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मधु बाला शर्मा, जयपुर

नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये। 

निष्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे।।

गुरु पूर्णिमा को अनुशासन पर्व भी कहा जाता है और गुरुजनों का अनुशासन स्वीकार किए बिना कुशलता में निखार नहीं आ सकेगा। आध्यात्मिक स्तर पर यह अनुशासन और भी गहरा एवं अनिवार्य हो जाता है। क्योंकि अध्यात्मवाद मानवता के बीते हुए कल का इतिहास है। वह इतिहास जो मनुष्य का कायाकल्प करने वाला है, जो मनुष्य के अंतरंग उत्कर्ष की विधा है, जो मनुष्य जीवन की सार्थकता का अनुपम इतिहास है, जो सृष्टि के सृजन का कारण प्रकट करता है। अतः ज्ञानेन्द्रियों से न जानने वाले उस जगत् में प्रवेश करना गुरु के बिना संभव नहीं।

जब भी आत्मिक प्रगति की चर्चा की जाती है, तो मार्गदर्शन के लिए सद्गुरु का आश्रय लिए जाने की बात सुझाई जाती है। गुरु एक ऐसी सत्ता को कहा जाता है, जो उत्कृष्टताओं, सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय हो, जिसके पदचिह्नों पर चलकर, जिसके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन को अपनाकर जीवन को श्रेष्ठ एवं सार्थक बनाया जा सके। कहा भी गया है :

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु:, गुरुर्देवो महेश्वर:।

अर्थात् जो ब्रह्मा की तरह हमारे हृदय में उच्च संस्कार भरते हैं, विष्णु की तरह उनका पोषण करते हैं और शिवजी की तरह हमारे कुसंस्कारों का नाश करते हैं, वे हमारे गुरु हैं। गुरु के संबंध में इस बात से भी संतोष न हुआ तो आगे कहा गया है :

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:। 

अर्थात् ब्रह्माजी ने तो सृष्टि की रचना की, विष्णुजी ने पालन-पोषण किया और शिवजी संहार करके नई सृष्टि की व्यवस्था करते हैं, किंतु गुरुदेव तो इन सारे…

चक्करों से छुड़ाने वाले परब्रह्म स्वरूप कर शिष्यों के समक्ष आत्मदर्शन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। क्योंकि गंगोत्री का मार्ग वही बता सकता है, जो स्वयं गंगोत्री गया हो :

एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। 

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।

अतः सद्गुरु की महिमा का वर्णन अप्रमेय, अकथनीय, अनिर्वचनीय है। जैसा कि कबीरदासजी ने कहा है :

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय। 

सात समंद की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।

गुरु स्वयं ईश्वर की साकार प्रतिमा है, सच्चिदानंद परमात्मा का दर्शन कराने वाली सत्ता है, गुरु ईश्वर का सीधा निर्धारण है, उसी के द्वारा की गई नियुक्ति है। वे ही सर्वेसर्वा हैं। उन पर बार-बार न्यौछावर होना गर्व की बात है।

गुरु की महिमा बताते हुए कबीरदासजी ने कहा है :

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। 

बलिहारी गुरु आपनौ, गोविन्द दियो बताय।।

इतिहास साक्षी है कि गुरुजनों के सान्निध्य अवलंबन से कितने ही सामान्य व्यक्तियों को असामान्य बनने का अवसर मिला है। क्योंकि मनुष्य में जो भी बुराइयाँ होती हैं वे सभी गुरु द्वारा दूर की जाती हैं। जैसे :

गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट। 

अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोटे।

ऐसे अनेक शिष्यों के उदाहरण दिए जा सकते हैं जिन्हें गुरु के सान्निध्य से उच्च शिखर तक पहुँचने का अवसर मिला। गुरु कृपा द्वारा ही अंगुलिमाल, आम्रपाली जैसे कितने हीन व्यक्ति महामानव के रूप में कायाकल्प कर सकने का सौभाग्य अर्जित कर सके। इसी प्रकार गुरु गोविन्द पाद के शिष्य आद्यशंकर, जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, निवृत्तिनाथ के शिष्य गोरक्षनाथ, गहनीनाथ के शिष्य चैतन्य महाप्रभु, श्री अरविन्द की शिष्या श्री माँ, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद के शिष्य सदानंद एवं भगिनी निवेदिता, स्वामी

विरजानंद के शिष्य महर्षि दयानन्द, बुद्ध के शिष्य आनन्द, चाणक्य के शिष्य चन्द्रगुप्त, नागार्जुन के शिष्य कनहपा, व्यासजी के शिष्य सूत-शौनिक आदि की आत्मिक घनिष्ठता न बन पड़ी होती तो यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि दोनों ही पक्ष घाटे में रहते।

यदि हम गौर करें, तो करोड़ों सूर्य और चन्द्रमा भी व्यक्ति के अन्तःकरण में बैठे अँधकार को दूर नहीं कर सकते। वह तो केवल सद्गुरु द्वारा दिए ज्ञान को व्यवहार में उतार कर ही दूर किया जा सकता है। सद्गुरु जीवन में प्रकाश, ठंडक, आत्मशान्ति प्रदान करते हैं तथा भवसागर से पार लगाते हैं। भवसागर अर्थात् भावों का सागर, जो हमें दुःख, सुख, मान, अपमान, लाभ-हानि का बोध कराता है। गुरुजन इन सबसे ऊपर उठाकर मनुष्य को स्वयं के समान बना लेते हैं। ठीक ही कहा है :

पारस में अरु सन्त में, बहुत अन्तरो जान। 

वो लोहा सोना करे, गुरु करे आप समान।।

जीवन में सद्गुरु मिल जाएँ तो मनुष्य जन्म सार्थक हो जाए। क्योंकि : 

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। 

सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

अतः सद्गुरु की महत्ता अवर्णनीय है : 

नमस्ते सते ते जगत्कारणाय। 

नमस्ते चिते सर्वलोककारणाय। 

नमो द्वैतत्त्वाय मुक्तिप्रदाय। 

नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय।