आध्यात्मिक चेतना के प्रतिष्ठित और प्रखर सूर्य हुए ब्रह्मलीन
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शंकरी परंपरा के दिव्य संत का भूसमाधि से किया अंतिम संस्कार
गिरिराज खैरीवाल
सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रखर संवाहक, आधुनिक राजस्थान के स्वामी विवेकानंद, विद्वान संत, धर्म और विज्ञान के समन्वयक, स्वामी संवित् सोमगिरि महाराज मंगलवार रात्रि लगभग सवा आठ बजे ब्रह्मलीन हो गए। बीकानेर के लालेश्वर महादेव मंदिर के अलावा माऊंट आबू स्थित श्री सोमनाथ महादेव मंदिर, सोमाश्रम संत सरोवर के महंत का दायित्व भी महाराज के पास था। संत समाज में महाराज की विशिष्ट पहचान थी। अभी तीन दिन पहले ही साहित्यिक शख्सियत डॉ श्रीलाल मोहता की मृत्यु के सदमें से बीकानेर उभर ही नहीं सका है, ऐसे में सोमगिरि महाराज जो कि बीकानेर के अभिभावक के रूप में प्रतिष्ठित थे, का महाप्रयाण समूचे बीकानेर के लिए झकझोरने वाली सूचना है। जैसे ही यह दुखद सूचना मिली, बीकानेर के साथ साथ पूरा देश ही गमगीन हो गया। 78 वर्षीय सोमगिरि महाराज का संभांग के सबसे बड़े चिकित्सालय पी बी एम स्थित टी बी हॉस्पिटल की सघन चिकित्सा इकाई में पिछले 19 दिनों से उपचार चल रहा था। सोमगिरि महाराज को 30 अप्रैल को सुबह यहां भर्ती कराया गया था। तभी से महाराज वेंटिलेटर पर थे। धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा था। मंगलवार को अचानक शाम को 4 बजे बाद उन्हें सांस लेने में तकलीफ बढती ही गई। श्वसन रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गुंजन सोनी के अनुसार मंगलवार दोपहर बाद को उनका एक फेफड़ा डेमेज हो गया था। तत्काल उन्हें श्वास के लिए ऑपरेश्न कर नली लगाई गई लेकिन ऑक्सीजन में बढ़ोतरी नहीं हुई। चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बाद भी महाराज को नहीं बचाया जा सका। उन्होंने लगभग सवा आठ बजे अंतिम सांस ली और ब्रह्मलीन हो गए। चिकित्सकों के अनुसार संवित सोमगिरि महाराज अस्पताल में चल रहे उपचार से संतुष्ट थे। स्वयं मुख्य मंत्री अशोक गहलोत भी महाराज के स्वास्थ्य की निगरानी कर रहे थे। महाराज हॉस्पिटल में भीहर समय प्रभु स्मरण व गीता श्लोकों का स्मरण करते रहते थे। अंतिम सांस तक वे गीता श्लोकों एवं प्रभु का स्मरण करते रहे। इस से पहले 22 अप्रैल को महाराज को गंगाशहर स्थित हंशा गेस्ट हाउस में चल रहे कोविड सेंटर में भर्ती किया गया था। वहां से कोरोना निगेटिव होकर स्वस्थ होने पर 28 अप्रैल को महाराज को छुट्टी दे दी गई। उसके बाद महाराज अपने आश्रम में ही आइसोलेट हो गए थे, लेकिन 29 अप्रैल की देर रात में वापस तकलीफ बढ़ने के कारण 30 अप्रैल को अल सुबह ही महाराज को पी बी एम के आईसीयू में भर्ती करवाया गया। इस दौरान महाराज की कोरोना रिपोर्ट दो बार की गई और दोनों बार ही रिपोर्ट निगेटिव आई थी।
विशाल ह्दय के योद्धा संन्यासी सोमगिरि जी महाराज की सरलता व सहजता का है हर कोई कायल
गौरवशाली भारतीय सनातन संस्कृति के प्रबल रक्षक और प्रखर पैरोकार महाराज आजीवन सहज, सरल और सरस बने रहे। वे बीकानेर से आज से नहीं बल्कि अपने पूर्व सांसारिक जीवन से जुड़े हुए थे। उन्होंने लौकिक जीवन में भी बड़ी उपलब्धियां अर्जित की परंतु एक संन्यासी और तपस्वी के रूप में उन्होंने अपने पूर्व जीवन की छाया का एक अतिसूक्ष्म हिस्सा भी अपने आज को स्पर्श नहीं होने दिया। भारत के बड़े आध्यात्मिक और सामाजिक मंचों पर उनकी गरिमामयी उपस्थिति लोगों को न केवल गौरवान्वित अपितु रोमांचित कर देती थी। जैसे ही उनकी ओजस्वी व मिश्री जैसी मीठी वाणी का प्रस्फुटन प्रवचन के रूप में होता, लोग एक टक सुनने लगते। बच्चों के बीच में महाराज के चेहरे के हाव भाव अत्यंत प्रसन्नता वाले होते। बच्चों को सदैव आत्मविश्वासी, विनम्र, आज्ञाकारी, सुसंस्कृत , परिश्रमी बनने के साथ साथ महाराज उन्हें जिज्ञासु और वीर बनने की प्रेरणा भी देते। विनम्र व्यवहार की वजह से जो भी उनसे मिलता, उनसे अभिभूत हो जाता। उनके आशीर्वाद से श्रद्धालुओं में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था, ऐसे अनुभव अनेकानेक श्रद्धालु बताते रहते हैं। कहा जाता है कि डॉक्टर्स को इस तरह की ट्रेनिंग दी जाती है कि वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में निपुण हो जाते हैं लेकिन जैसे ही महाराज का देवलोक गमन हुआ, उनकी दिन रात सेवा में लगे डाक्टर की रूलाई फूट पड़ी। यह डाक्टर महाराज के पी बी एम में भर्ती होने के बाद से उनकी देखरेख में समर्पित हो गया और महाराज के समाधिस्थ होने के बाद ही घर गए।
मैकेनिकल इंजीनियर से बन गए परम संत
3 नवंबर 1943 को छोटी काशी बीकानेर में जन्में सोमगिरि महाराज ने अपनी स्कूली शिक्षा बीकानेर के जैन स्कूल एवं कालेज शिक्षा डूंगर महाविद्यालय से की। महाराज ने जोधपुर स्थित एम बी एम इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में 1966 में बी. ई. किया था। बाद में इसी कॉलेज में 1971 तक व्याख्याता के पद पर सेवाएं दीं। महाराज ने 09 मई 1971 में स्वामी ईश्वरानंद गिरि महाराज के शिष्य के रूप में परमहंस संन्यास दीक्षा ली। 1994 तक महाराज ने संत सरोवर में रहकर कठिन तपस्या व ध्यान व वेद, शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। शिवबाड़ी स्थित लालेश्वर महादेव मंदिर के महंत के रूप में महाराज 20 नवंबर 1994 को पदारूढ हुए। 2009 में महाराज संत सरोवर के सोमेश्वर महादेव मंदिर के महंत बनाए गए। हिंदी, अंग्रेजी व राजस्थानी भाषा के प्रकांड विद्वान महाराज की इन तीनों भाषाओं में समान दक्षता थी लेकिन फिर भी मायड़ भाषा राजस्थानी के प्रति विशेष लगाव था।
गीता ज्ञान परीक्षा ने बनाई राष्ट्रीय पहचान
संवित् शूटिंग संस्था ने दिए नेशनल शूटर
उन्होंने अपनी प्रखर आध्यात्मिक शक्ति और समर्पण से छोटी काशी बीकानेर के साथ साथ राज्य के अनेक क्षेत्रों में धर्म और गीता ज्ञान का व्यापक प्रसार किया है। उन्होंने 1995 में बीकानेर में गीता ज्ञान परीक्षा की शुरुआत की। 25 वर्षों से लगातार आयोजित इस परीक्षा के माध्यम से बीकानेर के हर विद्यार्थी के हाथों में गीता पहुंचाने का लक्ष्य हासिल किया। इस गीता परीक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई । गीता को जन-जन तक पहुंचाया, भगवत गीता के मर्म को समझाया। लाखों विद्यार्थियों को श्रीमद भगवत गीता से जोड़ा। बाद में यह परीक्षा बीकानेर के अलावा आसपास के क्षेत्रों व जिलों में भी होने लगी। 1996 में महारज ने मानव प्रबोधन प्रन्यास का गठन किया। इस प्रन्यास के माध्यम से महाराज की सनिध्धि में 2002 में संवित् शूटिंग संस्थान की स्थापना की। आज देश भर में संवित् शूटिंग संस्थान एक प्रतिष्ठित शूटिंग संस्था मानी जाती है। हर वर्ष इस के शिक्षार्थी राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। संवित् धनुर्विद्या संस्था की स्थापना भी महाराज ने अभी तीन वर्ष पहले ही की थी।
शिवबाडी मंदिर का किया काया कल्प
जब 1994 में महाराज ने शिवबाडी मठ के महंत का दायित्व संभाला था तब यह जर्जर और विरान था। इस स्थान को महाराज ने अथक प्रयास कर आज एक धार्मिक स्थल के रूप में विकसित कर दिया है। सैंकड़ों पेडो़ के माध्यम से इसे हरा भरा कर दिया है। महाराज ने लगभग दो हजार से अधिक वृक्ष मठ के अधीन सभी स्थानों पर विकसित किए हैं।
20 से अधिक पुस्तकों का किया सृजन मिले राष्ट्रीय पुरस्कार
सोमगिरि महाराज ने 20 से अधिक आध्यात्मिक पुस्तकें लिखी। उनकी पुस्तक कालजयी सनातन धर्म को 2005 में स्वामी विष्णु तीर्थ सम्मान से सम्मानित किया गया। इसी तरह से कोलकाता के प्रतिष्ठित विवेकानंद सेवा सम्मान से 2009 में सम्मानित किया गया।
हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार होने के बाद भी अन्य धर्मों में भी थी महाराज की प्रतिष्ठा
हिंदुत्व की आन बान शान सोमगिरि महाराज ने कभी भी अन्य धर्मों की उपेक्षा नहीं की। उनका मानना था कि धर्म हमें मानवता सिखाता है। अतः हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। उन्हें दूसरे धर्म के अनुयायी भी अपने कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते थे और वे प्रसन्नता के साथ वहां जाते।
अंतिम संस्कार का किया फेसबुक लाईव
महाराज के महाप्रयाण की खबर जंगल की आग से भी ज्यादा तीव्रता से फैल गई। उनके अनुयायी लालेश्वर मठ पहुंचने लगे। रात में ही जय नारायण व्यास कॉलोनी थाने की टीम ने थानाधिकारी अरविंद भारद्वाज के नेतृत्व में मंदिर परिसर के लगभग एक किमी की दूरी में बैरिकेड्स लगाकर सारे मार्ग अवरुद्ध कर दिए। मंदिर परिसर में भी पुलिस चाक चौबंद रही। पुलिस के पहरे में ही आने वाले श्रद्धालुओं को एक एक कर दर्शन की छूट इस शर्त पर दी गई कि वे कोविड गाईडलाईंस के मुताबिक दर्शन करेंगे और दर्शन करते ही प्रस्थान कर जाएंगे। हालांकि मठ के प्रबंधन ने रात्रि में ही सुनिश्चित कर लिया था कि अंतिम संस्कार की समस्त क्रियाएं महाराज के आफिशियल फेस बुक पेज पर लाईव की जाए, ताकि महाराज के देश दुनिया के अनुयायी उनके गोलोक गमन प्रक्रिया को देख सकें और उनकी पार्थिव देह के अंतिम दर्शन कर सकें। महाराज के अंतिम संस्कार का लाईव केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल सहित हजारों लोगों ने देखा और आनलाईन श्रद्धांजलि अर्पित की।
महाप्रयाण यात्रा में गूंजा “ॐ नमः शिवाय”
महाराज की महाप्रयाण यात्रा मंदिर परिसर की परिक्रमा के साथ शुरू हुई। सबसे पहले महाराज की पार्थिव देह को लालेश्वर महादेव के दर्शन करवाए गए। फिर लक्ष्मी नारायण मंदिर के समक्ष उनकी महाप्रयाण यात्रा पहुंची। वहां से सीधे मंदिर परिसर के समाधि स्थल पर पहुंची। जहां उन्हें भूसमाधिस्थ किया गया। इस दौरान आस पास के सभी निवासियों ने अपने अपने घरों से ही महाराज के अंतिम दर्शन किए व पुष्प वर्षा की। पूरी यात्रा के दौरान ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव, स्वामी सोमगिरि महाराज अमर रहे, इत्यादि नारों की गूंज होती रही। समस्त रस्मों का निष्पादन कोविड एडवाइजरी की पालना के साथ किया गया।
मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री सहित केंद्र व राज्यों के अनेक मंत्रियों ने बताया अपूरणीय क्षति
महाराज के अंतिम संस्कार के समय भाजपा के शहर अध्यक्ष अखिलेश प्रताप सिंह, शहर महामंत्री मोहन सुराणा, पूर्व शहर अध्यक्ष डॉ सत्यप्रकाश आचार्य, भाजपा नेता अशोक बोबरवाल सहित अनेक राजनैतिक व गणमान्य जन उपस्थित हुए। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘ निशंक’ ऊर्जा मंत्री डॉ बी डी कल्ला, सांसद दीया कुमारी इत्यादि सहित बड़ी संख्या में राजनेताओं ने महाराज के देवलोक गमन को देश के आध्यात्मिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। साथ ही उनके अनुयायियों सहित देशभर के विभिन्न संगठनों की ओर से उनके देवलोकगमन पर दुख व्यक्त किया गया है। देश भर के मंदिरों-मठों व आश्रमों के महंतों-पुजारियों की ओर से भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई है।
अब विमर्शानंद गिरि महाराज होंगे महंत
लालेश्वर मठ का अधिष्ठाता पद सोमगिरि महाराज के विद्वान शिष्य विमर्शानंद गिरि महाराज को प्रदान किया गया है। मठ की परंपरा के अनुसार बीकानेर राज परिवार के सदस्य द्वारा महंत को पदारूढ किया जाता है। बीकानेर पूर्व की विधायक जो कि बीकानेर राजपरिवार की सदस्य भी हैं, ने विमर्शानंद महाराज का तिलकार्चन किया व शाल ओढ़ाकर उन्हें पद पर विभूषित किया।