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मधुबाला शर्मा, जयपुर

भाद्रपद माह के कृष्ण-पक्ष की अष्टमी जन्माष्टमी पर्व के रूप में मनायी जाती है। इसी दिन पूर्ण पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। सृष्टि के इतिहास में यह अत्यंत पावन दिन माना जाता है। यह जन आस्था का दिन है, जिसे हर धार्मिक एवं श्रद्धालु भारतीय जन बड़े ही उत्साह एवं उमंग के साथ मनाते हैं। इसका सांस्कृतिक और धार्मिक के साथ आध्यात्मिक महत्त्व भी है।

भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म और जीवन अन्याय का प्रतिकार और धर्म की रक्षा करने में ही नियोजित हुआ। कारागार में जन्म लेना तथा जन्म के पश्चात् ही आसुरी षड्यंत्रों से बचाव, सुरक्षा के साथ मिला बचपन कँटीले काँटों से गुजरा, परन्तु यह बचपन अपूर्व तेजस्विता और वीरता का प्रतीक-पर्याय था। उनके जन्म के समय की सामाजिक और राजनीतिक नियति विपन्न थी। उन दिनों गणतंत्र राज्यों के स्थान पर विशाल साम्राज्यों की स्थापना का सूत्रपात हो गया था। सर्वत्र राजनीतिक अस्थिरता एवं अत्याचार का वातावरण था।

मगध नरेश जरासंध ने तमाम छोटे-छोटे राजाओं को कैद करके उनके राज्यों पर अधिकार कर लिया था। महा अभिमानी, महत्त्वाकांक्षी राजा शिशुपाल का अनाचार सिर चढ़कर बोल रहा था। मथुरा के राजा कंस की दुष्टता और राज्य लोलुपता इतनी उग्र थी कि वह अपने वृद्ध पिता उग्रसेन को कारावास में बंद कर सिंहासन का अधिकारी बन गया था। राजनीति के पटल पर इन व्यक्तियों को व्यवस्थित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण को अपनी किशोर वय होमनी पड़ी।

भगवान् कृष्ण का बचपन और किशोरावस्था गोकुल के ग्वाल-बालों को संगठित व शिक्षित करने तथा उनमें धार्मिक व सांस्कृतिक प्रतिमानों को स्थापित करने में बीता। इसी समय उन्होंने अनेक उत्पाती व अनाचारी असुरों का संहार भी किया। कंस को मारने के पश्चात् जब वे सिंहासनारूढ़ हुए, तब उनके अल्हड़ यौवन के आगमन के दिन थे, परन्तु उन्होंने साम्राज्य की कँटीली राहों पर चलकर अपने जीवन को बहुआयामी बनाया। उन्होंने जीवन के अनेक आयामों को गढ़ा, सँवारा और औरों के लिए भी पाथेय बनाया।

भगवान् कृष्ण एक साथ जीवन के अनेक तलों पर जीते थे और अधिकारपूर्वक जीते थे। ऐसा योगी ही कर सकता है। वे महायोगी और पूर्ण पुरुष थे। वे योगी भी थे और योद्धा भी। वे कर्मयोगी भी थे तथा कर्म से निवृत्त संन्यासी भी थे। वे एक साथ अर्जुन के सखा, सुदामा के सहचर, उद्धव के आचार्य, गोपियों के स्वामी, तपस्वी, सिद्ध, सन्त, वैरागी तथा अध्यात्मपुरुष थे।

भगवान् कृष्ण के कार्य अद्भुत और निराले थे। वे एक साथ अनेक विरोधी और विचित्र कार्यों को करते थे। वे गोपियों के संग महारास रचते थे और राजनीति के घोर कर्मों को भी समाहित कर लेते थे। महाभारत के युद्ध के बीच उन्होंने अर्जुन को गीतोपदेश भी दे दिया। युद्ध के वातावरण में सम्यक् ज्ञान का उपदेश देना दुष्कर कार्य है। उन्होंने असंभव को संभव किया और अर्जुन के सारथी बने। महाभारत के पश्चात् हुए राजसूय यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों का पद-प्रक्षालन तथा जूठी पत्तलों को उठाने का कार्य किया। द्वारकाधीश बनकर भी अपने मित्र सुदामा को यथोचित सम्मान एवं सहयोग दिया। वे ज्ञान के ज्वलंत प्रतिमान थे। अपने पिता वसुदेव एवं उद्धव को इसका बोध कराया। वे प्रेमावतार थे। दुर्योधन के राजसिक स्वागत को छोड़ विदुर के घर चले आए। उन्होंने प्रेम के आयाम को एक नवीन विस्तार एवं व्यापकता दी।

कृष्णावतार में अध्यात्म की गहन गूढ़ता पिरोई हुई है। महारास अध्यात्म की उच्चतम अवस्था है। निविड़ निशा में सोती हुई गोपियों को वंशी बजाकर जगाना, घरों से बाहर एकांत में बुलाना और उनके साथ नृत्य करना, हर गोपी को पूर्णकृष्ण के साथ नृत्य का अनुभव कराना असामान्य घटना है। यह प्रतीकात्मक है। अज्ञान व्यामोह की निविड़ निशा में प्रबुद्ध आत्माओं का ईश्वरीय वाणी, आत्मपुकार की वंशी द्वारा उद्बोधन किया जाना, सीमित परिवार की उपेक्षा कर विश्व परिवार के लिए आगे बढ़ चलना, ईश्वरीय प्रयोजन में सबका एक साथ तन्मयतापूर्वक जुट जाना ही तो महारास है। गोपियाँ प्रबुद्ध आत्माएँ हैं, वंशी आत्मा की पुकार, महारास विशेष ईश्वरीय प्रयोजन, निशा व्यामोह, परिजनों की उपेक्षा स्वार्थ और संकीर्णता की परिधि का साहसपूर्वक उल्लंघन का प्रतीक है।

भगवान् कृष्ण की सोलह हजार रानियाँ बताई जाती हैं। इस पहेली के पीछे भी आध्यात्मिक निगूढ़ता छिपी हुई है, जो यह स्पष्ट करती है कि भगवान् श्रीकृष्ण अध्यात्म जगत् के शिखरपुरुष थे। श्री अरविन्द ने उनकी चेतना को ‘ओवर माइंड’ कहा है। सोलह हजार रानियाँ आत्माएँ हैं, जो परमात्मा की प्राणप्रिय पत्नियाँ कहलाती हैं। आत्मसमर्पण और अभिन्न एकता की जो भावनात्मक स्थितियाँ हैं, उनकी तुलना लौकिक रिश्ते में पति-पत्नी के रूप में की जाती है। इसलिए सूफियों ने आत्मा और परमात्मा की एकता को प्रणयसूचक गीतों में गाया है।

भगवान् कृष्ण का अवतार एवं उनकी लीलाओं में अध्यात्म के मोती बिखरे पड़े हैं। अन्वेषक, साधक, योगी इन सूत्रों का अपने अंतर्जगत् में अभ्यास करते हैं और महारास के महारहस्य की आनन्दानुभूति करते हैं। भगवान् कृष्ण का जीवन शिक्षाओं और प्रेरणाओं से भरा हुआ है, उसमें प्रत्येक अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पा सकता है। उनकी गाई गीता सर्वकालीन सामयिक है और चिरकाल तक पाथेय है। भगवान् कृष्ण ने जो भी कहा, उसे अपने जीवन में उतारकर दिखाया।

जन्माष्टमी के पावन-पर्व पर हमें गंभीरतापूर्वक विश्लेषण करना चाहिए। इस उत्सव को उत्साहपूर्वक मनाकर हमें उनकी प्रेरणा को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। यह दर्शन हमारे कर्मों में उतर सके, जीवन भगवान् कृष्ण का कर्मयोग बन सके, तभी इस उत्सव की सार्थकता है।