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पुस्तक समीक्षा

समीक्षक:  नीलम पारीक

प्रभा पारीक जी का जन्म 1957 में जयपुर में हुआ। उनकी शिक्षा महारानी स्कूल एवम् कॉलेज में हुई। इनकी अलग-अलग विधाओं में अब तक लगभग पैतीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें हिन्दी, राजस्थानी एवम् गुजराती में लिखा बाल साहित्य, काव्य-संग्रह एवम् पौराणिक आख्यानों को विषय बनाकर लिखे कुछ उपन्यास शामिल हैं।

उपन्यास, “दशग्रीव”, भी प्रभा पारीक जी का लिखा एक ऐसा ही उपन्यास है जो पौराणिक पात्र दशग्रीव को केन्द्र में लेकर लिखा गया है। “दशग्रीव”, यानी दशानन, रावण, लंकेश आदि न जाने कितने नामों से जाना जाने वाला यह पात्र, “रामायण”, नामक आख्यान, जिसे जाने कितने नामों और कितनी भाषाओं में जाने कितने विद्वानों द्वारा अनवरत लिखा ही जा रहा है, जिसका केन्द्र पात्र हैं “श्री राम” जिन्हें साक्षात् विष्णु का अवतार, स्वयं ईश्वर ही माना जाता रहा है, राम कथा से लिया गया एक ऐसा पात्र है जिसके लिए कहा जा सकता है कि रावण है तभी राम है।

“हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता” और इन अनन्त कथाओं के अनन्त पात्र, इन पात्रों के विस्तृत चरित्र चित्रण और इन चरित्रों को लेकर यदि कोई लेखक लिखने बैठे तो ग्रन्थ के ग्रन्थ लिख डाले। लेकिन यह लेखन मार्ग जितना सुगम दृष्टि गोचर होता है, उतना है नहीं। अनन्त काल से लिखे जा रहे आख्यानों में से खोज-खोज कर सर्वाधिक प्रमाणित दृष्टांत लेकर, उनका संयोजन कर तब कहीं जाकर किसी एक पात्र का वर्णन किया जाना सम्भव होता है। और ऐसे में भी पात्र यदि दशानन, लंकेश राजाधिराज रावण हो तो यह किसी चुनौती से कम तो हो ही नहीं सकता। भारतीय जनमानस के हृदय में अंकित रामायण के मुख्य पात्र श्रीराम ने भी जिसकी, “शत्रु हो तो रावण जैसा”, कहकर प्रशंसा की हो उस परम शिवभक्त, अतुल बलशाली, विद्वान “दशग्रीव” को केन्द्र में रखकर एक उपन्यास की रचना करने का साहस पौराणिक पात्रों पर उपन्यास लेखन में सिद्धहस्त लेखिका प्रभा पारीक जी ने किया है और इस चुनौती को न केवल स्वीकार किया अपितु इसमें वे खरी भी उतरी हैं।

भगवान राम को केंद्र में लेकर लिखना जितना सरल है, रावण को मुख्य पात्र बनाकर चलना उतना ही कठिन कार्य है। प्रभा पारीक जी ने इसके लिये बाकायदा रिसर्च की है। उन्होंने उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक लिखी है अनेकों राम कथाओं यथा वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, कम्ब रामायण, आनन्द रामायण, अध्यात्म रामायण, शिव पुराण आदि दस ग्रंथों के साथ साथ वर्तमान काल के आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित, “वयं रक्षाम:”, जिसमें राक्षस राज रावण रक्ष धर्म का विश्लेषण करते है कि, “हम रक्षा करते हैं”, से भी प्रमाणों के साथ अपने पात्र का वर्णन किया है। उपन्यास में रावण के जन्म से लेकर उसके जीवन पर्यंत के प्रमुख घटनाक्रमों को अलग-अलग पुस्तकों के प्रमाण के आधार पर वर्णित किया गया है। रावण की वीरता, भक्ति, ज्ञान-विज्ञान की प्रकांडता, कला प्रेम, अपने परिवार और समाज से न केवल प्रेम बल्कि उसकी रक्षा के लिए वचनबद्धता आदि गुणों का वर्णन साक्ष्यों के आधार पर किया गया है। “दशग्रीव”, रामायण की पुनर्कथा नहीं, ये रावण के चरित्र का विश्लेषण है। लेखिका का मानना है कि राम कथा रावण के बिना अधूरी है अतः उन्होंने रावण को कथा के नायक के रूप में चुना है।

रावण को लेकर एक संपूर्ण कथानक का बुनना निरुद्धेश्य तो कदापि नहीं हो सकता। वर्तमान में जब रावण का चरित्र एक विशेष चर्चा का विषय हो गया है, जब लोग वर्तमान के नायकों की तुलना राम से न करके रावण से अधिक करने में गौरव का अनुभव कर रहे हैं ऐसे समय में प्रभा पारीक जी ने रावण के चरित्र का निष्पक्षता से वर्णन किया है। रावण के गुण-दोष, ज्ञान, भक्ति और अहंकार को एक साथ यथा तथ्य रख दिया है। अब यह पाठक पर है कि वह रावण के किस पक्ष को किस तरह से देखता है। लेखिका ने इसमें कहीं भी न्यायाधीश की भूमिका का निर्वाहन नहीं किया है। रावण के चरित्र को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। यहाँ वह सिर्फ़ राक्षस नहीं, बल्कि प्रकांड विद्वान, चारों वेदों का ज्ञाता, शिवभक्त, संगीतज्ञ, आयुर्वेदाचार्य एवम् कुशल शासक बताया गया है। स्वयं राम भी कहते हैं कि, “शत्रु हो तो रावण जैसा।” रावण की तीन अधूरी इच्छाएं – सोने में सुगंध, समुद्र का जल मीठा और लहू का रंग सफ़ेद कर पाना। इन इच्छाओं को वह पूरा कर सकता था लेकिन उसके अहंकार ने उसे सही का चुनाव करने ही नहीं दिया। रावण ने कई पुस्तकों का लेखन किया, शिव तांडव स्तोत्र भी रावण द्वारा ही रचित है। गुणों का भंडार होते हुए भी रावण का अहंकार उसे परिवार सहित ले डूबा। लेखिका ने यहां भी निर्णायक की भूमिका से परहेज करते हुए इसे नियति का चक्र बताया जिससे राम और रावण दोनों बंधे थे। “हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ।”

उपन्यास की भाषा बड़ी सहज, सरल एवम् रोचक है। स्थान- स्थान पर अलग अलग ग्रंथों से ली गई पंक्तियाँ लेखन की शोभा बढ़ा रही है। उपन्यास की शैली वर्णनात्मक शैली है। इसमें रावण के जन्म से मृत्यु तक के घटनाक्रम को साक्ष्य के साथ प्रस्तुत किया गया है जो इसे एक पौराणिक उपन्यास से एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में पाठकों को समर्पित करता है। डॉ. मंजुला सक्सेना एवम् डॉ. सूरजसिंह नेगी जी ने भी भूमिका में कहा है कि ये रचना शोधकर्ताओं के लिए नए आयाम प्रस्तुत करती है। दस ग्रंथों से तथ्य जुटा कर लिखना किसी तपस्या से कम नहीं आंका जा सकता। इतने शोध के उपरांत लिखा गया यह ग्रन्थ साहित्य एवम् इतिहास दोनों के छात्रों के लिए उपयोगी रहने वाला है।

और अब शीघ्र ही यह पुस्तक पाठकों तक पहुँचे एवम् वे स्वयं इस साहित्यिक आलेखन, पौराणिक कथानक और ऐतिहासिक दस्तावेज़ से रूबरू होकर एक कैनवास से भी अधिक बड़े पात्र को अपने दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें। शुभमस्तु!

पुस्तक प्राप्ति का स्थान: साहित्यगार जयपुर, अमेजन, फ्लिप कार्ट

पुस्तक की कीमत:   250 रुपए