धरती से अंबर तक रस-रंग : बीकानेर की होली के संग

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धरती से अंबर तक रस-रंग : बीकानेर की होली के संग

डॉ. कृष्णा आचार्य

साहित्यकार, कवयित्री

“जल ऊँडा थळ ऊजला, नारी नवले वेस

पुरूष पटाधर नीमड़ौ, आइयो मरूधर देस”

अपने प्राकृतिक सौन्दर्य व समृद्ध इतिहास की वजह से राजस्थान की रेत के कण-कण में पर्व व त्योहारों की धूम स्पष्ट दिखती है। भारत ही नहीं विश्व संस्कृति मानचित्र में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला राजस्थान अपने मेलों व उत्सवों का एक विशिष्ट रूप प्रदान करता है। राजस्थान का नाम लेते ही उन रण बाँकुरे वीरों व देशभक्तों की स्मृति आ जाती है। वस्तुतः राजस्थान वीरभोग्या वसुन्धरा को चरितार्थ  करने वाले बलिदानी वीरों की जन्मभूमि रही है और शौर्य के क्षेत्र में इसका वर्चस्व पूरे भारत में छाया रहा। इसी प्रकार यहां सांस्कृतिक दृष्टि से भी जन-जीवन में अनेक परंपरागत विशेषताएँ दृष्टिगत होती हैं। अब जबकि हवाओं पर वसंत का मौसम राज कर रहा है तो इस ऋतु पर रंगोत्सव होली का रंग बिखरा हुआ है।

होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह पर्व बसंत का संदेशवाहक है। इस समय प्रकृति अपने रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपने चरम उत्कर्ष पर होती है। फाल्गुन माह में मनाये जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं।

राव बीकाजी द्वारा बसाया गया बीकानेर ऋतुओं के अनुसार अपनी प्रकृति, संस्कृति, लोक परंपरा, लोक गीतों, एवं उत्सव-पर्व के लिए अपनी लोक- परंपराओं को  समेटे अपनी मौज मस्ती व आनंद में जीता है। इस नगर के निवासियों ने गहरे कुओं का पानी पिया है, तभी तो यहां के लोगों की प्रकृति, स्वभाव और सामाजिक व्यवहार भी उदारता के भावों से ओत- प्रोत है। फाल्गुन मास की आहट सुनते ही रम्मत-मंडलियों व शहर के में घंघरू बजने लगते हैं। बीकानेर के बारे में कहा जाता है-

 “ऊंट मिठाई इस्त्री सोनों गेणों साह

पांच चीज पिरथी सिरै वाह बीकाणा वाह”

 बीकानेर की होली अपने आप में अनूठी व अद्भुत आनंद के साथ मनाई जाती है। बीकानेर में होली से आठ दिन पहले  होलाष्टक,  ‘होळका’ लगते ही शहर का परकोटा अपनी रंगत में आ जाता है। शहर के परकोटे में अलग-अलग चौकों में लोक नाट्य जिन्हें ‘रम्मत’ कहते हैं- इनका मंचन शुरू हो जाता है। ‘रम्मत’ चौक के पाटों पर रात्रि के बारह बजे से सुबह तक खेली जाती है। इन रम्मतों में वीर रस, श्रंगार, हास्य-व्यंग्य, करूण रस शामिल हैं। रम्मतों में वीर रस प्रधान अमर सिंह राठौड़ की रम्मत, भक्त पूरणमल की रम्मत, फक्कड़ दाता की रम्मत, हेड़ाऊ मेरी रम्मत आदि प्रमुख हैं। रम्मत खेलने वाले लोक कलाकार बसंत पंचमी से ही अपना अभ्यास उस्ताद के साथ प्रारम्भ कर देते हैं और होली से एक सप्ताह पूर्व खैलनी सप्तमी तक यह अभ्यास चलता है।

इधर महाशिवरात्रि से रात को पुरूष अपने-अपने चंग/ डफ/ मंजीरों के साथ लोक गीतों/ धमाल के सुरीले गीतों से सामूहिक गायन व नृत्य शुरू कर देते हैं। रात्रि का समय ठंडी मीठी रातों में जब चंग की थाप बांसुरी की धुन, साथ में झांझर की झनकार सुन कोई भी स्त्री-पुरूष झूमे बगैर नहीं रहता यह लोक का संगीत रग-रग में बज उठता है। जहाँ सिर्फ आनंद की अनुभूति ही आती है, ऊर्जा   का संचार होता है कोई भी चलता राहगीर रूके बगैर नहीं रह पाता।

 शहर के जस्सूसर गेट, नत्थूसर गेट व भीतर के कुछ चौकों में यह रसास्वादन स्पष्ट दिखाई देता है। जस्सूसर गेट पर शहर के सभी चंग/ धमाल के प्रेमी अपनी हाजिरी देने जरूर आते हैं। माथै पर पगड़ी या साफा, धोती-कुरता, कमर में बांधा दुपट्टा और पैरों में घुंघरू, अपनी पारंपरिक वेशभूषा में लोक नृत्य व लोकगायन का आनंद लेते हैं।

बीकानेर में रम्मतों की शुरूआत बारह गुवाड़ चौक से ही होती है। चौक में सर्वाधिक रम्मतें खेली जाती हैं। मरूनायक चौक में “हड़ाऊ मेरी’’ रम्मत का आयोजन होता है यहां रात्रि को ‘डांडिया’ भी खेला जाता है।

बीकानेर शहर जहाँ पूरा परकोटा एक छत माना जाता है। खेलणी सप्तमी को शहर के सभी सेवग समाज के लोग माँ नागणेची के दरबार में रंग-उत्सव मना कर होली का आगाज करते हैं।

होली की धूम बारह गुवाड़ चौक में अधिक दिखाई देती है। इस चौक में बनने वाले ‘स्वांग’ व ‘मेहरी’ होली के दिनों में चर्चा का विषय बन जाते हैं।

आचार्यों के चौक में वीर अमर सिंह राठौड़ के जीवनवृत पर आधारित रम्मत होती है। रम्मतों में ख्याल के साथ राजनीतिक व्यवस्था पर कटाक्ष और व्यंग्य भी होते हैं।

बिस्सों के चौक में होने वाली रम्मत भक्त पूरणमल की रम्मत और शहजादी नौटंकी की रम्मत होती है। भट्ठड़ों के चौक में रम्मत खेल जाती है।

हर्षां के चौक में फाल्गुन शुक्ला द्वादशी के दिन हर्षां व व्यासों  का पानी का खेल होता है। जोकि विश्व प्रसिद्धी की ओर  अग्रसर हो रहा है। यह पानी का खेल हर्ष व व्यास जाति के आपसी सुलह की घटना को चिरस्थाई रखने ये दोनों जातियां आपसी सौहार्द्र के रूप में पानी के खेल को शुरू किया जो आज भी अनवरत रूप से चल रहा है। पानी का यह खेल सोशल मीडिया द्वारा विश्व स्तर पर दिखाया जाता है।

यहां मोहता चौक में एक दिन भांग की मस्ती सजती है। शहर के कई हिस्सों से भांग प्रेमी यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव के जयकारों के बीच होलीकी मस्ती में मदमस्त होकर भांग पीते हैं।

होली के इन्हीं दिनों में धरणीधर खेल मैदान में खेले जाने वाले “फागुनिया फुटबाल मैच” का भी लोग भरपूर आनंद उठाते हैं। इस मैच में लोग प्रधानमंत्री, रूसी राष्टंपति, अमेरिकन

राष्ट्रपति और न जाने कितने-कितने सिलीब्रिटीज के स्वांग रचाकर आते हैं और फुटबॉल खेलते हैं, स्वांग रचाने वाले इन हस्तियों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और इनके साथ अपनी सेल्फी भी लेते हैं। होली के इन दिनों में रात्रि को कई ‘गेर’ भी निकलती हैं। ‘गेर’ में भाईचारा व अपनापन झलकता है।

होली के दिन सुबह बहन अपने भाई की मंगलकामना हेतु परिवार की खुशहाली हेतु अपने भाई के ‘माला’ घोलती है। ये माला पुष्पों की भी हो सकती है। परंपरागत रूप में गोबर के बने ‘भड़भोळियों’ से बनाई जाती है। रात्रि को जगह-जगह होलिका दहन होता है। रात भर रसिये घूमते रहते हैं।

होली के दूसरे दिन धुलंडी के दिन पूरा शहर रंगों से खेल अपने उत्साह को बढ़ाता है।

परकोटे से निकलती गेर, होली के गीतों के गाड़े, डीजे पर थिरकती मस्तानों की टोलियां और इन सबके बीच गुलाल और रंगों से रंगे हुए आनंद में झूमते चेहरे। होली के इन दो दिनों में बीकानेर पूरी तरह सतरंगी रंगों में रंग जाता है। नत्थूसर गेट पर आजकल ‘तणी’ बंधती है, पहले सूरदासाणी गली में ये तणी बंधती थी। यहाँ ‘तणी’ तोड़ने की परम्परा रही है, इस बंधी हुई तणी को तोड़ने की रस्म भी अलबेली है- धुलंडी के दिन किराडू जाति के व्यक्ति के कंधे पर गंगादासाणी जोशी परिवार का नवयुवक चढ़ कर तलवार से गीली मूंज व पुराने जूतों आदि से बनी तणी का तोड़ता है। उस समय पूरा शहर रंग व रस में सराबोर हो उठता है। गुलाल-रंग से धरती से अंबर तक रंगीला गुलाबी वातावरण हो जाता है।

इस प्रकार बसंत पंचमी के साथ ही शहर में शुरू हुई होली की चहल कदमी, हुड़दंग मन का आनंद, धुलंडी की रात तक परवान चढ़ी रहती है।

कहीं गुलाल और रंग परिवेश को रंगीन करते हैं तो कहीं भंग की तरंग छाई रहती है तो चंग की थाप ओर मन को थिरकने में कोई कमी नहीं छोड़ी जाती। होली के रसिकों ने जहां परंपराओं का निर्वहन किया वहीं गेवरियों में सारी सीमाएँ लांघने की भी होड़ रहती है। होली की रंगत ऐसी कि कहीं कोढिया रंग से चेहरा काला कर देते हैं तो कहीं बाल्टियां भर-भर एक दूसरे पर पानी डालते हैं। एक-दूसरे पर पिचकारी से भी रंग डालते, गाते-बजाते लोग विभिन्न मोहल्लों में गेर निकालते हैं। होली की रंगत में वैसे तो पूरा शहर ही आनंद मनाता है लेकिन परकोटे के भीतर की रंगत का काई मुकाबला नहीं। जगह-जगह स्वांगधारी, चंग की थाप के साथ धमाल और नाचते-गाते-झूमते रसिक। ये नजारे देखने प्रवासी भी खूब आते हैं। आजकल कई लोग केवल अबीर-गुलाल से होली खेलकर पानी बचाने का भी संकल्प लेते हैं।

अस्तु! “आवो जी आवो म्हारे बीकाणे सैहर में हवा-पाणी प्रेम रंग खूब मिलसी…’’

 

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