पर्वत-सी आभा लिए विराट व्यक्तित्व – श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’

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पर्वत-सी आभा लिए विराट व्यक्तित्व – श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’

राजाराम स्वर्णकार, बीकानेर

वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि, शिक्षाविद, सम्पादक, प्रखर विचारक, समालोचक, संचालक, बहुमुखी व्यक्तित्व जिन्होंने अंग्रेजी, हिन्दी और राजस्थानी में विराट लेखन संसार रचा है। जन-जन के हृदय में रचा-बसा कालजयी साहित्य सागर है भवानीशंकरजी व्यास ‘विनोद’। आपका जन्म राजस्थान की मरुधरा बीकानेर में पुष्करणा ब्राहमण अमरदतजी व्यास के यहां 11 अगस्त 1935 अश्विन शुक्ला सप्तमी विक्रम सम्वत 1992 को हुआ। विनोद ने राजस्थान विश्वविद्ध्यालय, जयपुर से बीए, बी.एड.किया, अंग्रेजी साहित्य में एम.ए., हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विशारद तथा अंग्रेजी में विशेष दक्षता राज्य भाषा अध्ययन संस्थान अजमेर व जयपुर से प्राप्त की। आपने राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग में अध्यापक पद से अपनी सेवा शुरु कर अनेक पदों पर पदोन्नत होते हुए प्रकाशन अनुभाग (शिक्षा निदेशालय) में वरिष्ठ सम्पादक ‘शिविरा’ के पद से 31 अगस्त 1993 को सेवानिवृत हुए। सरलचित, मृदुभाषी, सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के धनी ‘विनोद’ में मायड़ भाषा के प्रति अगाध प्रेम है आपने अंग्रेजी भाषा के शिक्षक होते हुए अपना अधिकतर सृजन राजस्थानी, हिन्दी में करके इसका मान बढाया है। सरकार ने सेवानिवृत किया, लेकिन आपकी साहित्यिक पाठशाला में उम्र के 91 बसंत पार करने के पश्चात आज भी आप युवाओं को साहित्य में प्रोत्साहित कर रहे हैं।

कोई-कोई आदमी समझ में आकर भी पूरी तरह समझ में नहीं आता। लोग उसे समझने-बुझने में ज्यों-ज्यों उनके निकट जाते हैं, त्यों-त्यों रहस्य गहराता जाता है। उनके शब्दों को अर्थाने की प्रवृति इतनी शानदार होती है कि उन्हें अच्छी प्रकार से समझा ही नहीं जा सकता, और-और की भावना प्रबल होती जाती है। ऐसे ही शब्दों के चितेरे हैं आदरणीय भवानीशंकरजी व्यास ‘विनोद’। मस्त, फक्कड़, बैरागी। संस्कृति का संस्कारित स्वरूप। अपने में पूर्ण प्रशांत। कीर्ति जिनका अभी तक पीछा करती है। किसी भी विषय पर धाराप्रवाह सटीक जानकारी की जमीन हैं व्यासजी। ‘कमिटमेंट’ कर उसे पूर्णतया निभाना इनकी आदत है।

इन्हें जो कुछ मिला है इर्द-गिर्द के वातावरण से, अच्छा साहित्य पढ़ने से, विद्वानों की सभा से अपने बड़ों के आशार्वाद से, जिसे ये निस्वार्थ भाव से नई पीढी को सौंप रहे हैं। बीकानेर ही नहीं पूरे राजस्थान को आप पर गर्व है कि आपने देश के विशाल मंचों पर लगभग तीस वर्षों तक पूरे भारत में अपनी मंचीय रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। वरिष्ठ साहित्यकारों-कवियों के संग बड़े-बड़े राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में मंच साझा कर राज्य को गौरवान्वित किया है। यथा बालकवि बैरागी, कन्हैयालाल सेठिया, माया गोविन्द, संतोषानंद, सोम ठाकुर, प्रभा ठाकुर, ओमप्रकाश आदित्य, निर्भय हाथरसी, काका हाथरसी, इंदिरा ‘इन्दू’ रामरख मनहर, जगदीश सोलंकी, गोपालप्रसाद व्यास, बरखा रानी, कल्याणसिंह राजावत, गीतकार भारत भूषण मुम्बई आदि प्रसिद्ध थे। मेरी नजर में इनके बाद राष्ट्रीय फ़लक पर बीकानेर का कोई कवि इस प्रकार से अपनी पहचान अब तक नहीं बना पाया है।

जैसा कि पूरा हिन्दुस्तान जानता है कि भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ युवावस्था से ही अपनी हास्य-व्यंग्य रचनाओं के कारण फर्श से अर्श तक का सफर तय कर चुके हैं। आपने राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े कवियों के साथ कवि सम्मेलनों में मंच साझा किए जिनमें प्राय: संचालन आपके हाथों में ही रहता था।

बीकानेर में तो वर्षों से आपने अपनी धाक जमाए रखी। चाहे कवि सम्मेलन हो या कोई अन्य राजकीय सार्वजनिक बड़ा आयोजन उनका संचालन आप ही किया करते थे। वर्षों तक महाराजा करणीसिंह स्टेडियम में राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त या 26 जनवरी आप अपनी कमेंट्री से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रखते थे। जब आप मंच से संचालन किया करते थे तब क्या मजाल कि श्रोता इधर से उधर हो जाए या आपस में कानाफूसी कर ले, उस समय के संस्कार आज भी यहाँ आयोजित होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में पल्लवित-पोषित होते दिखाई देते हैं। समय पर कार्यक्रम शुरू करना एवं तय समय समाप्त करना यह आपके संचालन की विशेषता थी। अनुशासन इतना कि मंच पर कोई ऐसा–वैसा व्यक्ति चढने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

एक ज़माना था जब भवानीशंकरजी की कवितायेँ बच्चे, बुड्ढे, जवान सभी की जबान पर थी। इन कविताओं को अभी की पीढ़ी भी पसंद करती है मगर रचनाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण इनके चहेते इनकी रचनाओं को ढूँढते रहते हैं। व्यासजी की सबसे ज्याद सुनी जाने वाली रचनाएं इस प्रकार है- कहां फंस गये?, मूंफली, चमचा पुराण, चमची पुराण, चाय, मूंछों का बखान, बापू तुम्हारा यहाँ पर क्या काम है?, मैं गंजों का लोहा मानू, रोंग नम्बर, गवाही मोरारजी की, आगे सुनों जी आज के छोरों का हाल तुम, आज की कैसी है नारियां, तस्कर पुराण, हूटरों के बीच, जन्म मेरे बाप जन्म, कविता और क्रान्ति, दो चार शब्द ही, स्वागत है श्रीमान आपका, ओ मनु की संतानों! जाग उठो हुंकारों, उस्तादों के उस्ताद, रसवन्ती, चुनाव-चर्चा, हिप्पी, हिप्पनी, फैशन की बलिहारी, मुझे हंसी आती है, सबसे हिलमिल चालिए, सियावर रामचंद्र की जय, रौबीला चश्मा, इनकी मर्दानी जर्दे में, कंवारेपन का मानो कमाल, चंदे के बन्दे जो बुजुर्ग हैं उन्हें आज भी ये कवितायेँ मौखिक याद हैं।

आज यहाँ मैं आपकी जानकारी हेतु व्यासजी द्वारा विभिन्न शहरों के कवि सम्मेलनों में विशाल मंचों से किए गए काव्यपाठ को उदृत कर रहा हूं। अजमेर, अहमदाबाद (गुजरात), अबोहर (पंजाब), आबू, बीकानेर (यहाँ छ: राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों मेडिकल कॉलेज, पोलीटेक्निक कॉलेज, दयानंद पब्लिक स्कूल, भीनासर, डॉ. करणीसिंह स्टेडियम और आकाशवाणी परिसर) में कई बार संचालन के साथ काव्य पाठ कर मंच को गरिमा प्रदान की। बीदासर, ब्यावर, बूंदी, बालोतरा, बिजयनगर, भरतपुर, भीनमाल, भैरून्दा, बोम्बे (मुम्बई), चुरू, चितौडगढ़, चंडीगढ़ (केंद्र शासित), छापर, छोटी खाटू, श्री डूंगरगढ़, दौसा, दिल्ली, देशनोक, डीग, डीडवाना, श्री गंगानगर, गंगापुर सिटी, गजनेर, गडियाला, घडसाना मंडी, हनुमानगढ़, हमीरगढ़, हैदराबाद (आंध्रप्रदेश), इंदौर (मध्यप्रदेश), जयपुर, जालौर, जैसलमेर, जसोल, जसरासर, जोधपुर, झुंझुनूं, झोटवाडा, जैतारण, कानपुर, लखनऊ, नोएडा (उत्तरप्रदेश) करणपुर, केकड़ी, कोटा, कोलायत, कालू, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल में सात बार मंचों पर काव्यपाठ), कुचामन सिटी, किशनगढ़, खेतड़ी, लक्ष्मणगढ़, लूणकरणसर, लाडनूं, माउंट आबू, महाजन, मनासा (मध्यप्रदेश), मान टाउन, मद्रास (तमिलनाडू) मेड़ता सिटी, मूंडसर, मोमासर, नापासर, नाल, नुकेरा (श्री गंगानगर), नोहर, नवलगढ़, नसीराबाद, नोखा, नाभा (पंजाब), पिलानी, पाली, पिंपाड़ रोड़, पालपुर, पिपरिया (मध्यप्रदेश), प्रतापगढ़, पीलीबंगा, राजकोट (गुजरात), रतनगढ़, राजलदेसर, रामदेवरा, रावला मंडी, राजगढ़, रानीवाड़ा, सीकर, शिवगंज, सरदारशहर, सुजानगढ़, सिरोही, संगरिया, सोजत रोड़, सोजत सिटी, शाहपुरा, तेजरासर, उदयपुर आदि। इस प्रकार देश के तेरह राज्यों में एक सौ से अधिक मंचीय कवि सम्मेलनों में अपनी कविताओं का वाचन कर चुके हैं।

बीकानेर शुरू से ही साहित्य को समर्पित रहा है तभी तो इसका नाम छोटी काशी पड़ा है। गंगा जमुनी तहजीब आपसी सौहार्द एवं भाईचारे वाला शहर बीकानेर को लेकर व्यासजी की एक लम्बी कविता ‘हिन्दू-मुसलमान भारत की दो आँखें हैं’ जिसका एक छोटा अंश यहाँ उदृत करना चाहूंगा – साथ-साथ रहते हैं आरिफ और कामेश्वर, साथ-साथ मस्तान-बावरा, साथी भीम पांडिया, मयस्सर, भावुक और अजीज, सदीक, भवानीशंकर साथ-साथ हैं। साथ-साथ रहते हैं गाजी और भादाणी, युसूफ अजीज, धनंजय दोनों साथ-साथ हैं, साथ-साथ हैं जहां वहीद, विशन मतवाला, शाद-सरल साथ-साथ हैं, यही शहर की परम्परा है।

विनोदजी राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की संचालिका के सदस्य रहे हैं तथा अकादमी की ओर से साहित्यकार सद्भाव यात्रा में केरल प्रदेश के सात दिवसीय परिभ्रमण में साहित्यिक चर्चाओं में सक्रिय रुप से भाग लिया। इसी प्रकार आप केन्द्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली की जनरल कॉंन्सिल एवं राजस्थानी सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे हैं। केन्द्रीय साहित्य अकादमी से प्रकाशित साहित्यकार भीम पांडिया एवं मुरलीधर व्यास राजस्थानी के मोनोग्राफ आपने लिखे हैं तथा हेनरी इब्सन की पुस्तक “ए डॉल्स हाउस” का अनुवाद भी आप द्वारा किया गया।

उम्र के इस पड़ाव में अभी आप उदयपुर में अपने पुत्र डॉ. राकेश व्यास के साथ सपत्नीक निवास करते हैं, लेकिन अपनी जन्मभूमि से प्यार के वशीभूत बीकानेर के समाचारों से अपडेट रहते हैं। 91 वर्ष की उम्र में भी आप बराबर सृजनरत्त हैं, आपकी याददाश्त में कोई कमी नहीं। दो-चार दिन से फोन पर मेरा सम्पर्क होता रहता है, मगर अभी पिछले दो माह से देख रहा हूँ कि बात पॉइंट टू पॉइंट करके फोन बंद कर देते हैं। इसका मतलब अभी इनकी कलम कोई ऐतिहासिक रचनाकर्म में अति व्यस्त हो गयी है। मैंने उनसे जानकारी चाही मगर सभी जानते हैं कि वे अपने पत्ते पहले कभी नहीं खोलते। खैर! आपके लिखे हुए को सभी पढ़ना चाहते हैं। जन्मदिन पर बीकानेर वासियों की तरफ से ऐसे प्रेरणा पुरुष को सादर वंदन करते हैं जिनके बताए मार्ग पर चलकर यहाँ के साहित्यकारों ने विश्व में बीकानेर की व अपनी पहचान बनाई।

राजाराम स्वर्णकार, बीकानेर

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