शिक्षा, योग और दर्शन की प्रतिमूर्ति: श्री अरविंद घोष

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शिक्षा, योग और दर्शन की प्रतिमूर्ति: श्री अरविंद घोष

5 दिसंबर महानिवार्ण दिवस पर विशेष

डॉ. कृष्णा आचार्य

बीकानेर

एक योगी, द्रष्टा, दार्शनिक, कवि और भारतीय राष्ट्रवादी थे- श्री अरविंद घोष। 15 अगस्त 1872 कोलकाता (तब कलकत्ता) में जन्मे श्री अरविंद घोष के अनुसार जीवन का लक्ष्य सर्वांग जीवन है जिसमें तन-मन और आत्मा सभी का विकास होना चाहिये, वास्तव में यह विकास तभी हो पायेगा, जब व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करें। सर्वांग योग दर्शन यह बताता है कि मानव को योग अज्ञान, अंधकार और मृत्यु से ज्ञान, प्रकाश और अमरत्व की ओर ले जाता है।

पांडिचेरी में श्री अरविंद घोष ने एक आध्यात्मिक अभ्यास विकसित किया जिसे उन्होंने ‘इंटीग्रल योग कहा। उनके दर्शन का मूलमंत्र भी ‘मानव-जीवन का दिव्य शरीर में दिव्य जीवन में विकास था। उनका मानना था कि आध्यात्मिक अनुभूमि न केवल मानव प्रकृति को मुक्त करती है, बल्कि उसे रूपांतरित भी करती है, जिससे धरती पर दिव्य जीवन संभव है।

श्री अरविंद घोष सन् 1905 में बंग-भंग आंदोलन के समय पूरी तरह से सक्रिय राजनीति से जुड़ गये थे। वे कांग्रेस के गरम दल से प्रभावित थे। 10 अप्रेल 1908 को मुजफ्फरपुर के जिला जज श्री किंग्स फोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका परंतु दुर्भाग्य से किंग्स फोर्ड तो इसमें नहीं था परंतु इसमें सवार विंगल कैनेडी की पत्नी और पुत्री की मृत्यु हो गई। इस केस में 4 मई 1908 में अरविंद को गिरफ्तार कर लिया गया और अलीपुर जेल में रखा गया। 13 अप्रेल 1909 को दीनबंधु चितरंजन दास के अकाट्य तर्कों एवं कुशल पैरवी के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। इसके पश्चात अरविंद सक्रिय राजनीति से अलग हो कर अध्यात्म की ओर अग्रसर हो गए।

पाण्डिचेरी में सन् 1910 से 1917 तक गहन गुप्त साधना की ओर कोई सार्वजनिक उल्लेख नहीं किया। सन् 1914 में उन्होंने ‘आर्य’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन भी किया। इसी में इनके ग्रंथों का धारावाहिक के रूप में प्रकाशन हुआ। 1921 में यह पत्र बंद हो गया। इसी में इनके ग्रंथों का धारावाहिक के रूप में प्रकाशन भी हुआ। 1926 में अरविंद ने अरविंद आश्रम की स्थापना की और यहीं पर वे लगभग 40 वर्षों तक सर्वांग योग की साधना करते रहे। इस महायोगी ने 5 दिसम्बर सन् 1950 की रात्रि में महासमाधि ले ली।

शैक्षिक दर्शन – अरविंद ने कहा था कि शिक्षा कुछ और नहीं बल्कि छिपी हुई क्षमताओं को सामने लाना और उनका पोषण करना है, स्वयं को स्वयं के साथ एकीकृत करना, समाज, देश और मानवता के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहना है ताकि व्यक्ति स्वयं को एक संपूर्ण प्राणी या अभिन्न मानव बना सके।

चूंकि अरविंद का दर्शन उच्चकोटि का आदर्शवाद होते हुए भी यथार्थवाद, आदर्शवाद, प्रयोजनवाद तथा ईष्वरवाद का अच्छा संबंध है, अतः उनके अनुसारा मनुष्य जीवन आध्यात्मिकतापूर्ण तथा अनंत को पाने का माध्यम है। शिक्षा संबंधित उनके विचार इस तरह से हैं-

1. शिक्षा बाल-केन्द्रित होनी चाहिये।

2. बालक का चारित्रिक एवं नैतिक विकास किया जाना चाहिये।

3. शिक्षा को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिये।

4. शिक्षा द्वारा बालक का सर्वांगीण विकास होना चाहिये।

5. शिक्षा में धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचारों को स्थान दिया जाना चाहिये।

6. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिये।

7. शिक्षक को बालक के मित्र तथा पथ-प्रदर्शक के रूप में होना चाहिये।

8. बालक की आत्माभिव्यक्ति तथा आत्मानुशासन को प्रोत्साहन मिलना चाहिये।

अरविंद के अनुसार शिक्षा का उपयोग मस्तिष्क के विकास तथा प्रशिक्षण के लिये किया जाता है। उन्होंने मस्तिष्क के अंत करण का चार स्तर में वर्णन किया है- चित्त अथवा स्मरण शक्ति, वास्तविक मस्तिष्क, बुद्धि, ज्ञान तथा चेतना शक्ति। अरविंद शिक्षा को केवल सूचनायें प्रदान करने का माध्यम नहीं समझते, बल्कि उसको उपयोगी तथा व्यावहारिक ज्ञान देने का माध्यम समझते हैं। वे चाहते हैं कि शिक्षा समय, व्यक्ति, आवष्यकताओं के अनुरूप परिवर्तनशील होनी चाहिये।

उनके अनुसार शिक्षा मानव के मस्तिष्क और आत्मा की शक्तियों का निर्माण करती है। यह ज्ञान और चरित्र और संस्कृति को समृद्धषाली बनाती है। वे आगे यह भी कहते हैं कि बालक के साथ अध्यापक को निर्देशक, पथ-प्रदर्शक और सहायक के रूप में होना चाहिये। शिक्षक को चाहिये कि वह बालक की आंतरिक शक्तियों का अध्ययन करें तथा उनके अनुसार शिक्षण-सामग्री प्रदान करें। उसको स्वयं ज्ञान देने का प्रयास नहीं करना चाहिये और न ही बालक पर बाहरी ज्ञान को थोपना चाहिये। शिक्षक की यह कोशिश होनी चाहिये कि बालक अपनी अभिरूचियों के अनुसार ज्ञान हासिल करते हुए शिक्षा पा सकें।

श्री अरविंद ने शिक्षक की अपेक्षा बालक को अधिक महत्त्व दिया है। समस्त शिक्षा प्रक्रिया को बालक के ऊपर ही आधारित रखा है। उन्होने बालक की रूचियों, स्वभाव, प्रकृति, धर्म आदि के विकास के लिये शिक्षा को आवष्यक माना है। बालक की क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षक को एक सहायक के तौर पर ही काम करना चाहिये, श्री अरविंद इस बात की पुरजोर वकालत करते हैं।

श्री अरविंद की पहचान एक योगी, दार्शनिक के रूप में भी रही है। वेद, उपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथों का गहनता से अध्ययन कर उन्होंने उन ग्रंथों पर अपनी टीकायें लिखी हैं। योग साधना पर उनके मौलिक ग्रंथ भी चर्चित रहे हैं। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति को अपनाने वाले अनुयायी विश्व के समस्त देशों में पाये जाते हैं। वे कवि, साहित्य मर्मज्ञ के रूप में भी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनके मौलिक ग्रंथ हैं- दिव्य जीवन, द मदर, लेटर्स ऑन योगा, सावित्री योग समन्वय, फ्यूचर पॉएट्री। इस तरह से वे कवि, गुरु दोनों ही रूपों में अग्रणी हैं। महान् दार्शनिक और क्रांतिकारी अरविंद घोष के विचारों की आज भी प्रासंगिकता बरकारार है।

उन्होंने धर्म के शाश्वत सत्यों से युग को प्रभावित किया, इसलिये वे युगधर्म के व्याख्याता बन गये। उन्होंने नैतिक क्रांति एवं स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था, इसीलिये वे युग पुरूष और क्रांतिकारी कहलाये। आध्यात्मिक विकास के माध्यम से संसार को ईश्वरीय अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार किया अर्थात् नव्य वेदांत दर्शन को प्रतिपादित किया।

श्री अरबिंदो आश्रम सफेद संगमरमर से बना हुआ भव्य आश्रम है जिसके दो अलग-अलग कक्षों में श्री अरविंद और श्रीमां के भौतिक अवशेष रखे हुए हैं। आज पांडेचेरी आध्यात्मिक साधकों के साथ-साथ पर्यटकों के लिये भी एक महत्वपूर्ण गंतव्य स्थान है। दुनिया भर से हजारों लोग आश्रम में आते हैं और श्री अरविंद के दर्शन से अभिभूत हो जाते हैं। आधुनिक जगत के इस महायोगी को शत-शत नमन है।

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बीकाणै री गणगौर

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राजाराम स्वर्णकार [responsivevoice_button voice="Hindi Female" buttontext="Listen this article"] मरूथळ मेळां रौ घर। ताळ-तळाव तिरियां मिरियां, जठै मंडै मेळा-मगरिया। लोक-जीवण रै सुख-दुःख, आस-निरास उच्छाव-उमंग रै समंदरियै...