प्रस्तुति

डॉ. बसन्ती हर्ष
मुख्य सम्पादक
पुष्करणा सन्देश (मासिक पत्रिका)
भारतीय संस्कृति के इतिहास में पर्वों व त्यौहारों का अत्यन्त गौरवपूर्ण स्थान है। इन पर्वों की दृढ़ आधारशिला पर हमारे धर्म तथा संस्कृति का सुन्दर मनोहर विशाल प्रसाद आज तक प्रतिष्ठित है। अपने दिव्य चक्षुओं के बल पर हमारे पूर्वजों ने इन पर्वों की के महत्व को समझा, अपनाया तथा स्थान, जलवायु एवं परिस्थिति विशेष के आधार पर भिन्न – भिन्न त्यौहारों को परम्परागत रूप से आगे बढ़ाया । इससे सामाजिक तथा सांस्कृतिक सुदृढ़ता के साथ सद्भाव व सहयोग की भावना को उन्नत होने का अवसर मिला।
सामाजिक व धार्मिक एकता का परिचायक होली पर्व मौज मस्ती व हास परिहास का प्रतीक है। जिसे सभी आयु वर्ग के लोग जात पात व वर्ग भेद आदि को मिलाकर उत्साह व उल्लास पूर्वक मनाते हैं।
वस्तुतः जिन विभिन्न पर्वों को मनाने सम्बन्धी महत्व को आज के शोधार्थी जानने का प्रयत्न कर रहे हैं उन रहस्यों का खुलासा हमारे मनीषी दूर दृष्टा पूर्वजों ने हजारों साल पहले ही कर दिया था । समस्त विश्व में भिन्न – भिन्न पर्वों व आयोजनों की उपादेयता को समझने के बाद ही इन त्यौहारों को परम्परागत तरीकों से मनाने की प्रथा चिरकाल से प्रारम्भ की गई। सामाजिक सुदृढ़ता तथा मानव मात्र में स्नेह व सहयोग की भावना को विकसित करने के लिए पर्वों से अधिक अच्छा उपाय कोई और हो ही नहीं सकता। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने भिन्न – भिन्न अवसरों के लिए वर्ष पर्यन्त अनेकानेक त्यौहारों का प्रारम्भ किया। इन्ही प्रमुख पर्वों में होली के त्यौहार का नाम उल्लेखनीय है।
माघ मास शुक्ल पक्ष में बसन्त पंचमी के आगमन के साथ ही प्रकृति में सर्वत्र नवीन परिवर्तन होने लगता है । कहीं पतझड़ तो कहीं वृक्षों पर नवीन पत्तों का आगमन प्रकृति को अनूठी मादकता प्रदान करता हैं । शीत ऋतु के प्रकोप की कमी के साथ – साथ ग्रीष्म ऋतु का पदार्पण मानव मन को एक नवीन उत्साह व उल्लास प्रदान करता है। माघ मास की पूर्णिमा के दिन ही होली का डंडा रोप दिया जाता है। तत्पश्चात् फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यन्त आठ दिनों तक होलाष्टक पर्व मनाया जाता है। घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं। ‘कुले – कुले अन्नं क्रियते।’
इसके पश्चात् लकड़ियों व कण्डों आदि को एकत्रित करके ढ़ेर लगाकर उसमें होलिका पूजन करके उसमें अग्नि जलाई जाती हैं।
अगले दिन सुबह परस्पर हास – परिहास, व्यंग्य विनोद तथा नृत्य संगीत आदि विविध कलाओं के मध्य रंग, अबीर व गुलाल आदि लगाकर होली का त्यौहार मनाते हुए वर्ष पर्यन्त की नीरसता को दूर करके स्वस्थ मनोरंजन का वातावरण दिखाई पड़ता है।
इस प्रकार के होली के त्यौहार के प्रमुख रूप से दो पक्ष दृ्ष्टिगत होते हैं –
1. सार्वजनिक रूप से रात्रि में गली मोहल्लों आदि में होलिका दहन
2. तत्पश्चात् दूसरे दिन समाज व मित्रगणों में परस्पर रंग व अबीर के द्वारा उन्मुक्त हास्य व उल्लास की अभिव्यक्ति ‘होलिका दहन’ की पौराणिक कथा के अनुसार यह पर्व हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में आज तक मनाया जाता रहा है। ऐसा माना जाता हैं कि हिरण्यकशिपु को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। उन्होंने अपने पुत्र प्रहलाद को विष्णु की भक्ति से क्रोधित होकर उसे नष्ट करना चाहा। इसके लिए हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन को प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। परन्तु इसमें ईश्वरीय कृपा के कारण प्रह्लाद बच गया परन्तु होलिका जलकर नष्ट हो गई । तब से यह पर्व दैत्यों पर देवो की विजय के प्रतीक के रूप में मनाने की परम्परा अनवरत चली आ रही है।
इस पौराणिक कथा में कितनी सच्चाई हैं यह कहा नहीं जा सकता। लेकिन परवर्त्तीकाल में अनेक विद्वान् अपने षोध कार्य के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि होली या फाग का सार्वजनिक दहन आदिम मानव की आग के प्रति विषिष्ट आभार भावना को प्रतिध्वनित करता हैं । ठिठुरती शीत ऋतु को विदा देने के साथ बसन्त ऋतु का आगम जन मानस को विशेष सुख की अनुभूति कराता है। आर्यों के मूल स्थान पर सर्दी अधिक होने के कारण अग्नि के प्रति उनकी विशेष आदर भावना परिलक्षित होती हैं। सर्दी के अन्त और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के मध्य का यह काल होली पर्व को और भी विषिष्टता प्रदान करता हैं । अतः समस्त विश्व में सामूहिक अग्नि पूजा, आग पर कूदना तथा जलती मषालों का जूलूस निकालना विशेष रूप से प्रचलित हैं । डॉक्टर वेस्टर मार्क आदि विद्वानों के अनुसार – आदिम या वन्य मानव की अग्नि की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोज रही है। अग्नि जहॉं एक ओर वन के हिंसक पशुओं तथा शीत से समस्त प्राणी जगत् की रक्षा करती रही हैं वहीं अग्नि पूजा तथा यज्ञों के अनुष्ठान आदि के द्वारा महामारी, अतिवृष्टि आदि प्रकोपों का नाश करके मानव की रक्षा करती रही हैं। इस दृ्ष्टि से अग्नि की महत्ता तथा उसके कारण अग्नि पूजा सर्वत्र प्रचलित रही है। हिमाचल प्रदेश में शीत प्रधानता के कारण विजयदशमी के दिन मकानों के आन्तरिक कक्षों में जमीन में खोदी गई अंगीठियों में विशेष पूजा अर्चना के बाद अग्नि स्थापना की जाती है। होली वाले दिन उसी अंगीठी को अग्नि को खुले में होली दहन व पूजा के साथ मुक्त कर दिया जाता हैं ।
होलिका दहन में सुरक्षा व प्रजनन वृद्धि के साथ – साथ परवर्त्ती काल में यदि आभार प्रदर्शन की यह परम्परा जुड़ गई हो तो कोई आश्चर्य नहीं (राजस्थान भारती, सितम्बर 1972, अंक 14)। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि आर्यों के यूरोपीय वर्ग में भी बसन्त उत्सव, अग्नि मान्यता तथा अग्नि पूजा का प्रचलन मिलता है। इस प्रकार से होलिका दहन पर्व के द्वारा हानिकारक शक्तियों का शमन करके समस्त प्राणियों की उर्वरता वृद्धि का प्रयोजन सिद्ध होता है।
द्वितीय पक्ष के अन्तर्गत रंग व गुलाल से होली खेलने की चर्चा की जा रही है। होली, होलिका फाल्गुणी अथवा फाग को मघ, उर्वरत्व तथा प्रजनन के साथ भी जोड़ा जाता है। ‘एन साइक्लोपीडिया ऑव इण्डिया एण्ड ऑव ईस्टर्न एण्ड साउथ ईस्टर्न एशिया भाग – 2’ में होली के विषय में कहा गया है – यह त्यौहार कृष्ण के सम्मान में मनाया जाता है। लाल जल तथा गुलाल हर गुजरते व्यक्ति पर डाले जाते हैं और कामुकतापूर्ण तथा उत्तेजक गाने गाए जाते हैं। कृष्ण उन्मुक्त प्रणय के देवता हैं तथा कामुकतापूर्ण गीतों का उल्लेख होली की श्रृंगारी प्रकृति को पुष्ट करता हैं। कामशास्त्र के महान् मनीषी वात्स्यायन इसे ‘सुवसन्तक‘ नाम देते हैं। महाकवि कालिदास, महान नाटककार श्री हर्ष तथा महाकवि भास आदि अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में उल्लासमय होली का उल्लेख किया हैं। वस्तुतः समग्र भारतीय साहित्य में होली के त्यौहार के रूप में उल्लेख अवश्य हुआ है, परन्तु उनमें वसन्तागमन के साथ – साथ काम भावना का तीव्र उद्रेक प्रकट किया गया है। बसन्त द्वारा अपनी छटा फैलाने पर जड़ प्रकृति तथा चेतन प्राणियों में चांचल्य के उद्रेक का मनोहारी वर्णन मिलता है। यहाँ तक कि तपस्वियों को भी कठिनाई से हृदय में जाग्रत विकारों को रोकना पड़ता है। (सीताराम चतुर्वेदी – सम्पादक कालिदास ग्रन्थावली पृष्ठ से 253 – 255)
इसमें कोई सन्देह नहीं कि होली पर्व कुछ अशोभनीय तत्वों के उपरान्त भी विश्व के यह कुछ श्रेष्ठ त्यौहारों में से एक हैं। होली परिवार व समाज के लोगों के परस्पर मिलना, मित्रता व संगठन का पर्व है। आज के युग में संयुक्त परिवारों के जीर्ण – शीर्ण होने की अवस्था में इस पर्व का विशेष महत्व हैं, क्योंकि एकाकी परिवारों को पुनः जोड़ने में इसकी उपादेयता निष्चित रूप से बन पड़ी है। इससे एकता, सद्भावना व भाईचारे में वृद्धि होगी। यही नहीं, होली की उल्लासमय उच्छृंखलता अथवा पागलपन, तथा हुड़दंग व अनौपचारिकता कुछ समय के लिएा मानव को ऊंच – नीच, जात – पांत, सेवक – स्वामी का भेदभाव भुलाकर एक समान धरातल पर खड़ा कर देते हैं।
परन्तु खेद का विषय है कि इस उल्लासपूर्ण त्यौहार में शनैः – शनैः कुछ विकृत मानसिकता वाले व्यक्तियों के कारण बुराइयां घर करने लगी हैं। कुछ लोग इस अवसर पर अबीर गुलाल के स्थान पर गोबर, मिट्टी, कीचड़, मूत्र तथा तेजाब आदि डालकर इस पर्व के पावन रंग में भंग कर देते हैं, जिससे मित्रता हमेशा के लिए शत्रुता में परिवर्तित हो जाती है। अश्लील व भद्दे मजाक एक दूसरे के हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः हमें इन सबका अवश्य त्याग करना चाहिए।
बदलते परिवेश में हालांकि होली पर्व में अनेक विकृतियां व अभद्रताएं व्याप्त होने लगी हैं। अतः अनेक जन इस त्यौहार को मनाने से कतराने लगे हैं । कहीं – कहीं होली शब्द उल्लास आनन्दमय भाव के स्थान पर उच्छृंखलता व अश्लीलता का पर्याय बनने लगा है। परन्तु यदि शालीनता पूर्वक होली का त्यौहार मनाया जाये तो इसके महत्व को समझा जा सकता है। वस्तुतः होली सदृश पर्व के अन्तर्गत अबीर गुलाल द्वारा किए गये खेल – तमाशों में चंचल चित्त को स्थिरता प्राप्त होती है क्योंकि इन वस्तुओं से एक विशेष प्रकार के आनन्द का संचार होता है। ‘क्रीडायां रमते चितम्’ अर्थात् क्रीड़ा में चित्त रमता है। रमते का तात्पर्य लक्ष्य स्थिरीकरण की ओर भी इंगित करता है।
चूंकि गत वर्ष में कोविड 19 ने हमें निश्चित दूरी बनाते हुए इन त्यौहारों को मिलजुल कर मनाने में भी सर्तकता बरतने का सन्देश दिया है। अतः इस बार इस पर्व को पिछले साल के कई पर्वों की तरह ही अलग – थलग रहते हुए अत्यन्त संक्षेप में ही मनाने की सलाह दी जायेगी। स्वास्थ्य की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए आइये हम सभी आनन्दमय होली पर गले न मिलते हुए भी हृदय से एक दूसरे के निकट रहते हुए मेलजोल की भावना को विस्तारित करें।
