विभाग के अधिकारियों की धमकी : शिविरा पत्रिका का सालाना शुल्क जमा कराने पर ही वार्षिक परीक्षा के पेपर्स मिलेंगे
गिरिराज खैरीवाल
सरकारों द्वारा गैर सरकारी स्कूल्स के साथ शुरू हुआ सौतेला व्यवहार, भेदभाव और पक्षपात न केवल अभी भी जारी है अपितु इसमें दिनों दिन बढोत्तरी ही हो रही है। एक और भेदभाव पूर्ण आदेश शिक्षा विभाग द्वारा जारी किया गया है। शिक्षा विभाग की मासिक पत्रिका शिविरा की मेंबरशिप अनिवार्य करने हेतु निदेशालय द्वारा जारी इस आदेश में गैर सरकारी स्कूल्स के साथ भेदभाव का परिचय स्पष्ट रूप से दिख रहा है। इस आदेश में शिविरा के लिए सालाना शुल्क की दरों को सरकारी और गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं के लिए अलग अलग तय किया गया है। सरकारी शिक्षण संस्थाओं हेतु यह शुल्क 200/- सालाना निर्धारित किया गया है जबकि गैर सरकारी स्कूल्स के लिए इसे 300/- वार्षिक तय किए जाने के निर्देश जारी किए गए हैं। जारी आदेश की अनुपालना में अनेक जिला शिक्षा अधिकारियों और जिला समान परीक्षा योजना के संयोजकों ने अपने अपने तरीके से शिविरा पत्रिका के शुल्क जमा कराने हेतु पाबंद करने के निर्देश दिए हैं। इन निर्देशों के बाद वितरण केंद्र प्रभारियों द्वारा शिविरा के सदस्य नहीं बनने पर वार्षिक परीक्षा के पेपर्स नहीं दिए जाने की धमकी दी जा रही है। हालांकि कुछ वितरण प्रभारियों का कहना है कि वे तो एक माध्यम है, जैसा उन्हें कहा गया है, केवल उसकी पालना कर रहे हैं।
सरकारी को सभी पेपर्स एक साथ जबकि गैर सरकारी को परीक्षा शुरू होने से आधे घंटे पहले ही दिए जाते हैं
इस भेदभाव की शुरुआत जिला समान परीक्षा योजना के अंतर्गत अर्द्ध वार्षिक और वार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्रों के वितरण के साथ हुई। सरकारी शिक्षण संस्थाओं को सभी परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा शुरू होने से एक दो दिन पहले ही दे दिए जाते हैं जबकि प्राईवेट स्कूल्स को ये परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा कार्यक्रम के अनुसार प्रति परीक्षा दिवस परीक्षा शुरू होने से 30 मिनिट पहले ही दिए जाते हैं। वर्षों से ये पक्षपातरूपी गैर वाजिब प्रक्रिया चल रही है लेकिन सभी मौन रहकर इस अवांछित प्रक्रिया को सपोर्ट कर रहे हैं।
मेधावी स्टूडेंट्स हेतु पुरस्कारों में भी भेदभाव
प्राईवेट स्कूल्स के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त सरकार ने वहां अध्ययन करने वाले बच्चों के साथ भेदभाव करते हुए मेधावी स्टूडेंट्स को दिए जाने वाले पारितोषिक को केवल सरकारी शिक्षण संस्थाओं के स्टूडेंट्स तक सीमित कर दिया। पूर्व में दसवीं और बारहवीं में अव्वल आने वाले स्टूडेंट्स को लेपटोप और स्कूटी इत्यादि से सम्मानित किया जाता था। नियमानुसार चयनित होने वाले स्टूडेंट्स की सूचियों में लगभग नब्बे पिच्यानवे फीसदी स्टूडेंट्स प्राईवेट स्कूल्स के होते थे। इस कारण सरकार ने ये पुरस्कार केवल सरकारी शिक्षण संस्थाओं के स्टूडेंट्स के लिए ही लागू कर दिए।
मैरिट को किया बंद
गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं के सुव्यवस्थित मैनेजमेंट, अपेक्षाकृत कम व सीमित संसाधनों तथा अनथक मेहनत के कारण माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान, अजमेर की मैरिट में गैर सरकारी स्कूल्स के स्टूडेंट्स का बोलबाला रहता था। सरकार ने अपनी स्कूल्स में शैक्षिक सुधार व गुणवत्तापूर्ण अध्ययन अध्यापन के प्रयास करने की बजाय मैरिट पर ही प्रतिबंध लगाते हुए खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को साबित कर दिया। हालांकि सरकार ने इसकी वजह बताई कि मैरिट के कारण स्टूडेंट्स में हीन भावना उत्पन्न हो रही है, वे तनाव में जा रहे हैं, इसलिए मैरिट बंद कर दी गई। जबकि इसकी असली वजह प्राईवेट स्कूल्स के स्टूडेंट्स द्वारा मैरिट के लगभग सभी स्थानों को हासिल करने के कारण सरकारी शिक्षण संस्थाओं की लगातार खराब होती जा रही छवि थी।
गैर सरकारी से शुल्क जबकि सरकारी फ्री
पांचवी बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले प्राईवेट स्कूल्स से शुल्क की वसूली की जाती है लेकिन सरकारी शिक्षण संस्थाओं से इस संबंध में कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। गौरतलब तो यह तथ्य है कि आरटीई के नियमों के अनुसार ये परीक्षा आयोजित करना ही गलत है। लेकिन सरकार अपनी जिद्द पर अडिग है और ये अनुचित परीक्षा आयोजित करती जा रही है। इस पक्षपात के विरोध के कारण अनेक शिक्षण संस्थाओं ने पांचवी बोर्ड की परीक्षा फीस के नाम पर लिए जाने वाले सहयोग शुल्क को जमा नहीं कराया है, ऐसे में शिक्षा विभाग शुल्क जमा नहीं कराने वाले स्कूल्स के पांचवी बोर्ड के परिणाम को रोकने की तैयारी कर रहा है। जबकि यही शिक्षा विभाग प्राईवेट स्कूल्स के बच्चों की फीस ड्यू होने पर कहता है कि बच्चों की टी सी या परीक्षा परिणाम नहीं रोका जा सकता है।
सरकारी स्कूलों में प्री प्राईमरी मान्य जबकि प्राईवेट में अमान्य
प्राईवेट स्कूल्स को टक्कर देने के लिए राज्य में अनेक सरकारी स्कूल्स को अंग्रेजी माध्यम में बदल दिया गया है। इन स्कूलों में सत्र 2022 – 23 से प्री प्राईमरी क्लासेज भी शुरू किए जाने की घोषणा हो चुकी है और तैयारियां परवाना पर है। जबकि राज्य सरकार ने सत्र 2020-21 से प्राईवेट स्कूल्स में प्री प्राईमरी क्लासेज को अमान्य करते हुए आरटीई के अंतर्गत प्रवेश के लिए पहली कक्षा लागू कर दी। इस संबंध में लगी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने विभाग से पुरानी व्यवस्था लागू करने के लिए अंतरिम आदेश दिया लेकिन विभाग ने इस अंतरिम आदेश के विरुद्ध अपील कर दी है।
जर्जर व अपर्याप्त भवनों में चल रहे हैं सरकारी स्कूल जबकि प्राईवेट स्कूलों के लिए दुष्कर नियमों की भरमार
सरकारी शिक्षण संस्थाओं के लिए भवन संबंधित कोई मानदंड या मापदंड नहीं है लेकिन प्राईवेट स्कूल्स के लिए बहुत ही कठिन और दुष्कर नियम लागू कर दिए गए हैं। सरकारी स्कूल सीधे आठवीं से 12 वीं तक केवल कक्षावार विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर क्रमोन्नत हो सकती है, भले ही अन्य संसाधनों की कोई उपयुक्त व्यवस्था ही नहीं हो लेकिन एक पांचवीं तक का प्राईवेट स्कूल शुरू करने के लिए भूमि रूपांतरण, कमरों की संख्या और न्यूनतम साईज, न्यूनतम भूखण्ड साईज, रजिस्टर्ड किरायानामा इत्यादि कठिन नियमों व शर्तों की पालना अनिवार्य है।
वाक्पीठ संगोष्ठियों में भी होता है पक्षपात
वर्ष में दो बार वाक्पीठ संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। पहली वाक्पीठ सत्रारंभ तथा दूसरी वाक्पीठ सत्रांत वाक्पीठ कहलाती है। इन वाक्पीठों में शैक्षिक गुणवत्ता और नए नियमों के संबंध में ट्रेनिंग या सेमीनार होते हैं लेकिन प्राईवेट स्कूल्स के संबंध में यहां कोई चर्चा नहीं होती अपितु कई बार प्राईवेट स्कूल्स से मुकाबला किए जाने की बातें होती हैं। जबकि अनेक वाक्पीठों का आयोजन प्राईवेट स्कूलों द्वारा किया जा चुका है और कई वाक्पीठों में प्राईवेट स्कूल्स सहयोगी भी रहते हैं। साथ ही इन वाक्पीठों का निर्धारित शुल्क प्राईवेट स्कूल्स द्वारा भी दिया जाता रहा है, किसी समय में तो परीक्षा परिणाम की जांच ही इन संगोष्ठियों के संभागित्व शुल्क की रशीद दिखाने के बाद ही की जाती थी लेकिन अब में स्थितियां बदली हैं और इस शुल्क को कई जिलों में लगभग स्कूल्स ने देना बंद कर दिया है।
एकजुटता ही सरकारी तानाशाही से लोहा ले सकती है
प्राईवेट स्कूल्स के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार व भेदभाव पूर्ण नीतियों का गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं के संचालकों द्वारा विरोध भी किया जाता है लेकिन विभिन्न गुटों में बिखरे हुए संगठनों की जाजम पर आने से आम स्कूल संचालक कतराने लगे हैं। इस वजह से एकता की ताकत का प्रदर्शन संभव नहीं हो पा रहा है और प्राईवेट स्कूल्स सरकार की मनमर्जी, मनमानी और उपेक्षा का शिकार होते जा रहे हैं। सरकारी हिटलरशाही हावी हो चुकी है जबकि प्राईवेट स्कूल्स के विभिन्न संगठन एक दूसरे की टांग खिंचाई में मशगूल हैं। इसके अलावा कई संगठन झूठे सच्चे श्रेय लेकर अपने कुटुंब को जोड़ने की फिराक में ही रहते हैं। आम स्कूल संचालक का भरोसा दिनों दिन संगठनों से उठता जा रहा है और यही मूल वजह है कि किसी भी संगठन के आंदोलन में आम स्कूल संचालक जाने से बचने लगे हैं। हालांकि प्राईवेट स्कूल्स के संचालकों का कहना है कि सरकार की हिटलरशाही और दमनकारी नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष का बिगुल बजाने का वक्त आ गया है। इसलिए गैर सरकारी शिक्षण संस्थाओं के विभिन्न संगठनों को गंभीरता के साथ प्राईवेट स्कूल्स के प्रति हो रहे सरकारी दमन के विरुद्ध एक स्वर में संघर्ष की ताल ठोकनी चाहिए ताकि सरकार की दमनकारी नीति, तानाशाही और हिटलरशाही पर अंकुश लग सके।
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