे बेचारे लोग कि कब आकर गुजर गया चुपचाप इस शहर से कम्बख्त वसंत?

अपनी दैनिक जीवन की जटिलताओं में उलझा आम आदमी को प्रकृति में होने वाले इस अद्भुत मनोहारी वसंत ऋतु पर नजर डालने का अवकाश ही कहाँ? लगातार बढ़ता प्रदूषण और जन के भार से धरती गर्मा रही है, बस्तियों के सैलाब और कारखानों के विकराल जाल प्रकृति को लील रहे हैं! ‘वसंत’ बेचारा बन गया हैकहाँ रहे? वह लड़खड़ाता आता है और आहें भरकर चला जाता है। परंतु सभ्य मानव ने अब अपनी गलती को स्वीकार कर ये एहसास कर लिया है कि प्रकृति के बिना जीवन मरण के समान है। पर्यावरण को बचाने, वृक्ष लगाने संकल्प वह होगया है, खुशी की बात यह है कि अब धरती फिर से वृक्ष-लताओं से हरी-भरी होगी और वस्तुराज वसंत पूर्ववत् राजसी ठाठ-बाट के साथ आकर सभी को हर्षित करेगा।

अस्तु! सृष्टि का चक्र चलाने के लिये वसंत से बेहतर कोई समयकाल नहीं हो सकता, वसंत हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अपनी बुद्धि को निर्मल रखते हुए, कर्म  से जुड़ें, सृजनात्मक स्वरूप को आगे बढ़ाएं, जितनी समरसता बढ़ेगी, वातावरण में पुष्पों का पराग उतना ही बढ़ेगा, जीवन के नवोदय व अभ्युदय के लिए यह एक अवसर उत्सव है, जिसके लिए सभी कोनया संकल्प भरना होगा तभी इस महाउत्सव, की सार्थकता होगी।

मैं अपने ही एक गीत की कुछ पंक्तियों से समाप्ति करना चाहूंगी-

खिलने दो-

नई कोंप लों को खिलने दो

नन्हे बीज धरती की कोख में पले

स्वप्न जो दबे थे फिर से मचले

मदमाती पवन हिल्लोरों से

मेरा मन उड़-उड़ चले

नवोन्मेष उत्साहित है, आगत से फिर मिलने दो-खिलने दो…

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