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समसामयिक आलेख

मोहनलाल जाँगिड़, बीकानेर

काले काले रूई के ढ़ेर से उड़ते दौड़ते बादल बच्चों के क्या बड़ों के मन-मष्तिष्क पर छा जाते हैं। काले सघन बादल पानी से भरे हुए होते हैं जो कहीं से पानी लाकर कहीं ले जाकर बरसते हैं। हम इन बादलों से कितने उपकृत होते हैं, मनन की बात है। बादल न होते तो बरसात नहीं होती। बादल इधर से उधर उड़ते दौड़ते नहीं तो वर्षा के पानी से वंचित रह जाते। पानी नहीं बरसता तो जगह जगह पत्थर और बंजर भूमि दिखती। न पेड़-पौधे होते न ही हरियाली होती। पेड़-पौधे, वन आदि नहीं होते तो जीव-जंतुओं का अस्तित्व भी नहीं होता और न ही हमें प्राणवायु ऑक्सीजन उत्पादित होकर मिल पाती। ओह! बादल केवल निर्जीव दिखते हैं पर जीवन की डोर के महत्वपूर्ण तंतु इन्हीं के हाथ में हैं।

बारिश! बारिश! जलमग्न खेत देख कर किसान का मन कितना हर्षित होता है। भीषण गर्मियों के समापन पर बारिश का इंतज़ार करता किसान बादलों के समूहों को ताक ताककर इनको बरसने का न्यौता देता रहता है। आखिर वर्षा के देव, इंद्रदेव प्रसन्न होकर बादलों को बरसने का हुक्म देते हैं तब बारिश की रिमझिम फुहारें तन-मन, पेड़-पौधों आदि को सरोबार करती हैं। किसानों द्वारा बोई गई फसलें इसी वृष्टि से मुस्कान भर लहलहाने लगती हैं। लगता है कि सृष्टि, प्रकृति, वृष्टि और जीवन सभी एकाकार हो गए हैं।

पानी से गदराये काले काले मेघों को देख देख मोर पिहुं पिहुं के समवेत स्वरों में गान कर वर्षा को बुलाते अनुभव होते हैं। कहते हैं कि चातक पक्षी चिर प्रतीक्षित स्वाति नक्षत्र की वर्षा के बूंद का इंतजार करता रहता है। हाल यही विरहिणियों का होता है। परदेश कमाने हेतु गये अपने पति का इंतज़ार करती यह स्त्री, मेघों के गर्जन, रिमझिम बरसा आदि से और भी अधिक विचलित व भयभीत होकर अपने परदेशी पति का दिन-रात आगमन का इंतज़ार करती है। इस बाबत राहें तकती रहती हैं। इसे भरोसा है कि वह इस ऋतु में परदेश से अवश्य लौटेगा। हालांकि महानगरीय संस्कृति प्रकृति से अति दूर हो गई है। इन्हें न तो मेघों के आगमन का भान हैं और ही रिमझिम बरसात की आवश्यकता। अक्सर दोनों एक साथ विपरीत दिशाओं में रोजगार हेतु बारह मास दौड़ते-भागते दम्पती के मन-मष्तिष्क में, कहां परदेशी कहां अब प्रेयसी, और कहाँ बरसात ऋतु आगमन का आनंद?

प्यारे प्यारे बादल! कई बार मेघ जल भर भर कर धरा पर इतना जल उड़ेल देते हैं कि धरा जलमग्न हो जाती है। त्राहि-त्राहि करते जन-जीवों का जीवन ही खतरे में पड़ जाता है। बाढ़ से त्रस्त लोग मेघों से निवेदन करते हैं कि अब बस करो! कहीं कहीं बादल फटकर रौद्र रूप दिखाते हैं। पहाड़ों के अति दोहन, वन-उपवनों आदि के नष्ट होने, बिगड़ते पर्यावरण से बिगड़े पारिस्थितिकी तंत्र आदि के कारण बादल भी कहीं रूष्ट हो जाते हैं तो कहीं रौद्र रूप भी दिखाते हैं। मानवजात को विवेकशील हो समझने की आवश्यकता है।

हमारी संस्कृति में शास्त्रीय संगीत में अद्भुत राग-रागिनियों में मेघ मल्हार राग लोकप्रियता रखती है। कहते हैं कि इस राग में गायन से मेघ भी हर्षित होकर जलवृष्टि करते हैं। मेघ मल्हार की समझ जन सामान्य को शायद नहीं होती परन्तु बरसात की नन्हीं बूंदों की छमछम व रिमझिम से सभी मनमोहित हो जाते हैं।

हवाई यात्रा कर रहे बच्चे व बड़े, हवाई जहाज की खिड़की से मेघों से आच्छादित नभ को बार बार बाहर झांक कर सुकून अनुभव करते हैं। नभ में ये श्वेत श्यामल बादल रूई के सुकोमल ढ़ेर स्वर्ग के धरातल यानी फर्श के होने का अनुभव कराते हैं। इनकी विविध, अनोखी व विचित्र आकृतियां बरबस ध्यान खिंचती रहती हैं। गगन में दूर तक फैले ये बादल और इनके छितराने से दिखती वसुंधरा, पतली रेखा में बल खाती चमकती नदी, गांव आदि एक अलौकिक नज़ारा होने का आभास कराते हैं। प्रकृति प्रेमी पहली बार इन बादलों के रूपरंग, आकृति, फैलाव आदि देख देख कर रोमांचित हुए बगैर नहीं रह सकता।

कालिदास रचित मेघदूतम् अद्भुत और अद्वितीय कालजयी संस्कृत साहित्य हैं। महाकवि कालिदास के इस अमर साहित्य में मेघ आज भी एक जीवंत दूत की भांति दृश्यमान होता हुआ दिखता है। ये यक्ष के संदेशवाहक मेघ यानी बादल बनकर प्रेयसी को सन्देश पहुंचाते हैं। मेघ का अद्वितीय मानवीकरण स्वरूप को उकेरा गया। प्रकृति का अद्वितीय चितेरा कालिदास। श्रृंगार रस से सरोबार मेघदूत सा अति खूबसूरत वर्णन कदाचित ही कहीं मिले। यथा –

‘हे मेघ! जब तुम आकाश में चढ़ जाओगे तो प्रवासियों की पत्नियों को अपने अपने पतियों के घर लौट आने का विश्वास हो जायेगा। वे आश्वस्त होकर अपने खुले हुए केशों को ऊपर उठा उठाकर तुम्हें देखेंगी क्योंकि तुम्हारे उमड़-घुमड़ आने पर अपनी विरहिणी पत्नी की उपेक्षा कौन करेगा?’ (पूर्व भाग, श्लोक 8 का भावार्थ)

बहरहाल आषाढ़ माह, जून-जुलाई महीने में मानसून के आगमन का समय है। इन दिनों मेघों का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहता है। मानव, जीव-जंतु क्या प्रकृति भी यही पुकारती अनुभव होती है, ‘प्यारे मेघ आओ रे!’ हम इन मेघों के अद्भुत रूपरंग, आकार, चपला-गर्जन आदि को देखकर अपने सुकोमल अनुभवों को शब्द और आकार देकर अक्षुण्ण स्मृतियों में संजोने का प्रयास करें।