सदियों में पैदा होता है कोई भवानीशंकर

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सदियों में पैदा होता है कोई भवानीशंकर

गोविन्द जोशी

शिक्षाविद्, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार (हिन्दी एवं राजस्थानी)

साहित्य जगत के देदीप्यमान सूर्य से अधिक एक तपस्वी मेरे पिता तुल्य पूज्य गुरुदेव भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ के बारे में स्मृतिशेष लिखना हृदय को व्यथित और आँखों को अश्रुओं से भिगो रहा है। व्यास जी 11 अगस्त, 1935 को बीकानेर में अमरदत्त जी व्यास थानेदार जी के घर जन्मे, इसी मरुधरा में तप कर कुंदन बने, 3 दिसम्बर, 2025 को उदयपुर में ब्रह्मलीन हुए, दाह संस्कार हुआ 4 दिसम्बर, 2025 को जोधपुर में।

3 दिसम्बर, 2025 को मेरे प्रिय अनुज तुल्य डॉ. राकेश व्यास से फोन पर बात हुई और ये दुःखद समाचार मिला तो बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई को रोका लेकिन फोन रखते-रखते मेरा ‘बाका छूट गया’। मेरा तीव्र रुदन सुनकर मेरी गली-गुवाड़ के लोग इकट्ठा हो गए। मुझे ढाढस बंधाने लगे। मेरा रोना-बिलखना इस स्वार्थ से था कि 65 साल से मेरे सिर पर से छत्र छाया रखने वाला वरद हस्त जो उठ गया था।

लोकनायक स्वर्गीय मुरलीधर जी व्यास ने पाटी पूजन करके अक्षरों के संसार से मेरा साक्षात्कार करवाया और कुछ वर्षों बाद भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ को बुलाकर मुझे आगे की शिक्षा-दीक्षा के लिए उनको सौंप दिया। गुरुजी के एकमात्र पुत्र डॉ. राकेश व्यास, कैंसर रोग विशेषज्ञ और वर्तमान में गीतांजलि विश्वविद्यालय, उदयपुर के चांसलर मेरे बाल सखा है। गुरुजी से मेरे सम्पर्क सेतु मजबूत बनाने में उनकी मित्रता भी काम आई।

सन् 1967 में लोकनायक व्यास जी ने अपने आदर्श नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर एक गैर राजनीतिक संस्था नेताजी सुभाष सभा बनाई और उसका उद्घाटन करते हुए मुझे उसमें सचिव रूप में मनोनीत करते हुए मुझे ‘नन्हे नेताजी’ के नाम से संबोधित किया। उस उ‌द्घाटन समारोह का संचालन कर रहे गुरुजी भवानीशंकर जी व्यास ने भी मुझे नेताजी कहना शुरू कर दिया। डॉ. राकेश (पप्पू), सरोज (लाली), सुमन (मल्लू) भी मुझे भाई या भैया की बजाय ‘नेताजी’ ही कहती रहीं, यहां तक कि आनंद कौर जी व्यास (जिन्हें हम मम्मी, बाई या माँ की बजाय ‘जीजी’ के नाम से बुलाते हैं) भी मुझे नेताजी ही कहतीं। दोनों बहनें सरोज (लाली) और सुमन (मल्लू) रक्षाबंधन पर अपने माँजाए भाई डॉ. राकेश (पप्पू) से पहले मुझे राखी बांधती थीं। गुरुजी की माताश्री (जिनको हम सभी दादीजी की बजाय ‘बा’ कहते थे) मुझे गोविन्द भगवान कहकर बड़ी जोर से डकार लेतीं तो वे पूरे गली-गुवाड़ को झंकृत कर देतीं।

गुरुजी चूंकि सरस्वती पुत्र थे तो वे अधिकांशतः पोथियों के सागर में डूबे रहते, और कभी खुद भी लिखने लगते। हम बच्चों को उनसे प्रेरणा मिली। हम गुरुजी के पोथी संसार में उनकी अनुपस्थिति में चोरी-छुपे सेंध लगाते। गीत-कहानी-कविता की पुस्तकें पढ़ते। जीजी आनंद कौर जी ‘भोळावण’ देतीं कि जो किताब जहाँ से निकाली हो उसे वहाँ पर वापस वैसे ही रख देना नहीं तो ‘पापा’ मेरे पर ‘रोळा’ करेंगे। गुरुजी का अपने घर-परिवार पर अनुशासन और स्वभाव बहुत ‘अकरा’ था। ये तो जीजी आनंद कौर जी की ही महानता थी कि उन्होंने उनको ‘परोट’ लिया।

खैर! न जाने गुरुजी के पास ऐसी कौनसी अद्भुत ज्ञानेन्द्री थी कि वे अपनी पोथी-पानड़ों की फोर सार को हमारी लाख होशियारी के बाद भी ‘लख’ लेते। एक बार जीजी आनंद कौर जी हमारी ढाल बनकर सच-सच बोल गई कि ‘थांरी किताबां औ टाबर पढ़े, बोलो अबै कांई करणौ?’ यह सुनकर उन्होंने बड़ी खुशी जाहिर की, जिससे प्रोत्साहित होकर छोटी बहन मल्लू (साहित्यकार डॉ. सुमन बिस्सा) ने बचपन में ही हमारी गुवाड़ में लगने वाले ‘ठूंठा मेला’ पर एक कविता लिख दी। पप्पू (डॉ. राकेश व्यास) कवि गौरीशंकर जी आचार्य ‘अरुण’ की कविता ‘सैनिक’ का ओजस्वी पाठ करके जिलास्तरीय प्रतियोगिताओं में बाजी मारने लगे। मैंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन पर लिखे गए साहित्य का अध्ययन किया और एक पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की ‘अमर शहीदों के अमर गीत’। डरते-डरते गुरूजी को पढ़ने के लिए दी तो पढ़कर बहुत खुश हुए और बोले कि इसमें अभी काफी सामग्री की जरूरत है। आजादी के दीवानों के क्रांतिकारी गीतों की शोध करो और उनको अपनी पुस्तक में शामिल करो। डॉ. राकेश व्यास मुझे चिढ़ाता – आओ नेताजी! ‘अमर शहीदों के अमर अमरूद’ के क्या हाल हैं? सामग्री संकलन में बाधाओं के चलते वो काम पूरा नहीं हो सका तो गुरुजी ने कहा-बेटा नेताजी! निराश मत होओ! तुमने शुरू में ही बड़ी कठिन चुनौती ले ली, बहुत व्यापक विषय चुन लिया। सरल से कठिन की ओर बढ़ो। तुम अपनी रुचि से शहीदों की जीवनियाँ लिखो। गुरुजी की प्रेरणा से फिर 1983 में शहीदों पर मैंने तीन पुस्तकें लिखीं (1) खुश रहो अहले वतन (2) मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी (3) आजाद ही रहेंगे।

पुस्तकें पूरी करके अपनी पाण्डुलिपियाँ गुरुजी को पढ़ने के लिए दीं। एक सप्ताह बाद बोले- नेताजी! तुमने तो कमाल कर दिया। बहुत अच्छी लिखी हैं, तीनों किताबें बहुत ही बढ़िया हैं।

फिर तुरंत लैंड लाईन फोन उठाकर प्रकाशक कृष्ण जनसेवी को तीनों पुस्तकें प्रकाशित करने का हुक्म ही दे दिया। तीनों किताबें दिल्ली प्रिंटिंग प्रेस में छपने गईं। शिक्षा विभाग की खरीद में चयनित होकर वे पुस्तकें राजस्थान की सभी उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के पुस्तकालयों में क्रय की गईं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले 1980 में ग्रामीण, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर मेरी पोथी ‘तीजी आँख अकल री’ भी गुरूजी के मार्गदर्शन से प्रकाशित हो चुकी थी।

विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरे लेखन में बड़े व्यवधान आए मगर गुरुजी बराबर हौसला बढ़ाते रहते जिसके फलस्वरूप 38 वर्षों बाद मेरी पाँचवीं पुस्तक ‘सहेजने का सुख’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका सेवानिवृत्त आई. ए.एस. डॉ. ललित के. पंवार, संप्रति सदस्य, नीति आयोग, भारत सरकार एवं चांसलर, ग्लोबल युनिवर्सिटी, जयपुर ने लिखी थी। ‘सहेजने का सुख’ पुस्तक मैंने पूज्य गुरूदेव भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ और जीजी आनंद कौर जी को सादर समर्पित की थी। इस पुस्तक पर ‘रचनाशीलता के आयाम’ शीर्षक से आशीर्वाद लिखते हुए गुरुजी ने लिखा था -‘सहेजने का सुख’ पुस्तक दो बार आद्योपांत पढ़कर मैं विस्मित भी हुआ तथा एक हद तक चमत्कृत भी। यह सचमुच एक विलक्षण कृति है। इसमें एक साथ चार धाराओं का सम्मिश्रण है। ये धाराएँ हैं क्रमशः साहित्य की सृजनात्मक यात्रा का दिग्दर्शन, अजस्र लोक चेतना का अविरल प्रवाह, विलक्षण देशभक्ति की भावना तथा शिक्षा व साक्षरता को अनुष्ठान मानकर चलने की प्रवृत्ति।

अक्टूबर 2021 को ‘सहेजने का सुख’ पुस्तक के विमोचन समारोह में गुरुजी जोधपुर में थे और अस्वस्थता के कारण शामिल नहीं हो सके थे, तब 27 मार्च, 2022 को सुरभि की ओर से नरेन्द्रसिंह ऑडिटोरियम में ‘सहेजने का सुख’ पुस्तिक पर त्रिकोणीय पाठकीय चर्चा श्री भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ के मुख्य आतिथ्य और उपन्याकार श्रीमती आनंद कौर जी की अध्यक्षता में रखी गई थी। पुस्तक पर गुरूजी की सोच के अनुसार कई नवाचार किये गए जिसके अनुसार पहले नवाचार में पुस्तक के अलग-अलग खंडों पर चार साहित्यकारों श्रीमती प्रमिला गंगल, डॉ. अजय जोशी, डॉ. मूलचन्द बोहरा और डॉ. विष्णुदत्त जोशी ने अपनी-अपनी समीक्षाएँ प्रस्तुत कीं।

दूसरा नवाचार था कि एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों पिता, पुत्र और पौत्री के रूप में श्रीगोपाल जी उपाध्याय, पूर्व सरपंच, श्री महेश उपाध्याय, परियोजना अधिकारी, जन शिक्षण संस्थान, बीकानेर और प्रतिभा, फैशन डिजायनर ने पाठकों के रूप में अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ ने कहा कि “आज मैं ना तो सुरभि संस्था पर बोलूंगा ना ही ‘सहेजने का सुख’ पुस्तक पर बोलूंगा, आज मैं सिर्फ और सिर्फ गोविन्द जोशी पर बोलूंगा जो स्वयं ही अपने आप में एक किताब है, एक संस्था है। गोविन्द जोशी के प्रत्येक कार्य के पीछे लगन, कार्यनिष्ठा व एकाग्रता का भाव रहता आया है। मैं उसका साक्षी रहा हूँ। बीकानेर में 1980 से 1996 तक सोलह वर्षों तक साहित्यिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक गतिविधियों में यह हमेशा अग्रणी रहा है। सच पूछें तो उस समय की स्मरणीय घटनाओं में गोविन्द जोशी का योगदान अविस्मरणीय है।”

अंत में गुरुजी ने कविता के रूप में अपना आशीर्वाद देते हुए कहा-

ध्येयनिष्ठ, कर्मठ सदा, सच्चरित्र गतिशील

मौलिक चिन्तन-मनन में, लेखन में लवलीन

ऐसे सद्‌गुण देखकर, निकले यह निष्कर्ष

गोविन्द का होता रहे, नित्य नूतन उत्कर्ष।

सन् 2023 में राजस्थानी, भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के आशिक सहयोग से पुस्तक ‘मुरधर की मठोठ’ (आंचलिक उपन्यास) प्रकाशित हुई। पुस्तक की भूमिका में गुरुजी ने लिखा था-

“गोविन्द जोशी री ओक निरवाळी विसेसता आ है कै बो जिकै काम नै अंगेजै उणनै पूरे मनोयोग लगन अर गैराई सागै पूरो करै ओ ई कारण है कै उणरी सगळी पोथ्यां चरचित हुई। लेखक री पांचवीं पुस्तक ‘सहेजने का सुख’ री राजस्थान भर में चरचा हुई, उण माथै कैई समीक्षावां छपी, विचार-विमर्श हुया अर पोथी रै सगकै खंडा माथै न्यारा-न्यारा विद्वानां बारीकी सूं विवेचना करी। म्हारी दीठ में ‘मुरधर री मठोठ’ राजस्थान भासा री उपन्यास जातरा में टाळ्वों, टणको अर हरावळ जोग है। साव ‘नुवै धरातळ माथै रचियोडो उपन्यास जिको दूजी भासावां रै उपन्यांसां री पंगत में माथौ ऊंचो कर ‘र ऊभो हुय सकै आ पोथी पूर देस में राजस्थानी री कीरत बढ़ावैला।”

मेरी आठवीं पुस्तक ‘अस्मिता का आकाश’ (संस्मरण) जुलाई, 2025 में प्रकाशित हुई। पांडुलिपि भूमिका लेखन के लिए तैयार थी मगर गुरुजी उदयपुर में थे और अस्वस्थ चल रहे थे। गुरुजी से बात हुई और उन्होंने देश के जाने-माने व्यंग्यकार, स्तम्भ लेखक जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, जयपुर के पूर्व उपाध्यक्ष श्री बुलाकी शर्मा से भूमिका लेखन हेतु निवेदन करने के लिए निर्देशित किया। मैं भाई बुलाकी जी से मिलने के लिए पहुंचा ही था कि मेरे से पहले ही गुरुजी का फोन बुलाकी जी के पास पहुंच गया। उन्होंने बुलाकी जी को कहा कि गोविन्द जोशी की पुस्तक ‘अस्मिता का आकाश’ की भूमिका आपको जल्दी से जल्दी लिखकर देनी है। इतना ही नहीं पन्द्रह दिनों में दो बार फोन करके तकाजा भी कर दिया। गुरुजी मेरी पुस्तक की भूमिका नहीं लिख पाए तो एक पेज का आशीर्वाद लिखकर भेज दिया, जो पुस्तक में ससम्मान प्रकाशित हुआ। इतने में ही उनके ‘गोविन्द स्नेह’ को चैन नहीं आया तो ‘अस्मिता का आकाश’ के विमोचन समारोह के मात्र डेढ़ महीने बाद उनकी लिखी समीक्षा अचानक 17 सितम्बर, 2025 को मेरे मोबाइल के व्हाट्सअप पर अवतरित हो गई। ‘मननीय, संग्रहणीय और प्रेरणादायक पुस्तक अस्मिता का आकाश’ शीर्षक से भूमिका में गुरुजी ने लिखा कि” श्री गोविन्द जोशी की पुस्तक ‘अस्मिता का आकाश’ एक ऐसी अनूठी पुस्तक है जिसने मुझे दो कारणों से प्रभावित किया। पहला कारण लेखक की अद्भुत भाषा सजगता का है तथा दूसरा विषय सामग्री की प्रामाणिकता व विश्वसनीयता का। भाषा सरल, स्वाभाविक, बोधगम्य व प्रवाहमय है। उपयुक्त शब्द-चयन व वाक्य विन्यास, पाठकों से संवाद करने वाली आत्मीय शैली, यथा-स्थान आंचलिक व बोलचाल के शब्दों का प्रयोग, मुहावरों, कहावतों, अखाणों व उद्धरणों की गहराई इतनी प्राणवान है कि पाठकों को वह अपने साथ बहा ले जाती है। भाषा में न शब्द-स्फीति है और न अनावश्यक पांडित्य प्रदर्शन और क्लिष्टता का संवाद ।

गुरूजी के 88वें जन्मदिवस पर 11 अगस्त के अवसर पर दैनिक युगपक्ष में मेरा आलेख’ श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’: आशीर्वाद की अजस्र धारा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। सुबह 6 बजे उन्होंने आलेख पढ़ा और 7:30 बजे मुझे व्हाट्सअप पर अपनी त्वरित टिप्पणी भेजी-

“तुम्हारा आलेख स्मृतियों से गुंफित सर्वथा प्रमाणिक एवं भावपूर्ण है। तुमने मेरे जीवन में साहित्यिक, सांस्कृतिक और यहां तक निजी क्षेत्रों में जितना सहयोग दिया है उतना और किसी ने नहीं दिया। चिरायु हो, स्वस्थ रहो और समाजसेवा करते रहो। इन दिनों जो साहित्यिक सक्रियता बनी है उसको निरंतर बढ़ाये रखो।”

मरूनवकिरण पत्रिका द्वारा जुलाई-सितम्बर 2023 का अंक श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ की समग्र साहित्य साधना पर केन्द्रित था। इसके प्रधान संपादक डॉ. अजय जोशी और अतिथि संपादक श्री राजाराम स्वर्णकार के आग्रह पर मैंने भी एक आलेख भेजा जो प्रकाशित हुआ था ‘आनंद संग बिराजे भवानी’ शीर्षक इस आलेख को पढ़कर गुरूजी ने अपनी इस टिप्पणी से आशीर्वाद दिया- ‘आनंद संग बिराजे’ भवानी संबंधों की प्रगाढ़ता दिखाने वाला आत्मीयता भरा एक भावपूर्ण आलेख है। इसमें कलम नहीं हृदय बोलता है, अक्षरों से कहीं ज्यादा धड़कनें सुनाई देती हैं।

कोरोना काल में गुरुजी अपने पुत्र डॉ. राकेश व्यास के साथ जोधपुर रहने चले गए मगर उनका मन बीकानेर में रसा-बसा था। बीकानेर समय-समय पर आते-जाते रहते।

मैं जोधपुर और तत्पश्चात् उनके उदयपुर शिफ्ट हो जाने के बाद फोन से प्रतिदिन संपर्क कर ‘चरण वंदन’ करता। सुबह उठते ही पहले गुरुदेव को चरण वंदन, प्रणाम और उसके बाद कोई अन्य काम। पूरे 6 वर्ष यह क्रम अनवरत निर्बाध चला। फोन से बात नहीं होती तो व्हाट्सअप से मैसेज भेज कर ‘भोर वंदन’ करके सादर चरण स्पर्श स्वीकार करने का अनुरोध भेजता। गुरुजी की आशीष मिलती रही, ऐसे सैकड़ों संदेश हैं मगर सिर्फ बानगी के रूप में उनके कुछ संदेश पढ़िए –

तुम्हारा “सादर चरण स्पर्श” मैं प्रतिदिन मौन भाव से स्वीकार कर लेता हूँ। चिरंजीवी हो, यशस्वी हो। (12 जुलाई, 2023 6.04)

घटनाओं के संयोजन एवं स्मृतियों को सहेजने में तुम्हारा काम अतुलनीय रहा है। इतना ही कहा जा सकता है कि “गोविन्द की लीला गोविन्द ही जाने, और न जाने कोय। (20 अगस्त, 2023 6:42)

13 सितम्बर, 2023 को उन्होंने एक काव्यात्मक संदेश आशीर्वाद स्वरूप भेजा था-

चंद्र टरै, सूरज टरै, टरै लोक व्यवहार,

पर भोर प्रणाम गोविन्द को टरै न एकहुबार।

गुरुजी ने अपने जीवन में अनेक संस्थाएँ बनाई और योग्य व्यक्तियों को संचालन करने का जिम्मा देकर मार्गदर्शन करते रहे। किसी संस्था में कोई पद नहीं लिया। एक संस्था ‘सुरभि’ बनाई जो इसका अपवाद रही। इस संस्था के जन्म की कहानी भी बड़ी रोचक है।

15 अगस्त, 1980। स्टेशन रोड़, बीकानेर। फोर्ट स्कूल के सामने स्थित जयहिंद होटल। चाय की इस दुकान पर श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ जिला प्रशासन, बीकानेर द्वारा सायंकाल होने वाले कवि सम्मेलन-मुशायरा में आमंत्रित मित्रों के साथ चाय पर चर्चा कर रहे थे। अचानक ‘विनोद’ जी ने एक बिंदु उठाया बीकानेर में साहित्य, संगीत, नाट्य और शिक्षा आदि क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाएं तो बहुत बनी हुई हैं, काम भी अच्छा कर रही हैं मगर सभी संस्थाएं लीक-लीक ही चल रही हैं, मैं चाहता हूँ कि साहित्य-संस्कृति क्षेत्र में एक ऐसी संस्था बनाई जाए जो नवाचारी गतिविधियों का आयोजन करे। पूर्व महापौर श्री भवानीशंकर शर्मा उर्फ भवानी भाई भी उस वक्त वहाँ उपस्थित थे, वे तपाक से बोले- व्यास जी! आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, आप आज और अभी संस्था का नाम और तदर्थ कार्यकारिणी घोषित कर दीजिए, हम सभी मित्र आपके साथ हैं। भवानी भाई ने अपने चोळे की जेब से इक्यावन रूपए निकाले और बोले-नई-नवाचारी संस्था के लिए व्यास जी को सब यथाशक्ति अपना-अपना आर्थिक सहयोग सामर्थ्य और रुचि अनुसार अभी तत्काल दे देवें। उस समय उपस्थित श्री हरीश भादानी, डॉ. जयचन्द्र शर्मा, श्री धनंजय वर्मा, श्री मोहम्मद सदीक, श्री दीन मोहम्मद मस्तान, श्री इब्राहीम गाज़ी, श्री बुलाकीदास ‘बावरा’, श्री लालचन्द भावुक, श्री अजीज आजाद, श्री ए.वी. कमल, श्री अंबिकादत्त शास्त्री और श्री गोविन्द जोशी आदि ने अपनी ओर से जो राशि दी वो कुल 248 रूपए हुई, जो भवानीशंकर जी व्यास ने श्री गोविन्द जोशी को सौंप दी। नई नवेली संस्था का नाम ‘सुरभि’ रखा। पूरा नाम- ‘सुरभि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान’। सर्व सहमति से गोविन्द जोशी को संस्था संचालन के लिए संस्था का सचिव मनोनीत किया गया। 1980 का वो पहला और आखिरी चंदा था उसके बाद संस्था ने कभी अपने आयोजनों के लिए कोई चंदा संग्रहण नहीं किया। आयोजनों का सारा व्यय भार सुरभि अध्यक्ष गुरु भवानीशंकर जी और सचिव शिष्य गोविन्द जोशी ही वहन करते रहे। 2020 तक ये सिलसिला यूं ही चलता रहा। कोराना काल में श्री भवानीशंकर जी जब जोधपुर शिफ्ट हो गए तब संरक्षक मंडल और कार्यकारिणी ने सर्व सहमति से श्री गोविन्द जोशी को सचिव से अध्यक्ष पद पर पदोन्नत किया और संस्था के सक्रिय सदस्य श्री दिनेश उपाध्याय को सचिव मनोनीत किया गया।

सुरभि के कार्यक्रम 1980 से 2020 तक गुरुजी के अध्यक्षीय कार्यकाल एवं 2020 से 2025 तक उनके प्रमुख संरक्षक पद की छत्रछाया में सम्पन्न हुए। सुरभि के कार्यक्रमों की रूपरेखा और हर छोटी-बड़ी बात उन्हें जोधपुर और उदयपुर रहने के वक्त भी उनके अनुमोदन से फोन कॉल और व्हाट्सअप संदेश के माध्यम से होती रही। 27 जुलाई, 2025 को नोखा में आयोजित मेरी पुस्तक ‘अस्मिता का आकाश’ के विमोचन समारोह में गुरुजी ने अपना आशीर्वाद संदेश उदयपुर से भाई बुलाकी जी शर्मा के मोबाइल पर भेजा। जिसे सुनकर उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। गुरुजी के उद्गार थे-

“45 वर्ष पूर्व स्थापित सुरभि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान, बीकानेर का आद्योपांत एक उज्ज्वल इतिहास रहा है। इस पूरी अवधिप में सुरभि ने बीकानेर और राजस्थान में सदैव रचनात्मक संस्था की भूमिका का निर्वाह किया है यह संस्थान जनसेवा, साधना, संकल्पवद्धता, देशप्रेम और मानवीय चेतना का प्रतीक है। इसने अपने समस्त कार्यकलापों में भारतीय मूल्यबोध और सदियों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं को निभाते हुए अनेकानेक संस्थाओं की भीड़भाड़ में अपनी सर्वथा अलग पहचान बनाई है।”

मुझे इस संस्था से जुड़ाव पर गर्व है और मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूँ। संस्था ने हमेशा लोकनायक मुरलीधर व्यास के सिद्धांतों का पालन किया है और समाज में जागृति फैलाने का काम किया है। सौभाग्य से श्री गोविन्द जोशी जैसे निश्छल, निःस्वार्थ, ओजस्वी, ऊर्जावान एवं नियमित गतिशील, व्यक्ति द्वारा इसका संचालन हो रहा है। ये हमारे लिए अपूर्व गौरव का विषय है। अस्मिता का आकाश के विमोचन समारोह में अस्वस्थ होने के कारण उदयपुर से चाहते हुए भी मेरा आना संभव नहीं हो पा रहा है किंतु इस समारोह में मेरी मानसिक उपस्थिति बनी रहेगी। प्रिय श्री गोविन्द जोशी को नई पुस्तक’ अस्मिता का आकाश’ के प्रकाशन और विमोचन समारोह की सफलता के लिए अशेष मंगलकामनाओं के साथ सुरभि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान के स्वर्णजयंती महोत्सव की सफलता की अग्रिम संकल्पना करता हूँ।”

20 सितम्बर, 2025 को अजित फाउण्डेशन में आयोजित धनंजय वर्मा की स्मृति में ‘चितार समारोह’ के आयोजन की संकल्पना भी आपने उदयपुर में बैठे हुए ही की और मेरे मोबाइल पर भेजी, जिसे सुरभि ने शाद्वल अखबार के डॉ. अभयसिंह टाक और अजित फाउण्डेशन के सहयोग से साकार किया। कीर्तिशेष श्री धनंजय वर्मा की धर्मपत्नी श्रीमती सुधा वर्मा का अभिनंदन करने के साथ-साथ श्री जानकीनारायण श्रीमाली, श्री रवि पुरोहित, श्री राजेन्द्र स्वर्णकार, श्रीमती मनीषा आर्य सोनी को माल्यार्पण, प्रशस्ति-पत्र, श्रीफल, शॉल, कलम, पुस्तकें, डायरी आदि भेंट कर उनकी सेवाओं का सम्मान किया गया। मंच से डॉ. उमाकांत गुप्त, श्री बुलाकी शर्मा, श्री पृथ्वीराज रतनू, श्री ओमप्रकाश सारस्वत आदि विद्वानों ने धनंजय जी के साहित्य की उपलब्धियों और उनके व्यक्तित्व कृतित्व पर अपने विचार साझा किए।

इस समारोह में भी गुरुजी ने उदयपुर से मेरे मोबाइल पर संदेश भेजा। उन्होंने कहा-

“सुरभि संस्था को इस बात का श्रेय है कि उसने श्री धनंजय वर्मा का सार्वजनिक अभिनंदन का स्मरणीय कार्यक्रम टाऊन हाल, बीकानेर में सन् 1983 में नगर के प्रतिष्ठित मनीषियों के सान्निध्य में किया। सुरभि के पश्चात् तो उनके अनेक सम्मान कार्यक्रम हुए पर प्राथमिकता का एकमात्र श्रेय तो सुरभि को ही है। धनंजय वर्मा स्वयं सुरभि के आयोजन से अभिभूत थे और अक्सर उस गरिमामय आयोजन का जिक्र करते रहते थे। धनंजय वर्मा बीकानेर और राजस्थान के लब्ध प्रतिष्ठित एवं लोकप्रिय कवि थे। वे कवि सम्मेलनों के मेरूदण्ड थे। उनकी कविताओं पर तालियों की जबरदस्त गड़गड़ाहट लगातार चलती रहती। कविता की अमरता और शाश्वतता का और क्या प्रमाण हो सकता है।”

गुरुजी ने मुझे फोन पर सुरभि के सन् 2030 में पच्चास वर्ष पूर्ण होने पर तथा कीर्तिशेष धनंजय वर्मा के सन् 2032 में जन्मशताब्दी पर सुरभि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान को यथा समय होने वाले अन्य कार्यक्रमों के अलावा भव्य आयोजन करने के लिए विशेष रूप से निर्देश प्रदान किए।

अजातशत्रु, महामानव, लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कवि, उद्भट मंच संचालक, रेफरेंस पर्सन, एनसाइक्लोपीडिया श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ के ब्रह्मलोक होने की सूचना जब मैंने व्हाट्सअप मैसेज द्वारा सेवानिवृत्त वरिष्ठ आई.ए.एस., मेरे परम मित्र डॉ. ललित के पंवार (संप्रति सदस्य, नीति आयोग, भारत सरकार एवं चांसलर, विवेकानंद ग्लोबल युनिवर्सिटी, जयपुर) को दी तो तुरंत उनका दुबई से कॉल आया। अश्रु भरे नयनों और रूंधे कण्ठ से उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा “भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ जैसे व्यक्ति आज की मिट्टी में पैदा होने ना के बराबर हैं। उस महामानव के जाने से न केवल हिन्दी और राजस्थानी साहित्य जगत की क्षति हुई है बल्कि उस विराट व्यक्तित्व के जाने से पूरे राजस्थान प्रदेश की अपूरणीय क्षति हुई है।

श्री ओमप्रकाश सारस्वत, सेवानिवृत्त, संयुक्त निदेशक, शिक्षा विभाग, राजस्थान ने भी मुझे कॉल करके संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि “गुरुजी जब शिक्षा विभाग की पत्रिकाओं (शिविरा मासिक) और Teachers today (त्रैमासिक) के वरिष्ठ संपादक थे तब मैंने उनके अधीनस्थ अधिकारी के रूप में कार्य किया। मैंने अपने जीवन में उनके जैसा कुशल और संवेदनशील प्रशासनिक अधिकारी नहीं देखा। कठोर परिश्रम, ईमानदारी, समय की पाबंदी जैसे अनेक गुणों के स्वामी व्यास जी सर अच्छे काम की दिल खोलकर तारीफ करने और कमी-त्रुटि को संकेत में समझाने का सर का कमाल अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय था। अनुशासन उनके शरीर में प्राणों की तरह समाया था।

अनेक साहित्यकारों ने गुरुजी को अपने आलेखों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी। प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री बुलाकी शर्मा ने लिखा- “कविता को ही जीवन मानते थे भवानीशंकर”, श्री राजाराम स्वर्णकार ने लिखा- “साहित्य की अनुपम पूंजी थे गुरुजी।” डॉ. सतीशकुमार ने लिखा- “स्नेहिल छांव देते वटवृक्ष थे भवानीशंकरजी”, संजय आचार्य ‘वरुण’ ने लिखा-“यह केवल देह का अवसान है भवानीशंकर जी कहीं नहीं गए” तो अशफाक कादरी ने लिखा- अनूठी वक्तृत्व कला के सम्मोहक जादूगर थे भवानीशंकर”।

अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखनी शुरू की और खुशी की बात है कि वे उसे पूरा कर गए। डॉ. सुमन के निर्देशन में पांडुलिपि की टाईपिंग जारी है, उम्मीद करते हैं कि उनकी वो कालजयी कृति शीघ्र ही प्रकाश में आयेगी।

विभिन्न रंगों और गुणों के विराट व्यक्तित्व के स्वामी कीर्तिशेष गुरुदेव भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ को मेरा अंतिम नमन जिनकी रगों में साहित्य-सुरभि की सरस सौरभ अजस्र रूप से प्रवाहित होती रहती थी।

मोहम्मद इकबाल का यह शेर गुरुजी के धन्य जीवन पर बहुत ही सटीक है-

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

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