प्रेरणादायक दिव्य विभूति का अवतरण

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प्रेरणादायक दिव्य विभूति का अवतरण

डॉ. (श्रीमती) बसन्ती हर्ष

मुख्य सम्पादक

पुष्करणा संदेश, बीकानेर

हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति को महत्व व गरिमा प्रदान करने का मुख्य श्रेय हमारे दूरदृष्टा मनीषी पूर्वजों को मिलना चाहिए जिन्होंने महापुरुषों के सदाचरण व सद्गुणों को अनुकरणीय बनाने हेतु प्रतिवर्ष उनकी जन्मतिथि को उत्सव रूप में मनाने की परम्परा प्रारम्भ की। इन्हीं दिव्य पुरुषों में भगवान श्रीकृष्ण का नाम उल्लेखनीय हैं जिनके सत्कार्यों व महान गुणों का स्मरण करने, प्रभु की आराधना व उपासना करने से मन को अपूर्व शक्ति व उमंग की प्राप्ति होती है। जो हमें पुरुषार्थ हेतु प्रेरित करके सफलता की ओर अग्रसर करती है।

भादवा बदी अष्टमी आने के कई दिनों पूर्व से ही भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण या जन्म लेने की भक्तजनों द्वारा विशेष उत्सुकता व प्रतीक्षा बनी रहती है। वस्तुतः युगों पूर्व जन्म लेने वाले भगवान श्री कृष्ण का जन्म एक दिव्य अवतरण था जो साधारण दिखने पर एक असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। बाल्यकाल से ही इस दिव्यात्मा की चमत्कारिक गतिविधियां सबको विस्मित व आल्हादित कर देती थी। यही कारण है कि अपने अनेकानेक गुणों के कारण वे सर्वत्र वन्दनीय, पूजनीय व अनुकरणीय बन गये।

योगेश्वर कृष्ण का विराट स्वरूप युगों-युगों के अन्तराल के बाद आज भी जन-मानस में विशिष्ट प्रभावशाली है । यही नहीं, उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के अनुकरण से उच्च मानवीय मूल्यो के साथ-साथ भौतिक व आध्यात्मिक जगत् में तादात्म्य भाव की पुनः स्थापना में सहायता मिलती है । अनादिकाल से हमारे जीवन में चली आ रही अनीति व भ्रष्टाचार के विरूद्ध श्रीकृष्ण भगवान के योगदर्शन की आज भी इतनी ही प्रासंगिकता है।

शताब्दियों पूर्व भाद्रप्रद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन मथुरा के कारागृह में हिन्दू धर्म की आस्था व विश्वास के प्रतीक श्री कृष्ण भगवान ने माता देवकी की कोख से जन्म लिया। अतः इस दिन को ‘कृष्ण जन्माष्टमी’ नाम से जाना जाता है। कंस सदृश दुष्टों के संहार तथा धर्म की स्थापना हेतु अवतार लेने वाले कृश्ण के जन्म के साथ ही समस्त वातावरण में अनन्त आनन्द का साम्राज्य हिलोरें लेने लगा।

‘धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे’

अर्थात् धर्म की स्थापना हेतु मैं प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।

‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में श्री कृष्ण के द्वारा कहे गये ये वचन प्रत्येक युग में आज भी खरे उतरते हैं। यही कारण है कि वे जन-जन के हृदय में अवस्थित होकर पूजनीय व प्रातः स्मरणीय हैं। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मुझसे परे और भिन्न कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें सूत्र में मणियों की भांति पिरोया हुआ है।

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

                   (श्रीमद्भगवद्गीता – 7.7)

सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीकृष्ण निर्विकार भाव से इस दृश्यमान जगत् में अदृश्य रूप से स्थित हैं । समस्त जगत् का कार्य व्यापार उसी चेतन सत्ता द्वारा संचालित है। विश्वभर में सूर्योदय काल से प्रारम्भ होकर रात्रिकालीन सभी गतिविधियों का नियमन उस प्रभु के द्वारा ही सम्भव है। दूसरो शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रभु का वह अदृश्य जीवन तत्व हमारे शरीर के रग रग में व्याप्त है । मनुष्य तो उस प्रभु के हाथ में कठपुतली की तरह है। संसार रूपी मणिमाला की वह एक मणि के समान है जिसका अदृश्य सूत्र वही परमात्मा है।

संसार में आने वाले सभी प्राणी नाम रूप, प्रकृति आदि से विभिन्न होते हुए भी उन सभी में ईश्वर चेतन तत्व ही अदृश्य सूत्र है। श्री कृष्ण अर्जुन को यही बता रहे हैं कि सबके सूत्रधार वासुदेव स्वयं ही हैं। वासुदेवः सर्वम्। कहा भी गया है कि –

        बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।  

        बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।

अर्थात् हे अर्जुन मुझे समस्त स्थावर जंगम प्राणियों का नित्य कारण जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि तथा तेजस्वियों का तेज हूँ। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अन्दर व्याप्त ओजस्विता ऊर्जा तत्व आदि सब परमपिता परमात्मा की ही देन है।

प्रत्येक मनुष्य में देवता यानि सद्गुणों का वास होता है जो हमें अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। साथ ही दानवोचित दुर्गुण भी व्याप्त होते हैं जो दुष्कर्मों की ओर धकेलने का प्रयास करते हैं। अच्छे कर्म हमारे व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करते हैं तो बुरे कर्म हमें आपराधिक कृत्यों में धकेलकर पतन की ओर अग्रसर करते हैं। मानव जीवन इन दोनों स्थितियों के बीच आजीवन संघर्ष करता है। परन्तु अन्त में सफलता सद्गुणी व्यक्ति की ही होती है।

आज के आपाधापी पूर्ण आर्थिक तथा भौतिक युग में मनुष्य येन-केन-प्रकारेण अधिकाधिक आर्थिक साधन जुटाकर शीघ्रतिशीघ्र भौतिक सुख सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील है । अनैतिक प्रवृतियां मानव मन पर हावी होने लगी हैं। संस्कारों की उपेक्षा करते हुए समाज में धन-सम्पदा को अधिक प्रतिष्ठा दी गई है चाहे वह अनाचार व दुष्कर्मों आदि द्वारा ही प्राप्त क्यों न हो। साधु के वेश में शैतान समस्त समाज को वैचारिक व भावनात्मक रूप से भी प्रदूशित कर रहे हैं। हमें प्रयत्नपूर्वक ऐसे दुष्कर्मों से दूर रहकर सद्गुणों को अपनाना चाहिये। उत्कृष्ट व श्रेष्ठ विचारों के द्वारा समस्त भाई – बन्धुओं के साथ सहयोग, सद्भाव तथा भाईचारे की भावना रखनी चाहिए। कष्ट के समय दूसरों की सेवा व सहायता करनी चाहिए। ईश्वर की पूजा-अर्चना व आराधना निरन्तर करते रहने से निश्चय ही सद्गुणों की वृद्धि होती है तथा धीरे-धीरे दुर्गुणों का निराकरण होता है। कलियुग में श्रीकृष्ण की पूजा व भक्ति हमारे चहुंमुखी विकास के लिए अत्यन्त उपयोगी व अनुकरणीय है।

वस्तुतः आज के युग में समाज में बढती हुई हिंसा, अनाचार व भ्रष्टाचार आदि दुष्प्रवृत्ति हमारे देश का पतन की ओर अग्रसर कर रही हैं। ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित शाश्वत जीवन दर्शन और आदर्श सिद्धान्त ही समाज को सही मार्ग दर्षन कर सकते हैं। अतः हमें आलस्य छोड़कर श्रीकृष्ण भगवान की पूजा-अर्चना को कर्त्तव्य भाव से करना चाहिये। जैसा कि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है –

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

     अर्थात् – हे अर्जुन तुम उस (परमात्मा श्री कृष्ण) की शरण में जाओ क्योंकि जहां योगेश्वरः श्री कृष्ण के दैवीय गुणों का अनुशीलन किया जाता है और जहाँ गाण्डीव धनुर्धारी अर्जुन के समान निष्काम भाव से कार्य की तत्परता है वहीं पर श्री (लक्ष्मी), विजय व अचल नीति है।

        यत्र योगेश्वरः कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धर।

        तत्र श्री विजयो भूति र्धुवा नीति र्मतिर्मम।।

     अतः तुम सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण करो।

     तस्मात् सर्वेशु कालेशु मामनुस्मर युध्य च।

भगवान श्री कृष्ण समाज के सजग प्रहरी थे। समाज के उन्नयन के लिए ज्ञान, कर्म व भक्ति की त्रिवेणी का अनुकरण आवश्यक है। धर्म से ही पाप का विनाश और मानव की प्रतिष्ठा होती है। विभिन्न संस्कारों से प्रेरित जन के लिए भी उपासना व भक्ति को ही प्राथमिकता दी गई है । भक्ति से परमात्मा के गुण जीवात्मा में प्रवेश करते हैं, जिससे पारलौकिक जीवन तो आनन्दपूर्ण हो ही जाता है, भौतिक जीवन भी रस से सिक्त होकर सरस व सुन्दर हो जाता है । मेरे विचार में भगवान श्रीकृष्ण का दार्शनिक दृष्टिकोण समन्वयकारी था जिसमें ज्ञान के साथ भक्ति, ध्यान के साथ उपासना व कर्म के साथ धर्म का अपूर्व मेल है। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की महिमा बताते हुए श्रीकृष्ण ने कहा है-

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’

अर्थात् कर्म पर ही तेरा अधिकार है, फल पर कभी नहीं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मानव मात्र को सदैव फल की इच्छा किए बिना निरन्तर कर्म में प्रेरित रहना चाहिये, यही सर्वमान्य सिद्धान्त है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी को धूमधाम से मनाने से हम सबको उनके दिव्य प्रसंगों व क्रियाकलापों से निरन्तर प्रेरणा प्राप्त होती रहती है । यही प्रासंगिकता आज भी है तथा भविष्य में भी रहेगी।

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