सृष्टि के मूल में जो आनन्द तत्त्व है, वही गुरु है

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सृष्टि के मूल में जो आनन्द तत्त्व है, वही गुरु है

विवेक मित्तल

समाजसेवी, विचारक एवं पत्रकार

बीकानेर

जिस प्रकार सूर्य की किरणें पृथ्वी पर समान रूप से जगत के निवासियों को उजाला देती हैं ठीक उसी प्रकार गुरु भी अपने सभी शिष्यों पर समान भाव रखकर ज्ञान की रोशनी से उनके जीवन में उजाला लाते हैं यह आप (शिष्य) पर निर्भर करता है कि आपने गुरुज्ञान को धारण करने की पात्रता कितनी है। जिसमें जितनी पात्रता उतना उनका कल्याण। इसलिए गुरु अमृत का प्याला, गुरु ज्ञान की माला। गुरु से प्राप्त सत्संग रूपी अमृत को निरन्तर चखते रहें और ज्ञान की माला को निरन्तर जपते रहें तभी कल्याण होगा क्योंकि गुरु कहते हैं, ‘सत्संग हमारी संस्कृति की आत्मा है’ सत्य का संग अर्थात् ‘सत्संग’ जिसे जीवन में न केवल निरन्तर करते रहना चाहिए बल्कि आत्मसाध भी करना चाहिये तभी सार्थकता होगी।

दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं जिन्हें जीवन में उचित अवसर नहीं मिलते और यदि मिलते भी हैं तो वे उनका समुचित उपयोग नहीं कर पाते। ऐसे में व्यक्ति नकारात्मक विचारों का आवरण ओढ़ लेता है, निराशा की आगोश में डूब जाता है, असफलता उसको पुनः उठकर आगे बढ़ने से रोकती है ऐसे में अगर कोई उसको इस अवसाद से मुक्त कर सकता है तो वह है ‘गुरु’। गुरु उन्हें रुको मत आगे बढ़ते रहो… की भावना को जाग्रत करते हुए श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं ठीक उसी तरह जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन घोर निराशा में डूब कर अपने कर्म को करने से मना कर देता है तो श्रीकृष्ण उसको शोक मुक्त करके युद्ध के लिए (कर्म करने के लिए) प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं “निमित्त मात्रं भव सव्य साचिन्”, हे अर्जुन! तू निमित्त मात्र बन जा।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी गुरु बनकर गीताजी के माध्यम से हमें श्रेष्ठ मानव बनने का उपदेश दिया, नियम बताये कि क्या करें और क्या न करें। गुरु वचनों का पालन करके मानव जीवन को सरल, सरस और सहज बना सकता है। सजग रहते हुए कर्म करें ताकि आप प्रभु को प्राप्त कर सकें। गुरु सकारात्मक सोच को विकसित करने का सूत्र बताता है, जीवन पर पर अग्रसर होने के लिए दृढ़ता लाता है, विश्वास को बढ़ाता है, विषम परिस्थतियों से मुकाबला करना सिखाता है ताकि हमारा सम्पूर्ण कल्याण हो सके।

स्वामी विवेकानन्द ने भी गुरु रूप में भारत की उन्नति के लिए, युवाओं की उन्नति के लिए अनेक सूत्रों का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार भलाई का मार्ग संसार में सब से अधिक ऊबड़-खाबड़ तथा कठिनाइयों से पूर्ण है। इस मार्ग से चलने वालों की सफलता आचर्श्चजनक है, पर गिर पड़ना कोई आश्चर्यजनक नहीं। हजारों ठोकरें खाते-खाते हमें चरित्र को दृढ़ बनाना है।

स्वामी जी की सच्ची बात यह है कि दृढ़ संकल्प कर लो कि तुम किसी दूसरे को नहीं कोसोगे, किसी दूसरे को दोष नहीं दोगे पर तुम ‘मनुष्य’ बन जाओ, खड़े होओ और अपने आपको दोष दो, स्वयं की ओर ही ध्यान दो, – यही जीवन का पहला पाठ है, यही सच्ची बात है।

आध्यात्मिक गुरु स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज कहते हैं, “हमारे चारों तरफ जो आनन्द तत्त्व उमड़-घुमड़ रहा है, उस आनन्द को अनुभव करने के लिए हमारा बोध ठीक होना चाहिये। हमारा भाव ठीक होना चाहिये। हमारी क्रिया भी ठीक होनी चाहिए। सनातन संस्कृति में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक सोलह संस्कारों को बताया गया है। हमें प्रयास पूर्वक इन सोलह संस्कारों को पुनः अपनी जीवनशैली में लाना होगा। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि –

मम योनि-र्महद्-ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।

सम्भवः सर्व-भूतानां, तता भवति भारतः।।

अर्थात् – हे भारत (अर्जुन)! महत् ब्रह्म (अर्थात् त्रिगुणात्मिका मूल-प्रकृति) मेरी योनि (अर्थात्) गर्भाधान का स्थान है (और) मैं उस योनि में गर्भ (सब भूतों की उत्पत्ति के कारण रूप बीज) को स्थापित करता हूँ। उस गर्भाधान से (हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति द्वारा) समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।गीता-14.3।।

गुरु कौन है? स्वामीजी महाराज लिखते हैं, “सृष्टि के मूल में जो आनन्द तत्त्व है, वही गुरु है।” जोत से जोत को जलाते चलो, कड़ी से कड़ी को बढ़ाते चलो, राह में आयेंगे कष्ट कई, गुरुकृपा से हटाते चलो। गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकानाएँ।

जय हिन्द! वन्देमातरम्!!

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बीकाणै री गणगौर

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राजाराम स्वर्णकार [responsivevoice_button voice="Hindi Female" buttontext="Listen this article"] मरूथळ मेळां रौ घर। ताळ-तळाव तिरियां मिरियां, जठै मंडै मेळा-मगरिया। लोक-जीवण रै सुख-दुःख, आस-निरास उच्छाव-उमंग रै समंदरियै...