आज के युग में नवरात्रि की प्रासंगिकता

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आज के युग में नवरात्रि की प्रासंगिकता

डॉ. (श्रीमती) बसन्ती हर्ष

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

मातृरूप स्वयं सदैव शक्ति स्वरूपा है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान प्रतीत होते हैं। जो देवी समस्त भूत प्राणियों में शक्ति स्वरूपा होकर विद्यमान है, उस देवी को बारम्बार नमस्कार है।

पुराणों के अनुसार सृष्टि की आद्या मां दुर्गा है। आश्विन् मास की शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक देवी दुर्गा का पक्ष माना गया है। प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रा होती है । नवशक्ति समायुक्तां नवरात्र तदुच्यते। अर्थात् नौ शक्तियों से युक्त होने के कारण इसे नवरात्रा कहा गया है। नवदुर्गा, दस महाविद्या, अन्नपूर्णा, जगद्धात्री, कात्यायनी, ललिताम्बा, गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगुला तथा दुर्गा आदि सभी इन्हीं के स्वरूप हैं। एक ही देवी के विभिन्न मतावलम्बियों के द्वारा भिन्न-भिन्न स्वरूपों की उपासना की जाती है। शाक्त मतावम्बी अपने परम श्रेय के निमित भगवती आद्या शक्ति के गंगा, पार्वती, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती, काली तथा तुलसी आदि विभिन्न स्वरूपों में उपासना करते हैं। जहां सद्विद्या की प्राप्ति हेतु महासरस्वती की पूजा की जाती है, आर्थिक सुदृढ़ता हेतु महालक्ष्मी जी की उपासना होती है, वहीं सर्वत्र सुफल प्राप्ति के लिए महाकाली का आहवाहन व पूजन किया जाता है।

वस्तुतः सच्चिदानन्द स्वरूपा भगवती दुर्गा समस्त विश्व को अस्तित्व, उत्साह व सरसता प्रदान करके कल्याण की ओर अग्रसर करती है। नवरात्रि में देवी का अनुष्ठान अत्यन्त मंगलकारी एवं शुभफलप्रद होता है । जैसा कि बृहत्सार संहिता में कहा गया है कि –

आश्विनस्य सिते पक्षे नानाविधमहोत्सवैः।

प्रसादयेयुः श्रीदुर्गा चतुर्वर्गफलार्थिनः॥

अर्थात् आश्विन् शुक्ल पक्ष में विशेष महोत्सवों से श्री दुर्गा जी की पूजा धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये चारों प्रदान करने वाली होती हैं।

नवरात्रि से पूर्व श्राद्ध पक्ष में हमारे दिवंगत पूर्वजों का भलीभांति श्राद्ध व तर्पण होना आवष्यक है। हमारे जीवन के आधारभूत माता-पिता को जीतेजी आदर व सुरक्षा के साथ-साथ मरणोपरान्त उनके लिए शास्त्र सम्मत सादर श्रद्धांजलि देने के लिए श्राद्ध की भी गरूड़ पुराण में बहुत महता बताई गई है। तत्पश्चात् ही नवरात्रि में माता दुर्गा की विधिविधान से पूजा अर्चना व अनुष्ठान विशेष फलदायिनी है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से तो शारदीय नवरात्रि का महत्व है ही। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यदि हम चिन्तन करें तो हम पायेंगे कि ऋतु परिवर्तन के इस काल में ग्रीष्म ऋतु का अवसान होने लगता है तथा शीत ऋतु दस्तक देने लगती है। सर्वत्र प्रकृति की हरीतिमा तथा सुखद मौसम, हृदय व मस्तिष्क में एक नवीन उर्जा का संचार करते हैं। नवरात्रि में मां भगवती की श्रद्धा पूर्वक पूजा समस्त वातावरण को ऊर्जा व शक्ति से भर देती है। मौसम के इस परिवर्तित होते समय में उदर की पाचन शक्ति भी कमजोर हो जाती है अतः इन दिनों में व्रत उपवास के द्वारा पेट को थोड़ा आराम दिया जा सकता है। जिससे विभिन्न रोगों से बचने की युक्ति मिलती है।

मां भगवती की पूजा समस्त नारी जाति को देवी स्वरूपा मानने की द्योतक है। प्रकृति ने माता के रूप में नारी को कोमलता, दृढ़ता, ममता, वात्सल्य, स्नेह आदि अनेक दुर्लभ गुण प्रदान किये हैं। नारी के ये महान गुण केवल मात्र अपनी सन्तान तक सीमित न रहकर व्यापकता लिए हुए हैं। इसी कारण से हमारे ऋषि मुनियों ने इस शक्ति स्वरूपा के महनीय गुणों को पहचान कर उसे देवी के रूप में महिमा मण्डित किया। जो प्रतिवर्ष नवरात्रि के अवसर पर बारम्बार अवतार लेती है । इसी महत्ता को स्वीकार करते हुए साधकों व आराधकों ने प्रखरता व उत्थान के पथ पर साहस के साथ-साथ दया व करूणा की याचना हेतु मां की शरण में जाना श्रेयस्कर समझा।

ऋग्वेद के अनेक सूक्तों व ऋचाओं में वीरांगनाओं की युद्ध कुशलता का परिचय मिलता है। दिव्य शक्तियों के समन्वित स्वरूप में माता दुर्गा ने महिशासुर, मधु-कैटभ, चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, रक्त बीज, धूम्रलोचन आदि राक्षसों का वध किया था । वस्तुतः अनेकानेक महान् व पुनीत कार्य सम्पन्न करने वाली शक्ति स्वरूपा माता के विभिन्न रूप हैं। परन्तु पुण्य बल शाली सन्तजन ही उनके दिव्य रूप के दर्शन पाते हैं।

आज के युग में नवरात्रि सदृश पर्वो पर मां भगवती की पूजा आराधना और भी अधिक महत्वपूर्ण व आवश्यक है । नारी शक्ति की प्रखरता को समझना होगा। आज कन्या भ्रूण हत्या दहेज हत्या तथा महिलाओं के साथ किए गये विभिन्न अनैतिक व्यवहार से नारी जाति के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। यही नहीं, आज की भोगवादी संस्कृति में माताएं अपनी संतान के प्रति ममता व वात्सल्य रूपी कर्तव्यबोध से विमुख होने लगी हैं, जिससे नारी अपनी दिव्य शक्ति को खोने लगी है।

प्रतिवर्ष नवरात्रि के अवसर पर की जाने वाली पूजा हमें यह याद दिलाती है कि हम नारी की गरिमा को पुनः महिमामण्डित करें। माताएं भी अपनी संतानों को संस्कारित करने के अपने उत्तरदायित्व को गहराई से समझें। नारी जाति को महिलाएं स्वयं भी अस्तित्व के साथ-साथ स्नेह व सम्मान प्रदान करें। तब ही नवरात्रि पर माता भगवती के प्रति सादर पूजा-आराधना सार्थक सिद्ध होगी । समस्त विश्व के कल्याण हेतु नारी को गौरवमय स्थान प्रदान करना परमाश्यक है।

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