
भगवती पारीक ‘मनु’
श्रीडूंगरगढ़ (राज.)
हर समय को कुछ ऐसे लोग मिलते हैं, जो अपने लिए नहीं, समय के बाद आने वालों के लिए रास्ते बनाते हैं। वे बहुत कुछ कहते नहीं, लेकिन उनका किया हुआ बोलता रहता है। श्याम महर्षि का जीवन ऐसी ही दीर्घ साधना का नाम है- जहाँ स्वाध्याय तप है, साहित्य कर्म है और भाषा-सेवा जीवन का संकल्प। हिन्दी और मायड़ भाषा राजस्थानी के उन्नयन तथा प्रचार-प्रसार के लिए उनका अविराम योगदान उन्हें अपने समय के विशिष्ट साहित्य-साधकों में विशिष्ट स्थान देता है।
7 अक्टूबर 1943 को चूरू जिले की रतनगढ़ तहसील में स्व. नन्दलाल महर्षि और रुक्मणि महर्षि के घर जन्मे श्याम महर्षि ने आगे चलकर श्रीडूंगरगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाया। इतिहास एवं लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर, वैद्य विशारद तथा साहित्य रत्न की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अध्यापक के रूप में सेवायात्रा आरंभ की। इसके बाद पटवारी, नायब तहसीलदार और तहसीलदार के दायित्व निभाते हुए ईमानदार, संघर्षशील और संवेदनशील लोकसेवक के रूप में पहचान बनाई। सेवानिवृत्ति के बाद उनका समय पूरी तरह साहित्य-सृजन, स्वाध्याय और साहित्यिक सेवा को समर्पित हो गया।
उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी निरंतरता है। नियमित अध्ययन, समय का सदुपयोग और बिना किसी दिखावे के लगातार सक्रिय रहना उनके स्वभाव का हिस्सा है। जनसरोकारों और लोकचेतना से जुड़े महर्षि के लिए साहित्य केवल शब्दों की सज्जा नहीं, बल्कि समाज की धड़कनों को सुनने और उन्हें स्वर देने का माध्यम है। इसीलिए उनके व्यक्तित्व में रचनाकार, चिंतक और कर्मयोगी एक साथ दिखाई देते हैं।
राजस्थानी उनकी सृजन-चेतना की अपनी मिट्टी है। उकळती ओकळ, सांच तो है, गवाड़, मेह स्यूं पैल्यां, अड़वो, सोनल बेळू रो समदर, कीं तो बोल, भचभेड़ी जैसी कृतियों में उन्होंने लोकजीवन, समय और संवेदना को अभिव्यक्ति दी। हिन्दी में मुझे यह गांव अब अच्छा नहीं लगता और कुछ कहना है मुझे उनके रचनात्मक विस्तार के प्रमाण हैं। जर्मन और मराठी कविताओं के अनुवाद के माध्यम से उन्होंने भाषाओं के बीच संवाद की संभावनाओं को भी व्यापक किया।
सृजन के साथ संपादन उनकी साहित्यिक यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम है। दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का संपादन करते हुए उन्होंने अनेक रचनाकारों, विधाओं और साहित्यिक प्रवृत्तियों को पाठकों तक पहुंचाया। पांवण्डा कहानी रा, उमस, झरोखो, राजस्थानी लघुकथा, संस्मरण, म्हारो आभो : म्हारी धरती, रेत के पठार, संवेदना के स्वर, लोक संस्कृति और यादां रै आंगणियै उभा उणियारा जैसी कृतियां उनके संपादकीय सरोकारों की व्यापकता का प्रमाण हैं।
साहित्यिक संस्थाओं के निर्माण और संचालन में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के मानद सदस्य, राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से जुड़े दायित्वों के साथ उन्होंने राष्ट्रीय हिन्दी परिषद्, मेरठ और हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग जैसी संस्थाओं में भी सक्रिय योगदान दिया।
एक थैले से वटवृक्ष तक

श्याम महर्षि की जीवन-यात्रा का सबसे उजला अध्याय है– राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, श्रीडूंगरगढ़। किशोरावस्था में उनके प्रयासों से 1961 में एक कपड़े के थैले से शुरू हुई यह संस्था आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुकी है। कभी एक छोटी-सी कोटड़ी में सिमटा यह प्रयास आगे चलकर देश के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आगमन का केंद्र बना। बाबा नागार्जुन, राजेन्द्र यादव और विष्णु प्रभाकर जैसे रचनाकारों की उपस्थिति इसकी साहित्यिक गरिमा का प्रमाण है।
हिन्दी दिवस पर साहित्यकार सम्मान समारोह की आज भी जारी परंपरा बताती है कि कोई विचार यदि निष्ठा से जिया जाए तो वह व्यक्ति की सीमा से बाहर निकलकर संस्था और फिर परंपरा बन जाता है।
सम्मान से बड़ी साधना

श्याम महर्षि की साहित्यिक साधना को समय ने भी अपनी स्वीकृति दी। सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, राजस्थान सरकार का उत्कृष्ट लेखन पुरस्कार, फूलचंद बांठिया पुरस्कार, गणेशीलाल उस्ताद पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् का रचना समग्र पुरस्कार और सीताराम रूंगटा राजस्थानी भाषा साहित्य पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से वे अलंकृत हुए। हिन्दी भाषा भूषण, राजस्थानी साहित्य शिरोमणि और साहित्य मनीषी जैसी मानद उपाधियों के साथ शताधिक सम्मान और प्रशस्ति-पत्र उनके योगदान की व्यापक स्वीकार्यता के साक्षी हैं।
लेकिन किसी भी साहित्य-साधक की असली पहचान पुरस्कारों की सूची से बड़ी होती है। महर्षि की उपलब्धि यह नहीं कि उन्हें कितने सम्मान मिले; उनकी उपलब्धि यह है कि सम्मानों के बावजूद उनकी साधना रुकी नहीं। उन्होंने साहित्य को प्रतिष्ठा पाने का माध्यम नहीं, समाज के प्रति दायित्व माना। यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी है।
वटवृक्ष अपनी ऊंचाई का विज्ञापन नहीं करता। वह चुपचाप जड़ें फैलाता है, धूप सहता है और अपनी छाया दूसरों के लिए बचाए रखता है। श्याम महर्षि का जीवन भी ऐसा ही वटवृक्ष है- गहरी साधना उसकी जड़ें हैं, साहित्य उसका तना, भाषा-सेवा उसकी शाखाएं और आने वाली पीढ़ियां उसकी छाया।
84वें जन्मदिवस पर इस अनथक साधक को सादर नमन। कामना है कि स्वाध्याय की यह लौ, सृजन की यह ऊर्जा और भाषा-सेवा का यह संकल्प दीर्घकाल तक प्रकाशित होता रहे।
क्योंकि कुछ लोग अपनी उम्र नहीं, अपने कर्म की उम्र बढ़ाते हैं; और कुछ जीवन समाप्त होकर भी समाप्त नहीं होते—वे अपनी साधना के रूप में पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।
