संवित् धारा सदैव प्रवाहित रहे…

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संवित् धारा सदैव प्रवाहित रहे…

डॉ अभय सिंह टाक

श्री लालेश्वर महादेव मंदिर, शिवबाड़ी मठ के अधिष्ठाता और शंकरी परम्परा के महान संत स्वामी संवित् सोमगिरीजी महाराज के देवलोकगमन पर शोक छा गया। उनके अनुयायियों सहित देशभर के विभिन्न संगठनों की ओर से उनके देवलोकगमन पर दुख व्यक्त किया गया है। देश-विदेश के मंदिरों-मठों व आश्रमों के महंतों-पुजारियों की ओर से भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। बड़ी संख्या में राजनेताओं ने महाराज के देवलोक गमन को आध्यात्मिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
बीकानेर में ही 23 नवम्बर 1943 को जन्मे सोमगिरीजी महाराज ने 23 वर्षों तक अर्बुदाचल की तपोभूमि में वेदांत का अध्ययन करते हुए गहन साधना की थी। 20 नवम्बर 1994 को शिवबाड़ी मठ (श्री लालेश्वर महादेव मंदिर) के अधिष्ठाता पद पर बैठाया गया। जब 1994 में महाराज ने शिवबाडी मठ के महंत का दायित्व संभाला था तब यह जर्जर और विरान था। जिस सद्भावना से बीकानेर राजपरिवार ने इस मंदिर की स्थापना की थी, उस उद्देश्य पर ही कुठाराघात हो रहा था। शिव-मठ का वैभव कांतिहीन होता जा रहा था। यह तो राजमाता सुशीला कुमारीजी की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने स्वामीजी को ही शिवबाड़ी मठ के महंत पद पर अभिषिक्त करने का मन बना लिया। स्वामी विशोकानंद भारतीजी महाराज के प्रयासों से शंकराचार्य पूज्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वतीजी द्वारा उन्हें महंत पद पर बैठाया गया। इस स्थान को महाराज ने अथक प्रयास कर एक बार फिर से एक पावन स्थल के रूप में विकसित कर दिया है। बीकानेर का पूर्व राजपरिवार व आम नागरिक अब महंत स्वामी विमर्शानंदजी को सतत समर्थन प्रदान करावें ताकि शिवबाड़ी मठ के मूल स्वरूप को संरक्षित रखा जा सके।
मूल रूप से इंजीनियर संवित् सोमगिरीजी महाराज बीकानेर में आम सनातनी के लिए आस्था का केंद्र रहे। ‘आधुनिक राजस्थान के विवेकानंद’ नाम से विख्यात स्वामी संवित् सोमगिरीजी महाराज का बीकानेर के अलावा सोमनाथ महादेव मन्दिर, संत सरोवर, माउंट आबू में भी एक मठ चल रहा है। स्वामीजी ने अपनी प्रखर आध्यात्मिक शक्ति और समर्पण से छोटी काशी बीकानेर के साथ साथ राज्य के अनेक क्षेत्रों में धर्म और गीता ज्ञान का व्यापक प्रसार किया है। सनातन चेतना के उद्दीपन के लिए उन्होंने 1996 में मानव प्रबोधन प्रन्यास की स्थापना की और प्रमाणित एवं परिष्कृत साहित्य का सृजन किया। इस साहित्य का अध्ययन-अध्यापन एवं प्रचार-प्रसार ही स्वामीजी को सच्ची श्रद्धांजलि है। देशभर में गीता ग्रंथ के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए उन्होंने अनूठा कार्य किया। गीता को जन-जन तक पहुंचाया, श्रीमद्भगवद्गीता के मर्म को समझाया।
न्होंने 1995 में गीता ज्ञान परीक्षा की शुरुआत की। 25 वर्षों से लगातार आयोजित इस परीक्षा के माध्यम लाखों विद्यार्थियों को श्रीमद्भगवद्गीता से जोड़ा। 2002 में संवित् शूटिंग संस्थान की स्थापना की। आज देश भर में संवित् शूटिंग संस्थान एक प्रतिष्ठित शूटिंग संस्था मानी जाती है। हर वर्ष इस के शिक्षार्थी राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। संवित् धनुर्विद्या संस्था की स्थापना भी महाराज ने अभी तीन वर्ष पहले ही की थी। उल्लेखनीय है कि गांधीनगर, बीकानेर स्थित संवित् शिक्षण संस्थान का बीजारोपण 1999 में स्वामी संवित् सोमगिरीजी महाराज द्वारा ही किया गया था। 9 जून, 2016 से प्रकाशित हो रहा ‘शाद्वल’ भी महाराजश्री द्वारा ही शिव संकल्पित है।
स्वामीजी की वाणी में राष्ट्र प्रेम का ओज है। भारतीय संविधान में उनकी गहरी आस्था रही। वे लोकतांत्रिक परंपरा के सच्चे संवाहक थे। हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार सोमगिरीजी महाराज ने कभी भी अन्य धर्मों की उपेक्षा नहीं की। उनका मानना था कि धर्म हमें मानवता सिखाता है। अतः हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। स्वामीजी लिखते हैं:-
जहाँ अमित आनंद बसत है
विगलित द्वैत शरीर
जहाँ परम प्रेम बरसत है
लहरित संवित् नीर।।
संवित् धारा हममें सदैव प्रवाहित रहे, यह अब हमारा उत्तरदायित्व है।
जय हिंद!
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