व्यक्तित्व व कृतित्व
डॉं. श्रीमती बसन्ती हर्ष

प्रधान सम्पादक
पुष्करणा सन्देश
बीकानेर
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जगद्जननी रत्नगर्भा माता वसुन्धरा ने अपनी कोख से अनेकानेक नर रत्नों को प्रसूत किया, जिन्होंने अपने अनवरत अध्यवसाय, परिश्रम, लगन व उत्साह, कर्मठता तथा प्रखर ज्ञान के बल पर न केवल अपने देश को, अपितु विदेशों के इतिहास व साहित्य को भी गरिमामय पद दिलाने का सफल प्रयास किया है। विश्व के साहित्याकाश में दैदीव्यमान नक्षत्र के रूप में इटली निवासी विद्वान डॉ. लुई पियो तैस्सितोरी (एल. पी. तैस्सीतोरी) का नाम इसी श्रृंखला में अग्रगण्य है ।

डॉ. तैस्सीतोरी का जन्म 13 दिसम्बर सन् 1887 को इटली के ‘उदीने’ नामक प्रसिद्ध नगर में हुआ था। इटली में जन्म के बावजूद उनका भारतीय संस्कृति व साहित्य से बाल्यकाल से लगाव था। उन्होंने बचपन में ही कई भाषाएं सीख ली थी। इटेलियन के अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी, जर्मन, ग्रीक, लेटिन, जैसी यूरोपियन भाषाएं तो सीखी ही थी, साथ ही अपभ्रंश, राजस्थानी (डिंगल), हिन्दी आदि भाषाओं को भी जानने का प्रयास किया। 21 वर्ष की उम्र में एम. ए. किया तथा 1911 ई. में प्रो. पैवोलिवी के निर्देशन में “तुलसीकृत रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। तुलसी और वाल्मीकि पर मौलिक ढ़ंग से शोध कार्य कर उन्होंने भारतीय शोधकर्ताओं को नई दशा – दिशा प्रदान की।
भारत की पावन धरा पर आगमन से पूर्व डॉ. तैस्सीतोरी डॉ. हरमन जैकोबी के सौजन्य से आचार्य विजयधर्म सूरि के सम्पर्क में और उनसे पत्राचार द्वारा भारत भूमि की जानकारी प्राप्त की। इसी दौरान उन्होंने उदीने में राजस्थानी की कतिपय पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया तथा उन्हें राजस्थानी भाषा और साहित्य के प्रति जिज्ञासा बनी । महान् भाषाविद् डॉ. ग्रियर्सन के आग्रह पर कोलकाता की एशियाटिक सोसायटी ने उन्हें राजपूताना के चारणी साहित्य का सर्वेक्षण करने हेतु भारत आने का आमन्त्रण दिया। 8 अप्रेल 1914 ई. को अपने भीतर कुछ नया करने की विशाल कल्पना समेटे, धोरों की गंध नासिका में लिए डॉ. तैस्सीतोरी ने भारत की पावन धरा को प्रणाम किया और राजस्थान को विशेष रूप से बीकानेर को अपनी कर्मभूमि बनाया।
डॉ. तैस्सीतोरी का लक्ष्य था राजस्थानी के अलभ्य और अमूल्य ग्रन्थों की खोज और सर्वेक्षण। उन्होंने जोधपुर और बीकानेर को अपना आधार माना और उदेभाण चांपावत की ख्यात में वर्णित विभिन्न खांपों की सूची तैयार करके, उन्होंने अपना कार्य प्रारम्भ किया। वे आचार्य जिनसूरि जी को गुरूतुल्य मानते थे। डॉ. तैस्सीतोरी जैन धर्म और साहित्य से विशेष रूप से प्रभावित थे । 1914 ई. से लेकर 1919 (मृत्यु पर्यन्त) तक वे अनुसन्धान कार्य में संलग्न रहे। जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी में उनकी सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रकाशित हुई है – जिसमें स्पष्ट होता है कि उन्होंने अनेकानेक अनमोल ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का स्तुत्य कार्य किया है। ‘अहिंसा दिग्दर्शन’ ‘जैन शासन विशेषांक’ ‘प्राकृत मार्गोपदेशिका’ ‘प्रभृति ग्रन्थों की समीक्षा’ तथा ‘वेलि क्रिसन रूक्मिणी री’, ‘वचनिका राठौड रतनसिंह महेसदासोत री’ छनद राउ जइतसी रउ’ जैसे उत्कृष्ट काव्यों का सम्पादन व भूमिकाएं डॉ. तैस्सीतोरी की प्रतिभा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । यहां इतना ही कहना पर्याप्त है कि उक्त ग्रन्थों का सम्पादन आगे के सभी सम्पादकों के लिए पथ प्र दर्शक बना और उसी लीक पर अनेक राजस्थानी ग्रन्थों का सम्पादन कार्य सम्पन्न हुआ।
कृतित्व
डॉ. तैस्सीतोरी एक अद्वितीय भाषा वैज्ञानिक थे, इसमें कोई संशय नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर विदेशों की अनेकानेक भाषाओं के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को भी बहुत अच्छी तरह से सीख लिया था। उन्होंने भारतीय भाषाओं को सीखने व अभ्यास करने के लिए किसी शिक्षक की सहायता नहीं ली। इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं विजयधर्मसूरिजी से एक बार कहा था- “मेरे देश में मुझे किसी भी शिक्षक की सहायता तो नहीं मिली थी, परन्तु मात्र पुस्तकों की सहायता से ही मैं भारतीय भाषाओं का अभ्यास कर सका हूँ। निःसन्देह यह डॉ. तैस्सीतोरी की तीक्ष्ण बुद्धि तथा विविध भाषाओं के प्रति प्रेम व उत्साह का ही परिचायक है। मुनि विद्या विजय जी के शब्दों में- मात्र 21 वर्ष की आयु में इनके अपने देश में रहकर अभ्यस्त की हुई भाषाएं, इनका साहित्य प्रेम तथा प्रवृत्ति देखते हुए यह कहना होगा कि भारतवर्षीय भाषाओं के अभ्यासी पाश्चात्य विद्वानों में डॉ. तैस्सीतोरी का नम्बर सर्वप्रथम है ।

डॉ. तैस्सीतोरी का प्राकृत भाषा व राजस्थानी ग्रन्थों के साथ – साथ जैन साहित्य के प्रति भी बहुत रूझान था। इस बात की जानकारी शास्त्र विशारद जैनाचार्य श्री विजयधर्मसूरि को मिली। उन दिनों में वे भारत में अधिक से अधिक जैन धर्म का प्रचार प्रसार करना चाहते थे, वे जैन धर्म के ग्रन्थों के सम्पादन व अनुवाद के द्वारा उन्हें पठनीय व अनुकरणीय बनाने में प्रयत्नशील थे । विदेशों में भी वे अहिंसा व जैन धर्म के अधिकाधिक प्रचार – प्रसार के इच्छुक थे। इसके लिए वे विदेशी विद्वानों को पत्राचार द्वारा भारतीय व जैन ग्रन्थ भेजते तथा पत्रों के द्वारा ही उनके प्रष्नों के उत्तर देकर उनकी कठिनाईयों का निराकरण करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार उनके समुचित प्रयासों से अनेक विदेशी विद्वान जैन साहित्य व इतिहास की अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु आकर्षित हुए उनमें जर्मनी के डॉ. हरमन जैकोबी जर्मनी की ही विदुशी डॉ. चारलौटे क्रौ-हजये तथा इटली के डॉ. तैस्सीतोरी प्रमुख हैं। (देखिए- हजारीमल बांठिया अभिनन्दन ग्रन्थ, बांठिया समग्र, पृष्ठ 49)
जब आचार्य श्री सूरिजी को यह जानकारी मिली कि डॉ. तैस्सीतोरी प्राकृत ग्रन्थों का सम्पादन व अनुवाद करने में लगे हैं, तब उन्होंने ‘प्राकृत मार्ग उपदेशिका’ नामक ग्रन्थ को सम्पादन हेतु डॉ. तैस्सीतोरी के पास भेजा, जिससे आचार्यश्री को इस कार्य में सहायता मिल सके।
डॉ. तैस्सीतोरी उनके कार्य से बहुत प्रभावित हुए और परस्पर पत्राचार के कारण फलित उनका वह मधुर सम्बन्ध गुरू-शिष्य रूप में परिणत होकर निरन्तर बढ़ता गया। शनैः शनैः वे जैन धर्मानुयायी बन गये तथा जैन धर्म का सतत् अध्ययन करने में तल्लीन हो गये। एक बार श्री विद्या विजयजी ने डॉ. तैस्सीतोरी द्वारा खिवाणदी (मारवाड़) में दिए गए व्याख्यान को उद्घृत किया जो इस प्रकार है- मेरा जैन धर्म के प्रति जितना अनुराग है वह महाराजश्री की ही कृपा का प्रताप है। मैं महाराजश्री का सदा के लिए ऋणी बना रहूँगा, क्योंकि अभाग्यवश मैं उनका ऋण चुकाने में असमर्थ हूँ, बहुत गरीब हूँ।
डॉ. तैस्सीतोरी महोदय ने जैन हस्तलिखित ग्रन्थों के आधार पर गुजराती तथा राजस्थानी भाषा के मूल स्वरूप तथा अपभ्रंश युग के बाद की भाषा के ध्वनि परिवर्तन तथा ध्वनि सिद्धान्त की व्यापक विवेचना की है। सचमुच उन्होंने प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी के विवेचन द्वारा अपभ्रंशकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं को एकसूत्रता में पिरोने का महनीय कार्य किया
है, जिसके बिना आधुनिक भाषा का ऐतिहासिक व्याकरण लिखना सम्भव नहीं था। जैन धर्म के प्रति अटूट आस्था व श्रद्धा के कारण उन्होंने स्वदेश (इटली) व भारत में आकर भी जैन धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया था।
उन्होंने ‘उपदेश माला’ ‘भव वैराग्यशतक’ तथा ‘इन्द्रिय पराजय’ शतक का सम्पादन करके उसे इटली की भाषा में रूपान्तरित करके प्रकाषित करवाया। उन्होंने ‘श्रेणिक की कथा’ जिन माणिक्यकृत, ‘कुम्भापुतकहा’, नेमिचन्द कृत ‘सटिसंय’, सोमसूरि कृत ‘परज्जतारहणं’, पुण्याश्रय कथा कोश, ‘कल्याण मन्दिर स्तोत्र’, ‘परम ज्योति स्तोत्र’, ‘गौडी पार्श्व स्तोत्र’, आदि कई जैन धर्म के सूत्रों व जैन विद्वानों के लिखित ग्रन्थों का आलोचनात्मक सम्पादन भी किया था।
डॉ. तैस्सीतोरी की जैन धर्म के प्रति अनुरक्ति का श्रेय अधिकतर जैनाचार्य श्री विजयधर्म सूरि को है। उन्हीं के सम्पर्क में आकर वे जैन श्रावक बनकर श्रावक के आठ अणुव्रतों का पालन करते थे। गुरूदेव की आज्ञानुसार ही उन्होंने मांसाहार का भक्षण छोड़कर विशुद्ध शाकाहारी भोजन अपना लिया था तथा वे अत्यन्त सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे।
डॉ. तैस्सीतोरी की समस्त कृतियों का अवलोकन व आंकलन करने पर यह सिद्ध होता है कि उन्हें राजस्थानी साहित्य से जितना लगाव था उतना ही प्रेम जैन साहित्य से भी था। इस बात का प्रमाण उनके द्वारा लिखित पत्रों से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मिलता है। राजस्थानी साहित्य व राजस्थानी संस्कृति के अन्तर्गत केवल जैन विद्वानों ने ही अपने साहित्य को सबसे अधिक संरक्षण प्रदान किया है। डॉ. तैस्सीतोरी का आचार्यश्री से प्रत्यक्ष रूप मे अथवा पत्राचार द्वारा निरन्तर सम्पर्क बना रहा। आचार्यश्री के दर्शन हेतु उनको कई बार पैदल यात्रा भी करनी पड़ी। आचार्यश्री से अत्यधिक प्रभावित होकर एक बार डॉ. तैस्सीतोरी ने एक पत्र में लिखा था कि “मैं वास्तव में सोचता हूँ कि आपके जैसा शान्त व उदार पुरुष इस पृथ्वी पर कोई नहीं मिलेगा। मैं सोचता हूँ कि मैं स्वयं को आपके अर्पण कर दूं।”

डॉ. तैस्सीतोरी एक महान लेखक भाषा वैज्ञानिक व विद्वान होने के साथ – साथ एक महान इतिहासकार भी थे, जिन्होंने अपनी मातृभाषा, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती, प्राकृत व राजस्थानी भाषा के गहन अनुशीलन के साथ – साथ ऐतिहासिक तथ्यों तथा प्रागैतिहासिक व पुरातात्विक तथ्यों का भी शोध व अन्वेषण कार्य करके हमें एक और प्राचीन सभ्यता व संस्कृति से अवगत कराया। अब तक हम हड़प्पा कालीन संस्कृति से अनभिज्ञ ही थे। डॉ. तैस्सीतोरी ने अन्वेशण कार्य द्वारा जो जो संग्रहीत पुरातत्व की वस्तुएं, मूर्तियां, मुद्राएं तथा अन्य कई भौतिक अवशेष खोज निकाले, वे सभी वस्तुएं प्रागैतिहासिक जानकारी देने के साथ सिन्धु घाटी की सभ्यता के अतिरिक्त सरस्वती घाटी की सभ्यता अथवा कालीबंगन सभ्यता की परिचायक हैं।
उन्होंने पल्लू, बड़ोपल, रंगमहल, रतन गढ़, सूरतगढ़ तथा भटनेर आदि क्षेत्रों सहित लगभग आधे बीकानेर क्षेत्र की खोज की। प्राचीन मन्दिरों में पुरावशेषों के रूप में अनेक शिलाखण्ड व भग्नावशेष प्राप्त हुए जिनमें से कुछ मूर्तियों पर सुन्दर शिल्प कार्य किया हुआ है ।
इन्हीं अवशेषों में तीर्थकरों की अनेक जैन प्रतिमाओं के अतिरिक्त जैन सरस्वती की दो प्रतिमाएं भी मिली हैं जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली तथा गंगासिंह जुबली संग्रहालय, बीकानेर में रखी गई हैं।
दुर्भाग्यवश अनुपम प्रतिभा के धनी डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी का 22 नवम्बर 1919 को 32 वर्ष की अल्पायु में निमोनिया से बीकानेर में स्वर्गवास हो गया। आज वे सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा किए गए महान कार्यो ने उन्हें अमर बना दिया। उनके महान कृत्यों से प्रेरणा लेकर जिज्ञासु विद्वज्जनों को उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में प्रयत्नशील होना चाहिए। उनके कार्यों का भलीभांति अनुशीलन व अनुकरण करके ही हम हमारी भाषा, साहित्य व संस्कृति को उन्नति प्रदान कर सकेंगे।
इति शुभम्।

