मकर संक्रान्ति : आध्यात्मिकता व वैज्ञानिकता का प्रतीक पर्व
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डॉं. श्रीमती बसन्ती हर्ष
शोध निदेशक
मुख्य सम्पादक
पुष्करणा सन्देश मासिक पत्रिका
सृष्टि के आदिकाल से ही धरा अपनी धुरी पर सूर्य की परिक्रमा करते हुए समय चक्र को गतिमान करने में सहायक बनती है। इसी के साथ ऋतुएं भी निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं। इसी के अन्तर्गत ग्रीष्म, शिशिर, वर्षा, हेमन्त व बसन्त आदि ऋतुएं समस्त प्रकृति व मानव जाति को प्रभावित करती हैं । इन्हीं ऋतुओं के अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने त्यौहारों की परम्परा प्रारम्भ की। स्थान, जलवायु तथा भौगोलिक स्थिति के अनुसार प्रत्येक स्थान पर भिन्न – भिन्न प्रकार के त्यौहारों को अलग – अलग तरीके से मनाया जाता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि आज के भौतिक युग में इन त्यौहारों को मनाने की क्या उपयोगिता व उपादेयता है? वस्तुतः आज के आपाधापी की त्रासदी ने सभी को अलग – थलग कर दिया है। अपने कर्म में संलग्न रहकर हम अपने लोगों से दूर होते जा रहे हैं। संस्कारों का भी धीरे – धीरे पतन होने लगा है। अतः सामाजिक सुदृढ़ता व संस्कारों के पुनरूथान हेतु त्यौहारों की महत्ता स्वयं सिद्ध है। इन त्यौहारों के आयोजन से हम कुछ समय के लिए अपने अनेकानेक कष्टों को भुलाकर स्वजनों व मित्रगणों के साथ जीवन में आनन्द की अनुभूति करते हैं। इससे अपनत्व की भावना का विस्तार तो होता ही है साथ ही मनोरंजन के साथ – साथ कलात्मकता का भी विकास होता है।
भारतीय संस्कृति के इतिहास में पर्वों का नितान्त गौरवपूर्ण स्थान है। वास्तव में इन्हीं पर्वों की सुदृढ़ आधारशिला पर हमारी सभ्यता व संस्कृति का विशाल प्रासाद सुप्रतिष्ठित है। लौकिक सफलता के लिए जिस प्रकार कर्म व श्रम की महत्ता है उसी प्रकार संस्कारों को स्थायित्व देने के लिए पर्वों की उपादेयता निःसंदिग्ध है ।
हमारे माननीय पूर्वजों ने वर्ष पर्यन्त मनाये जाने हेतु जिन पर्वों का प्रतिपादन किया उनका यदि तर्क-विन्यास किया जाये तो कदाचित् हम इनके गुणों को नहीं पहचान पायेंगे। परन्तु यदि गहन चिन्तन – मनन करें तो इन की उपयोगिता स्वयं सिद्ध होगी। इन्हीं पर्वों में से एक महत्वपूर्ण पर्व है मकर संक्रान्ति जो आध्यात्मिकता का भाव तो प्रेरित करता ही है साथ ही इसका वैज्ञानिक कारण हमें इस पर्व के प्रति आस्तिकता के भाव जगाता है।
आइये, मकर संक्रान्ति के पावन पर्व के उपलक्ष में इसी से सम्बन्धी विवेचना करते हैं। प्राचीनकाल के हमारे पूर्वज मनीषिगण बहुत दूरदर्शितापूर्ण मनोविज्ञान के ज्ञाता थे। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने यह जान लिया कि मात्र शुष्क गतिविधियों से जीवन में नीरसता भर जायेगी । अतः शक्तियों के प्रतीक देवी देवताओं की उपासना के साथ – साथ मिलजुलकर कोई कार्यक्रम करने की परम्परा चालू की गई। सबके साथ हर्षोल्लास पूर्वक कोई समारोह मनाने को ही पर्व या त्यौहार कहा जाता है।
शरीर को हृष्ट पुष्ट करने के लिए जिस प्रकार से सन्तुलित पोषण की आवश्यकता है, उसी प्रकार से मानवी अन्तःकरण को संस्कारित व परिष्कृत करने के लिए पर्वो की उपादेयता स्वयंसिद्ध है।
वर्ष पर्यन्त मनाये जाने वाले दीपावली, होली, गणगौर, अक्षय – तृतीया आदि अनेक पर्वो के साथ – साथ मकर संक्रान्ति का भी अपना महत्व है। सूर्य का मकर राशि में संक्रमण या प्रवेष करना ही मकर संक्रान्ति कहलाता है। हिन्दुओं में प्रायः सभी पर्व विक्रम संवत् के अनुसार मनाये जाते है। जबकि मकर संक्रान्ति व लोहड़ी पर्व ईसवी सम्वत् की दिनांक के अनुसार मनाये जाते हैं। इस अवसर पर इस पर्व को सर्वत्र हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता हैं । पिछले सहस्त्र वर्षों से यह संक्रमण 14 जनवरी के दिन होता है। संयोग से पिछले कुछ साल पूर्व यह संक्रमण 14 जनवरी के बजाय 15 जनवरी को हुआ था। मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य की गति दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर हो जाती है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।
शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मकर संक्रान्ति पर्व देवताओं का प्रभात काल है। इसके परिणामस्वरूप समस्त चराचर जगत में व समस्त वातावरण में नवीन उत्साह, उमंग व जीवनी शक्ति का संचार होने लगता है। इस प्रकार से भारतीय संस्कृति में यह आध्यात्मिकता का प्रतिरूप है । वस्तुतः मकर संक्रान्ति पर्व समग्र मानव जाति के लिए मंगलमय होने के साथ – साथ सार्थक जीवन का भी आधार स्तम्भ है। इस पर्व में समष्टि के साथ व्यष्टि की उदात्त भावना निहित होने के कारण मानव का मानसिक व आध्यात्मिक विकास समाविष्ट है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध तथा अनुष्ठान आदि का अत्यधिक महत्व है । इसके पीछे कदाचित् यही भावना रही होगी कि इससे मानव जीवन को एक सुनिश्चित दिशा व गति प्राप्त हो। साथ ही जीवन की शुष्कता व नीरसता के स्थान पर नव प्राण व नव उमंग द्वारा जीवन सरस व सुन्दर बन सके। वस्तुतः सामूहिक भावनाओं से सबको साथ लेकर किए गए कल्याणकारी सत्कर्म ही पर्व के नाम से जाने जाते हैं।
चूंकि मकर संक्रान्ति के अवसर पर ठण्ड रहती है अतः इस उपलक्ष में घृत और कम्बल के दान का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इसका दान करने वाला सम्पूर्ण भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त होता है। जैसा कि कहा भी गया है-
माघे मासि महादेव यो दद्यात् घृतकम्बलम् ।
स भुक्त्वा सकलान् भोगान् अन्ते मोक्षं च विन्दति ॥
मकर संक्रान्ति पर्व भारतीय एकात्मता व अखण्डता का दिव्य प्रतीक है। हमारे मनीषी पूर्वजों ने समस्त समाज में एकजुटता व एकसूत्रता रखने के लिए पर्वों पर व्रत व दान पुण्य को महत्व दिया । जिससे सामूहिक आमोद- प्रमोद के वातावरण के साथ – साथ परस्पर विचारों व कर्मो का सामंजस्य भी स्थापित किया जा सके। उत्सव का वास्तविक पर्याय भी यही प्रतीत होता है।
संक्रान्ति पर्व के दिन गंगा तट पर तथा गंगा सागर पर स्नान व दान को विशिष्ट महिमा प्रदान की जाती है । राजस्थान व उत्तर प्रदेश में इस दिन खिचड़ी खाने तथा खिचड़ी तथा तिल का दान देने का महत्व दर्शाया गया है। दूसरी ओर महाराष्ट्र में नव विवाहितों द्वारा कपास, तेल व नमक आदि वस्तुएं दान देने की परम्परा है। बंगाल में तिल दान देने का प्रचलन है। दक्षिण भारत में इसे ‘पोंगल’ कहते हैं। असम में संक्रान्ति के दिन ‘बिहू’ का त्यौहार मनाया जाता है।
राजस्थान में कई जातियों की परम्परा के अनुसार सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर, लड्डू, फीणी अथवा कोई अन्य मिठाई आदि पर रुपये रखकर बायने के रूप में अपने घर के बड़े बुजुर्गो को सम्मान रूप से देती हैं। साथ ही प्रायः किसी भी वस्तु का तेरह की संख्या (तेरूण्डा) में संकल्प करके दान किया जाता है।
इस प्रकार देश के विभिन्न भागों में मकर संक्रान्ति पर्व पर विविध परम्पराएं प्रचलित हैं। इन पर्वो के आयोजन के पीछे मूल कारण तत्कालीन कृषि की उपज व ऋतु की परिवर्तनशीलता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है जिस ऋतु में जिस प्रकार की कृषि की उपज होती है, उसी के अनुसार दान – पुण्य आदि की परम्पराएं प्रचलित हुई। वस्तुतः ये परम्पराएं जीवन को अनुशासित बनाने के साथ समाज को सुदृढ़ता व नवीन आधार प्रदान करने के कारण अत्यत महत्वपूर्ण हैं। यही नहीं, ऋतु परिवर्तन के प्रभाव से शरीर और भावनाओं के लिए अनुकूल यह पर्व सर्वसाधारण के लिए सर्वथा प्रासंगिक व उपादेय है।
पश्चिमी देशों के अन्धानुकरण से हमारे वर्तमान समाज के नैतिक स्तर में निरन्तर गिरावट आने लगी है। आज की शिक्षा पद्धति से मानव के संस्कारों का निरन्तर पतन होने लगा है। आज के युग में बढ़तेअनाचार व बाल अपराधों को यदि समय पर नहीं रोका गया तो भावी समाज तो दुःखद होगा ही, देश के भविष्य निर्माता कैसे होंगे, यह शोचनीय विषय है।
यदि बाल्यकाल से बच्चों को इन पर्वों व आयोजनों में सहभागिता मिले तो निश्चय ही वे सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजते हुए देश की चहुंमुखी उन्नति में सहयोगी हो सकेंगे तथा व्यक्तित्व व चरित्र – निर्माण के द्वारा समाज की मुख्य धारा में जुड़कर अपना अमूल्य योगदान दे सकेंगे। कहने का तात्पर्य यही है कि युगों पूर्व प्रारम्भ किए गए इन पर्वां को मनाना आज भी अत्यन्त प्रासंगिक है। तभी नई पीढ़ी मेलजोल व सहयोग तथा स्नेह-सौख्य भाव द्वारा संस्कारों को जीवन में अपना सकेगी।
मकर संक्रान्ति सदृश पर्व देश के धार्मिक सम्प्रदायों, सांस्कृतिक और सामाजिक विधानों की अनेकता में एकता के प्रतीक हैं, जिनमें भाशा, परिधान और आचार व्यवहार में निहित अनेकता के बावजूद सर्वत्र समन्वय व एकता की ही झलक दिखाई देती है । सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़तर बनाने में इन पर्वों का अपूर्व योगदान है जिनका भलीभांति अनुशीलन करके हम हमारे समाज की लुप्त होती परम्पराओं का सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पुनरूत्थान कर सकेंगे। इन पर्वों को मिलजुल कर मनाने से हमारा चंचल चित्त स्थिर हो जाता है क्योंकि प्रतिदिन के नीरस श्रमसाध्य कर्मों से थके हारे आमजन को इन पर्वों में एक विचित्र प्रकार के आनन्द का संचार होता है । यही कारण है कि युगों- युगों से परम्परागत रूप से मनाये जाने वाले पर्वों को आज भी हम महत्व देते आ रहे हैं।
समस्त विश्व में मकर- संक्रान्ति के महत्व को समझा जाता है और इस दिन किसी न किसी रूप में कोई न कोई आयोजन किया जाता है। चूंकि कोरोना के बाद ऑमिक्रॉन नामक वायरस की महामारी ने सर्वत्र विषम त्रासदी से हम सबको संत्रस्त कर दिया है। अतः समय की नज़ाकत देखते हुए हमें मकर- संक्रान्ति सहित समस्त त्यौहारों को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ संयम और अनुशासन बरतते हुए मनाना होगा । ‘पहला सुख निरोगी काया’ यदि हम इन नियमों की अनुपालना करेंगे तभी स्वस्थ व निरोग रहकर मकर सक्रान्ति व आगामी त्यौहारों को प्रसन्नता पूर्वक मिलजुलकर मना सकेंगे।