Sun. Aug 30th, 2026

मधुबाला शर्मा, जयपुर

सनातन धर्म की भक्ति परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का नाम सूर्य की भाँति देदीप्यमान है। श्रावण शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत 1554 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर ग्राम में जन्मे तुलसीदास हिन्दी साहित्य के आकाश के सबसे बड़े नक्षत्र हैं। उनका मूल नाम रामबोला था। गुरु नरहरिदास से दीक्षा लेकर उन्होंने अपना जीवन रामनाम और लोकसेवा को समर्पित कर दिया। “श्रीरामचरितमानस”, “विनय पत्रिका”, “कवितावली”, “दोहावली”, “गीतावली” जैसी रचनाएँ देकर उन्होंने न केवल साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि पूरे समाज को एक नई दिशा दी। मुगलकालीन विघटन के युग में तुलसीदास जी मरहम बनकर आए।

“अब लौं नसानी, अब न नसैहौं” कहकर वे हर मनुष्य को यह विश्वास दिलाते हैं कि पतन के बाद भी उत्थान संभव है।

तुलसीदास जी की भक्ति कोई जटिल दर्शन नहीं, बल्कि सीधी-सहज “दास्य भक्ति” है। वे स्वयं को राम का दास मानते हैं और यही भावना उनके हर शब्द में झलकती है। 

भक्ति: सरल और अनन्य

तुलसी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भक्ति को महल से निकालकर झोपड़ी तक पहुँचाया। उस समय धर्मग्रंथ संस्कृत में थे, जिन्हें आमजन नहीं समझ पाता था। तुलसी जी ने अवधी भाषा में “मानस” लिखकर रामकथा को घर-घर पहुँचा दिया। 

उनके लिए राम केवल भगवान नहीं हैं, वे आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श राजा और आदर्श मित्र हैं। विनय पत्रिका में वे राम से कहते हैं – “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा”। अर्थात राम से बड़ा राम का भक्त है। यही उनकी भक्ति की गहराई है। उनके अनुसार नाम जप, संत सेवा और सदाचार ही सच्ची भक्ति है।

तुलसीदास जी का युग भेदभाव, ऊँच-नीच और निराशा का युग था। ऐसे समय में उन्होंने अपनी लेखनी से समाज में समरसता की गंगा बहाई।

समरसता: “सिया राममय सब जग जानी”

1.  जाति-पांति से ऊपर: राम वन में निषादराज गुह को गले लगाते हैं और उसे “सखा” कहते हैं। शबरी के झूठे बेर प्रेम से खाते हैं। जटायु जैसे गिद्ध को भी मुक्ति देते हैं। तुलसी पूछते हैं – यदि ईश्वर सबको अपना सकता है तो हम क्यों नहीं? 

    “जाति-पांति पूछे नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई”

2.  रामराज्य की कल्पना: तुलसी ने जिस रामराज्य की कल्पना की वह समरस समाज का आदर्श है। 

    “बैर न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई” 

    यहाँ न कोई गरीब है, न कोई बीमार। सब अपने धर्म का पालन करते हैं। यह स्वप्न आज भी प्रासंगिक है।

3.  नारी सम्मान: उस युग में जब नारी को हीन समझा जाता था, तुलसी ने सीता को “जगत जननी” कहा। सती अनुसूया, शबरी, तारा – सभी नारी पात्रों को गरिमा और ज्ञान से युक्त दिखाया।

आज के समय में तुलसी की प्रासंगिकता

आज जब समाज धर्म, जाति और भाषा के नाम पर बंट रहा है, तुलसीदास जी का संदेश और भी आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा कि “परहित सरिस धर्म नहिं भाई”। यदि हम सब एक-दूसरे के हित को अपना हित मान लें तो आधी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।

तुलसी की भक्ति हमें जोड़ती है, तोड़ती नहीं। उनका “मानस” आज भी घरों में संकट के समय पढ़ा जाता है क्योंकि वह शक्ति देता है। गोस्वामी तुलसीदास केवल कवि नहीं थे, वे समाज सुधारक, लोकनायक और युगदृष्टा थे। उन्होंने भक्ति को कर्म से जोड़ा और धर्म को आडंबर से मुक्त किया। उनकी दो पंक्तियों में पूरा जीवन दर्शन समाया है: “सिया राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी”। जयंती के अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम तुलसी के राम को केवल पढ़ें नहीं, अपने जीवन में उतारें। यदि हम सबमें राम देखेंगे तो समाज में अपने आप समरसता आ जाएगी। यही तुलसीदास जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

जय श्री राम