
डॉ. बसन्ती हर्ष
मानद् शोध निदेशक
मुख्य सम्पादिका ‘पुष्करणा सन्देश’
मासिक पत्रिका
भारतीय संस्कृति में वर्ष पर्यन्त अनेकानेक पर्व मनाये जाते हैं। आनन्द और उल्लास प्रदान करने वाले इन पर्वों का संस्कृति को सुदृढ़ रखने में विशेष महत्व रहा है। हमारे दिव्य दृष्टा पूर्वज मनीषियों के अनुसार इन परम्परागत रूप से मनाये जाने वाले पर्वों से एक विशेष प्रसन्नता, आनन्द व उमंग की प्राप्ति होती है जो सृष्टि की उत्पति करने तथा सुदृढ़ता प्रदान करने में विशेष सहायक होती है। पर्वों का मूल उद्देश्य भी लौकिक व आध्यात्मिक उन्नति करना है।
जिन क्षणों को सामूहिक रूप से मिल बाँट कर हंसी खुशी से मनाया जाये तो वे उत्सव या पर्व नाम से जाने जाते हैं। इस प्रकार पर्वों के लिए सामाजिकता व सामूहिकता होना आवश्यक है। इन्हीं पर्वों के अन्तर्गत गुरू पूर्णिमा का पर्व अन्य पर्वों से भिन्न होने के साथ अपनी एक अलग विशिष्टता रखता है। इसका मुख्य कारण यही है कि गुरूजन अपने शिष्यों को ज्ञान प्रदान करके उनके चरित्र व व्यक्तित्व निर्माण में अहम् भूमिका निभाते हैं।
भली भांति ज्ञान प्राप्त करने के बाद मानव में जीवन के प्रति एक स्पष्ट सोच तथा जागरूकता का भाव पैदा होता है। साथ ही विवेक बुद्धि प्राप्त होती है। यही गुण हमारे जीवन को कल्याण की ओर अग्रसर करता है। गुरू पूर्णिमा के पुनीत पर्व पर आइये इस बारे में कुछ महत्वपूर्ण चर्चा की जाये।
गुरू र्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरू: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरू पूर्णिमा से तात्पर्य सद्गुरू के ज्ञान व ब्रह्मज्ञान का सम्मान व पूजन करना है। गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
वशिष्ठ जी महाराज के पुत्र पराशर ऋषि के पुत्र वेदव्यास जी (जिन्हें गुरूओं के भी गुरू माना जाता है) का इस भारतमाता की धरती पर अवतरण आषाढ़ की पूर्णिमा को हुआ था। यही कारण है कि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को सभी स्थानों पर गुरू की पूजा अर्चना को विशेष महत्व दिया जाता है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्री रामचरित मानस के आरम्भ में गुरू के प्रति वन्दना करते हुए लिखा है –
बन्दऊं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु वचन रवि कर निकर।।
बन्दऊं गुरू पदुम परागा।
सुरूचि सुबास सरस अनुरागा।।
अर्थात् मैं गुरू महाराज के चरण – कमल की रज को प्रणाम करता हूँ,
जो अच्छी रूचि और प्रेम को उत्पन्न करने वाली, सुगन्धित और सार सहित है।
‘गारयते विज्ञापयति शास्त्र रहस्यम् इति गुरू’ अर्थात् जो वेदादि शास्त्रों के रहस्य को समझा देता है वह गुरू है (कृष्णं वन्दे जगद्गुरूम्)।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पुरातन काल से आज तक समस्त विश्व में गुरू का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। सद्गुरू अपने शिष्यों को सद्शिक्षा के द्वारा परमपिता से साक्षात्कार करवाने में सक्षम होते हैं।
यदि हम प्राचीनकाल के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व में गुरू को अत्यन्त सम्मानजनक पद प्राप्त था। गुरू ने सदैव शिष्यों को ज्ञान विज्ञान के साथ तपस्या, अनुशासन, संयम व सहजता आदि अनेकानेक गुणों का पाठ पढ़ाया । ‘उपमिति भाव
प्रपंचकथा’ – ‘रवरतरगच्छ पदावली’ एवं समराइच्च कथा के अध्ययन से हमें ज्ञात होता है कि प्रायः एक विधार्थी को गुरू के पास शिक्षा प्राप्त करने हेतु शुभ मुहूर्त देखकर भेजा जाता था जहॉं उसे विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी। गुरू को सर्वाधिक सम्मान प्राप्त होता था। साथ ही गुरू भी प्रत्येक विधार्थी को एक योग्य शिष्य बनाने का भरसक प्रयत्न करते थे। इसके लिए शिष्यों को कठोर अनुशासन में रहना पड़ता था।
पुस्तकों के ज्ञान के साथ – साथ व्यावहारिक शिक्षा पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था। इस प्रकार गुरूकुल में विद्या प्राप्त करके अनेक साहित्यकारों व विद्वानों ने विभिन्न शास्त्रों की रचना जो बाद में साहित्यकारों के लिए दिग्दर्शक बने। गुरूकुल के आश्रम में रहने के कारण गुरू व शिष्यों में परस्पर अत्यधिक आत्मीयता की भावना हो जाती थी। शिष्य चाहे धनवान हो या दरिद्र, सभी के साथ समान व्यवहार होता था।
परन्तु कालान्तर में सृष्टि के विकास के साथ – साथ गुरूकुलों का स्वरूप
बदलता चला गया। जिसके फलस्वरूप आध्यात्मिक उन्नति का स्थान भौतिकवाद ने ले लिया। गुरू भी पूर्ववत् अध्यात्मनिष्ठ व आत्मीय न होकर भौतिकवाद की ओर उन्मुख होने लगे। फलतः गुरू व शिष्यों के बीच पहले की तरह मधुर सम्बन्ध नहीं रहे।
गुरूजन शिष्यों को अपने ज्ञान से तृप्त करने की क्षमता व आकांक्षा से दूर होने लगे। जिसके परिणामस्वरूप शिष्यगण भी ज्ञान – विज्ञान की पुस्तकों में एकाग्रता से वंचित होने लगे। ‘सादा जीवन उच्च विचार‘ के द्वारा बौद्धिक विकास करने व आचार विचार को परिमार्जित करने की अवहेलना की जाने लगी।
सच पूछा जाये जो आधुनिक काल में प्रतिवर्ष गुरूपूर्णिमा के दिन की जाने वाली गुरू की पूजा – अर्चना की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हम एक बार पुनः प्राचीन सांस्कृतिक, सामाजिक व धार्मिक मूल्यों का भली भांति अवलोकन करके हमारे जीवन में उतारने का प्रयत्न करें। गुरूजी का भी यह कर्तव्य हैं कि वे शिष्यों के साथ तादात्म्य भाव स्थापित करके उन्हें सुशिक्षित व अनुशासित नागरिक बनायें।
फिर भी हमें सर्वसम्मति से इस तथ्य को स्वीकार करना ही होगा कि यदि गुरूजन कर्तव्यनिष्ठा से शिष्यों को पढ़ाये तो आज भी गुरू का स्थान व महत्व समाज में सर्वोपरि है। गुरू ही शिष्यों में ज्ञान, अनुभूति, अनुशासन के साथ – साथ नई दिशा प्रदान करता हैं। अतः गुरूजन सदैव वन्दनीय व पूजनीय हैं। इसीलिए कहा गया हैं कि –
गुरूवर रे उपदेस सूं मूरख ग्यानी होय
लोहो तो सुवरण हुवै, पत्थर पारस होय।
अर्थात् गुरूजनों के (भलीभांति) उपदेश (शिक्षा – दीक्षा) से मूर्ख व्यक्ति ज्ञानी बन जाता हैं । यही नहीं, उनकी शिक्षा के द्वारा लोहा स्वर्ण तथा पत्थर पारस बन जाता हैं। तात्पर्य यह है कि गुरूजन अपनी शिक्षा के द्वारा साधारण जन को भी महाज्ञानी व महापुरुष बनाने का सामर्थ्य रखते हैं।
गुरूपूर्णिमा का यह पर्व प्रतिवर्ष परम्परागत रूप से गुरूजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का, तथा उनके द्वारा निर्देशित त्याग, तपस्या, अनुशासन व आध्यात्मिक साधना को निरन्तर आगे बढ़ाने की प्रेरणा देने वाला हैं।
आस्था, श्रद्धा व समर्पण की भावना का प्रतीक यह गुरूपूर्णिमा पर्व बड़ों के प्रति सम्मान को अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट पर्व है। भगवान श्री राम भी माता पिता व गुरूजनों के प्रति विनयपूर्वक नमन करते थे।
प्रातः काल उठिके रघुनाथा, मातु पिता गुरू नावहिं माथा।
मानवीय प्रतिभा ज्ञान संवर्धन के द्वारा उत्कृष्टता को प्राप्त कर सके, हमारी भारतीय संस्कृति का सदैव यही लक्ष्य रहा है। यह श्रेष्ठतम कार्य गुरूजन ही भलीभांति कर सकते हैं जो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को निखार कर उन्हें मार्गदर्शन के द्वारा नई दिशा व प्रगति हेतु नई सोच प्रदान करते हैं। ज्ञान दीक्षा के प्रतीक गुरू पूर्णिमा पर्व को प्रतिवर्ष महत्ता देते हुए मनाने के पीछे भी यही सोच महत्वपूर्ण बन पड़ती है।
गुरु पूर्णिमा के सुअवसर पर समस्त गुरूजनों को कोटिशः वन्दन व नमन।
इति शुभम्
मिट जाये तमस् अज्ञान का
आलोक हो चहुं दिश ज्ञान का
