
डॉ. श्रीमती बसन्ती हर्ष
मुख्य सम्पादक
पुष्करणा सन्देश (मासिक पत्रिका)
प्रिय पाठकों!
इन दिनों ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से हम सभी प्राणी आकुल – व्याकुल हो रहे हैं। घरों में तो हम सभी पंखों, कूलर व ए. सी. आदि की ठंडक से आराम पाते हैं परन्तु राहगीरों व पथिकों को वृक्षों की शीतल छाया से जो सुख प्राप्त होता है वह वर्णनातीत होता है। वैसे भी हरियाली का अपना महत्व व उपयोगिता है। इसी से जीवन्तता है, प्रगति है। सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘पंचवटी’ की निम्नांकित पंक्तियां उल्लेखनीय हैं –
वन की एक एक हिमकणिका
जैसी सरस और षुचि है
क्या सौ सौ नागरिक जनों की
वैसी विमल रम्य रूचि है?
प्रकृति क सुन्दरता का वर्णन करते हुए श्री गुप्तजी ने वृक्षों की महिमा प्रतिपादित की है। प्राकृतिक दृश्यों यथा वृक्ष, झरने आदि पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सदैव सहयोगी रहे हैं। मनुष्य, पशु – पक्षी, कीट – पतंग, वायु, जल, भूमि आदि सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्रकृति ने इन सब की संरचना इस प्रकार से की है ये सब परस्पर पूरक रहते हुए इस धरा पर सन्तुलनमय जीवन बिता सकें। युगों युगों से प्रकृति प्रदत्त ये गतिविधियां निरन्तर अबाध गति से चल रही हैं। जीवनचर्या हेतु मनुष्य व पशु पक्षियों को उनकी आवश्यकतानुसार प्राकृतिक संसाधनों से यथा सम्भव सब कुछ उपलब्ध होता रहता है तथा प्रकृति भविश्य हेतु पुनः सृजन के द्वारा सबको पोशित करती रहती है।
दुर्भाग्य से लगभग एक षताब्दी से निरन्तर मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पाने के लिए वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति की, जनसंख्या के विस्तार के कारण औधोगिक क्रान्ति की ओर अग्रसर हुआ तब से ही प्रकृति का निरन्तर दोहन होते – होते वनों की कटाई के साथ – साथ जल, वायु, भूमि आदि प्राकृतिक संसाधनों की कमी होते होते वातावरण प्रदूषित होने लगा।
प्रदूषण की समस्या अभी हमें चाहे इतनी गम्भीर न दिखे परन्तु इसके भावी परिणाम हमारे लिए खतरनाक हो सकते हैं। इस पर नियन्त्रण पाने के लिए हम सबको निरन्तर उपाय करने चाहिये जिससे समस्या आगे जाकर अधिक जटिल न बने।
वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई करके प्रकृति के साथ मानव द्वारा किए गए खिलवाड़ के दुष्परिणाम हम सभी को आज सहन करने को विवश होना पड़ रहा है। उदाहरणार्थ मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घट रही है, जल का जरूरत से ज्यादा दोहन तथा फिजूल खर्च करने के कारण हमारे जल स्त्रोत सूखने के कगार पर हैं। कीटनाशकों का अत्यधिक सेवन करने से वातावरण तो प्रदूषित हो ही रहा है साथ ही खाद्य श्रृंखला भी दूषित हो रही है। कीट – पतंगों व मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चिन्ता का विषय बनी हुई है।
शहरों में यातायात के क्षेत्र में भी देखें तो स्कूटर, मोटर साइकिल, कार व बसें आदि पेट्रोल व डीजल से चलने वाले आवागमन के साधनों के धुएं से वायु प्रदूषण निरन्तर बढ़ता जा रहा है ।
शोधपूर्ण अध्ययन से यह बात स्पश्ट हो चुकी है कि प्रदूषण न केवल वातावरण पर विपरीत प्रभाव डालता है अपितु समस्त चराचर जगत को प्रभावित करता है। औधोगिक क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी विकट है जहां फैक्टरियों की अग्नि के धुएं तथा यातायात वाहनों के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण से लोग अस्थमा, खॉंसी, टी. बी., कैंसर, नेत्रजनित रोगों की चपेट में आ जाते हैं जिनसे निजात पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है ।
पर्यावरण प्रदूषण से होने वाले दुष्परिणामों से अवगत होकर सम्पूर्ण विश्व में इस पर नियन्त्रण के उपाय किए जा रहे हैं । औधोगिक कम्पनियों को शहरों से दूर लगाने के साथ – साथ अधिकाधिक पेड़ – पौधे लगाकर प्रदूषण कम करने के प्रयास सरकार द्वारा निरन्तर किए जा रहे हैं। सड़क परिवहन के नियमों द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियों में भी सुधार किया जा रहा है। परन्तु इससे सम्पूर्ण प्रदूषण समाप्त हो जायेगा, ऐसा सम्भव नहीं है।
इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे घरों में दैनन्दिन कार्यों से भी प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि ही होती है। हमारे समाज में भी देखें तो आज भी पॉलिथिन की थैलियों के बहिष्कार तथा घरों को स्वच्छ रखने की बात की गम्भीरता से अनुपालना करने में घर – परिवार के लोग संकल्प बद्ध नहीं हैं। जिसके कारण पशु – पक्षियों को भी अकाल मृत्यु का वरण करना पड़ता है।
जैसा कि ऊपर संकेत दिया गया है इस जगतीतल पर समस्त चराचर जगत किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर आश्रित है अतः सृष्टि की प्रत्येक रचना की उत्पत्ति के साथ उसका पालन – पोषण व संवर्धन भलीभांति होने पर ही यह प्रकृति चक्र विधिवत् आगे बढ़ सकेगा। अन्यथा हमें ऑंधी तूफान आदि भीषण प्राकृतिक उत्पातों व आपदाओं का सामना करना पड़ता है जो जन – धन की हानि के कारण अत्यन्त षोचनीय बन गया है।
जल का निरन्तर प्रदूषण मानव के स्वास्थ्य पर सीधा असर करता है। प्रदूषित जल अनेकानेक जानलेवा बीमारियों को आमन्त्रित करता है । अतः जल – शुद्धिकरण के अनेक उपाय किए जाते रहे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पाठशालाओं व महाविद्यालयों में पर्यावरण विषयक चर्चा को महत्व दिया जाना चाहिए ताकि बाल्यकाल से ही हम वनों व वृक्षों के पोषण के साथ – साथ जल संरक्षण तथा सर्वत्र स्वच्छता का मोल जान सकें। परस्पर विचार – विमर्श के द्वारा पर्यावरण स्वच्छता की टेक्नॉलोजी में सुधार किया जाये।
वस्तुतः ‘पर्यावरण’ का विषय इतना व्यापक है कि इसका विस्तृत अध्ययन इस आलेख में सम्भव नहीं है। इतना ही कहना होगा कि ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के इस अवसर पर प्रदूषण रोकने हेतु हम सभी को किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता देनी चाहिये, चाहे वह पौधे लगाने के रूप में अथवा पॉलिथिन बहिष्कार रूप में ही क्यों न हो।
हमें हमारी समाज, व्यवस्था को उन्नत करने तथा राष्ट्र को सुखी, सक्षम व समृद्ध बनाने हेतु प्रदूषण नियन्त्रित करना आवश्यक है।
इति शुभम्।

