गुरू पूर्णिमा के आगमन के साथ ही प्रकृति में नवीन परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं । ग्रीष्म ऋतु के प्रकोप की कमी के साथ-साथ बरसात की ठण्डी फुहारें मानव मन को असीम आनन्द प्रदान करती हैं। इसकी अभिव्यक्ति प्रायः पिकनिक, गोठ तथा कोई व्रत या उत्सव को सामूहिक रूप से मनाकर की जाती है । दैनन्दिन नीरस वश्रम साध्य कार्यो में इन पर्वो से नवजीवन का संचार होता है । लगभग सभी त्यौहारों में गायन-वादन अथवा हर्षोल्लास के द्वारा मनोविनोद किया जाता है। जो मानव जीवन को संजीदगी व संजीवनी देते हैं । राजस्थान में इन त्यौहारों का इसलिए भी महत्व है कि इन अवसरों पर राजा महाराजा प्रजाजनों के सम्पर्क में आकर उन्हें पूर्ण सहयोग दिया करते थे। महिलाओं व कन्याओं के द्वारा किया जाने वाला उपवास ‘तीज‘ भी यहां के प्रमुख पर्वो में से एक है। यहॉं पर श्रावण शुक्ला तृतीया को ‘हरियाली तीज‘ तथा भाद्रप्रद कृष्णा तृतीया को ‘कजली तीज’ अथवा ‘सत्तू तीज‘ के नाम से जाना जाता है । इन्हें क्रमशः ‘छोटी तीज’ व ‘बड़ी तीज‘ के नाम से भी यहॉं पहचाना जाता है।
यह पर्व वस्तुतः कन्याओं व सुहागिनों के लिए उपवास के रूप में होता है, जिसमें क्रमशः सुयोग्य वर की प्राप्ति तथा पति के स्वस्थ व दीर्घायु होने की मंगल कामना निहित होती है । कुमारियां तथा महिलाएं अपने हाथों व पैरों को मेहन्दी मान्डणा से अलंकृत करती हैं। स्त्रियां व कन्याएं नये वस्त्र धारण करती हैं तथा एक दिन पूर्व घरों में विविध पकवान बनाये जाते हैं । कई स्थानों पर माता-पिता अपनी पुत्रियों के ससुराल में सिंजारा (श्रृंगार) वस्त्र आदि भेंट स्वरूप भेजते हैं। अगले दिन तीज का व्रत रखा जाता है।
‘तीज’ के त्यौहार के सुअवसर पर अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। इन मेलों में ऊंटों व घोड़ों की दौड़ विशेष रूप से दर्शनीय होती है। वस्तुतः यह प्राकृतिक त्यौहार है। ज्येष्ठ व आषाढ़ की -झुलसाने वाली गर्मी के बाद सावन-भादो की बरसात एक सुखद अनुभूति प्रदान करती है। बरसात के बाद सर्वत्र हरियाली छाई रहती है। कहीं मयूर का मनमोहक नृत्य तथा कूजन तो कहीं कोयल की कुहू-कुहू का मधुर संगीत, साथ ही झूलों की व्यापकता त्यौहार के अनुष्ठान के लिए अत्यन्त सुरम्य वातावरण उपस्थित कर देती है । यह त्यौहार किसानों के खेतों की बुवाई से भी सम्बन्धित है । ‘मेह बाबा आया है और सिट्टी फल लाया है’। इस आनन्दातिरेक को विविध स्थानों पर विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जाता है । प्राचीन लोकगीतों में इन अवसरो हेतु जहॉं एक ओर भाई-बहन का अटूट स्नेह राखी आदि के रूप में प्रतिध्वनित होता है, वहीं मेघों की व्यापक वर्षा परदेश गए हुए पति की वियोगिनी की विरह व्यथा को भी इंगित करता है।
‘कुरजां ए म्हारो भंवर मिला द्यो ए’
‘कजली तीज’ नामक सांस्कृतिक पर्व को मनाने के पीछे लोक कथाओं तथा पुराणों में परम्परागत रूप से एक कहानी कही जाती है जिसके अनुसार ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापिता द्वारा आयोजित यज्ञ में उनकी साठ पुत्रियो में से एक पुत्री सती तथा उनके पतिदेव भगवान महादेव को छोड़कर शेष सभी लोगों तथा देवताओं को दूर-दूर से आमन्त्रित किया गया। सती बिना बुलाये ही अपने पिता के घर होने वाले आयोजन में सम्मिलित होने चली गई परन्तु वहॉं उसका कोई आदर-सत्कार नहीं किया गया। सती अपने व अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर सकी व क्रोध के वशीभूत होकर वहीं यज्ञ कुण्ड में अपनी देह को स्वाहा कर दिया । जब महादेव जी को इस घटना की जानकारी मिली तब उन्होंने अपनी जटा पटक कर वीरभद्र नामक पुरूष को उत्पन्न किया जिसने दक्ष प्रजापति सहित अनेक देवताओं का विध्वंस कर डाला। तत्पश्चात महादेव जी यज्ञ कुण्ड के पास आये जिसमें सती ने अपनी देह को भस्मीभूत किया था। उस कुण्ड में से चार देवियां उत्पन्न हुई। एक मुख से जो ज्वालामुखी हुई, उसका स्थान उत्तर में स्थापित किया गया। दूसरी कामाख्या देवी हुई, उसकी स्थापना पूर्व में कामरू देष में हुई, तीसरी देवी तुलता देवी हुई, जिसकी पश्चिम में स्थापना हुई । उस दिन महादेवजी कहते हैं कि यह भाद्रप्रद की कृष्णा तीज का दिन है इसलिए इस तीज का नाम ‘काजली तीज‘ है, जो स्त्रियां यह व्रत करेंगी वे सौभाग्यवाली होंगी, रूपवती होंगी, लक्ष्मीवती होंगी तथा बेटे, पोते व पड़पौत्र देखेंगी। अपने कुटुम्ब का बहुत सुख लाभ करेंगी।
तब से लेकर आज तक इस सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करते हुए स्त्री समुदाय (विशेष रूप से राजस्थान में) बहुत महत्व देकर भाद्रप्रद कृष्णा तीज को कजली तीज का व्रत करती है। पूरे दिन उपवास रखने के बाद संध्या काल के पष्चात् ‘कजली माता’ की पूजा की जाती है तथा चन्द्र दर्शन के बाद सत्तू व फलाहार द्वारा व्रत खोला जाता है। यदि हम प्राचीनकाल के भारत के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो हमें ज्ञात होगा कि अनादिकाल से भारतीय संस्कृति की मौलिक परम्परा के अनुसार शक्ति की उपासना की जाती रही है। यहॉं जगत् नियन्ता परमात्मा की पिता के रूप में तथा देवी भगवती की आराधना माता के रूप में की जाती हैं । वैदिक संस्कृति में भी देवी की व्यापकता व सर्वशक्तिमत्ता बताई गई है । वह विविध रूप धारिणी है। मूल रूप से ब्राह्मी शक्ति ही है जिसके अन्तर्गत सभी नाम व रूप एकीकृत हो जाते हैं।
हमारे पूर्वजों ने मातृशक्ति के रूप में इन देवियों की पूजा-अर्चना को महत्व दिया। जिससे मनुष्य अपनी तामसिक प्रवृत्तियों को त्यागकर ईश्वरीय सत् शक्ति धीरे-धीरे आत्मसात् कर सके। अध्यात्म विज्ञान का यही मुख्य प्रयोजन है। इस प्रकार ‘कजली माता’ की पूजा और साधना भी कन्याओं और महिलाओं के लिए आध्यात्मिक कायाकल्प की एक वैज्ञानिक प्रणाली है । इस प्रकार की सामर्थ्य शक्तियों को प्राप्त करने से घर में ऋद्धि सिद्धि का चिरन्तन काल तक वास रहेगा। इसमें कोई अत्युक्ति नहीं है। इस व्रत के अनुष्ठान से जन मानस सामूहिक रूप से एक सूत्रता में आकद्ध होकर सामाजिक उन्नति में सहायक होते हैं। मानव समाज की चहुंमुखी उन्नति हेतु यह आवश्यक है कि इस प्रकार की आध्यात्मिक भावनाओं रूपी दिव्य तत्वों को हम आत्मसात् करें। तभी धर्म, अर्थ, कर्म तथा भक्ति की मन्दाकिनी अजस्त्र रूप से प्रवाहित होकर हम सबको पुनीत कार्यो में लगाकर देश के विकास में सहयोगी बना सकेगी।
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