अर्थात जन्म लेकर राम जगत् में जो अपना निर्मल यश फैलाते हें, उसी यश को गा – गाकर भक्त लोग भव सागर से तरते हैं। कृपा के समुद्र भगवान भक्तों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं । राम के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक से बढ़कर एक हैं।
‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास जी ने राम की महिमा का बखान करते हुए ‘सर्वजनहिताय’ ‘राम भक्ति’ का पथ प्रशस्त किया और छल छद्म रहित राम भक्ति में लीन होना ही धर्म माना । परन्तु यह भक्ति ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं होती और सत्संग या गुरू के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है । इसलिए रामचरित मानस के आरम्भ में तुलसी ने सर्वप्रथम गुरू वन्दना की है –
बन्दउ गुरू – पद – कंज, कृपासिंधु नररूप हरि
महामोह तम – पुंज, जासु वचन रवि कर निकर।
तुलसीदास जी ने गुरू भक्ति और राम भक्ति में कोई अन्तर नहीं माना है । बिना भक्ति के न भव पीर मिटती है और न हृदय का कल्भश दूर होता है । उनके अनुसार कर्त्तव्य, गुण, स्वभाव आदि भी धर्म के अन्तर्गत समाहित हैं तथा वस्तुगत प्रकृति को भी उन्होंने धर्म माना है । जड़ और चेतन सभी पदार्थो के धर्म पृथक – पृथक हैं । जैसे अग्नि का धर्म दाहकत्व है वैसे ही मनुष्य का धर्म है ‘मानवता’ । इस मानव धर्म को अपने अन्दर आत्मसात् करना ही गुरू या प्रभु की भक्ति है जिसके अन्तर्गत दान, दया, क्षमा, धैर्य आदि आत्मिक गुणों का विकास अवश्यम्भावी है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के नाम से कौन परिचित नहीं होगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब भी धर्म की हानि हुई है तब तब ईश्वर ने मनुष्य के रूप में अवतार लेकर हिंसा अथवा हिंसको का विनाश किया है। ऐतिहासिक पुरुष श्री राम भी उन्हीं महान विभूतियों में से एक थे।
दशाननवधार्थाथ, धर्मसंस्थापनाय च
दानवानां विनाशाय, दैत्यानां निघनाय च
परित्राणाय साधूना जातो रामः स्वयं हरि:।
अर्थात् रावण के वध, दानवों के विनाश, दैत्यों को मारने तथा धर्म की प्रतिष्ठा एवं सज्जनों के परित्राण के लिए स्वयं श्री हरि राम के रूप में अवतीर्ण हुए।
रामनवमी के दिन स्वयं भगवान् ने नरलीला करने के लिए राम के रूप में अवतार लिया था। अतः इस दिन उपवास और जागरण के द्वारा उन महापुरुष के गुणों का अनुकरण व अनुशीलन करके ही सांस्कृतिक व आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं । इस प्रकार इस व्रत का सांस्कृतिक व वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से महत्त्व है।
आईये, आज राम नवमी के इस पावन अवसर पर उनका पुण्य स्मरण करें, जो राष्ट्र के पुनरूत्थान तथा नव जागरण के लिए सदैव सक्रिय रहे हैं । उनका पितृ प्रेम, भा्रत प्रेम, मातृ प्रेम यही नहीं, अपने संपर्क में आने वाले समस्त प्राणी मात्र से प्रेम व सहानुभूति सचमुच अनुकरणीय है। भगवान राम और सुग्रीव की मैत्री तो मैत्री के आकाश में सबसे ऊंची उड़ान है।
उसी प्रकार नर (राम) और वानर (हनुमान जी) की मैत्री पर सीता माता को भी बड़ा आश्चर्य हुआ था। तभी तो उन्होंने हनुमान जी से पूछा था कि:-
‘नर बानरहि संग कहु कैसे’ (रामचरित मानस)
सचमुच राम के व्यक्तित्व में, राम की महामानवता में वह चमत्कार था, जिसने बंदरों के ऊपर भी अपना प्रभाव डाल दिया और उनके आचार विचार को भी अत्यंत विशुद्ध ज्योतिर्मय बना दिया । आज के युग में तो राम के आदर्श स्वरूप के अनुकरण की और भी अधिक आवश्यकता है । आज जहां इसी धरती पर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से मैत्री भाव के स्थान पर हिंसा अथवा विरोधी प्रवृति रखता है वहीं पशु को भी मानव धर्म में दीक्षित करके मानव ही नहीं महामानव बना देना कोई साधारण बात नहीं है। यह श्री राम की महानता का ही द्योतक है कि उन्होने महावीर हनुमान को देवत्व से भी ऊंचे ईश्वरत्व के सिंहासन पर बिठाकर और सुग्रीव को अपना महामंत्री बनाकर असंभव को भी संभव कर दिखाया। निःसंदेह श्री राम दिव्य गुणों के सागर हैं।
‘राम अमित गुन सागर, थाह न पावै कोई’ (उत्तर रामचरितम्)
वही परमेश्वर जगत की रक्षा करने के लिए अवतार लेने पर जगदीश्वर होता है तब वह पापियों, अधर्मो और पतितों के शरण होने पर उनके पापों का नाश करके सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।
‘राम’ नाम की अपूर्व महिमा और तरन तारन शक्ति का गुणगान सभी धर्मशास्त्रों में भरा हुआ है । ‘वेदोडखिलो धर्ममूलम्‘ और ‘राम नामैव वेद सारांश:’,‘रामान्नास्ति परो देवः’ इत्यादि वाक्य इसी बात के द्योतक हैं। ‘सुख निधानः’ ‘करूणा – भवन’ भगवान श्री राम का मंगलमय अवतार सबको सुख देने के लिए हुआ। ‘राम जनम जग मंगल हेतु।’ वे शैशवावस्था से ही ऐसे कार्य करते थे, जिनसे पुरवासी तथा परिवार के लोग सुख पावें –
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा।
करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥
यही कारण है कि जिन वीथियों में भगवान विचरण करते थे, सब स्त्री-पुरुष निर्निमेश नेत्रों से उस मंगलमयी रूप – माधुरी को निहारते नहीं थकते थे। इस प्रसंग में यह कहना असंगत नहीं होगा कि वे इस धरा धाम पर सुख और आनन्द का भण्डार कहीं अन्यत्र से लेकर अवतरित नहीं हुए, अपितु उन्होंने अपने श्रेष्ठ चरित्र तथा आचरण – व्यवहार के द्वारा इस धरती पर ही स्वर्ग तुल्य स्थिति उत्पन्न कर दी थी। इसी कारण आज तक राम राज्य की कल्पना आदर्श सुखमय राज्य के लिए की जाती है।
उन्होंने अपने विचारों के प्रचार एवं तदनुकूल आचरण कराने के लिए किसी पर शक्ति का प्रयोग नहीं किया । उनके चरित्र की छाप उनके सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों पर अनिवार्यतः पड़ती थी । आज भी जब साधारण राजकुमार के उज्ज्वल आदर्श चरित्र का प्रजाजनों पर अनुकरणात्मक प्रभाव पड़ सकता है तो फिर सर्वथा अलौकिक परम दिव्य राजकुमार के परम पावन चरित्र बल से लोग क्यों नहीं प्रभावित होते। वन्य जातियों के लोग कोल, किरात आदि, जो चोरी, लूट खसोट तथा हिंसा द्वारा अपना पेट पालन करते थे, उन से अधिक असभ्य व्यक्तियों की क्या कल्पना की जा सकती थी। परन्तु, भगवान राम के सम्पर्क में आने पर वे भी उच्च कोटि के आदर्श नागरिक बन गये।
श्री राम के मन में अनेकानेक महान् गुणों का अथाह भण्डार था । उनके अन्दर किसी भी परिस्थिति में समुचित कार्य करने की तथा प्रतिकूल परिस्थिति का संयमपूर्वक सामना करने की अपूर्व क्षमता थी । इसी पौरूष के कारण महर्षि विश्वामित्र के द्वारा याचना करने पर पिता दशरथ के राज कार्य में हाथ बंटाने के बजाय उन्होंने वन में जाकर राक्षसों का संहार किया। ताड़का और सुबाहु का वध किया । विमाता कैकेयी के द्वारा चौदह वर्ष का वनवास दिए जाने पर भी वे तनिक भी विचलित नहीं हुए तथा समस्त राजसी वैभव को तिनके की भांति त्याग कर कन्द मूल फल खाकर वन में सहर्ष जीवन यापन किया। वनवास में रावण के सीता हरण कर लेने जैसी प्रतिकूल परिस्थिति को भी श्री राम ने अत्यन्त धैर्यपूर्वक सहन किया। फिर सुग्रीव व हनुमान आदि से मैत्री करके रावण का संहार कर सीता को पुनः प्राप्त किया।
प्रायः जीवन में बहुत कम ऐसा होता है कि हमारे मन के अनुकूल परिस्थितियां हमारे समक्ष आयें। जब कोई कार्य नहीं कर पाते तो विधाता को दोष देते हैं कि क्या करे? यदि हमें उचित परिस्थिति मिलती तो यह कर लेते, वह कर लेते। परन्तु वस्तुतः इस तरह की बातें स्वयं की अकर्मण्यता को छिपाने के लिए ही की जाती हैं। हम व्यर्थ के कार्यों में अपने समय व श्रम तथा शक्ति को क्षीण कर देते हैं । इसलिए जब उचित कार्य के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है तो हम अपने को अशक्त पाते हैं। अतः श्री राम के आदर्श गुणों का अनुकरण करते हुए हमें प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए शक्ति संग्रह तथा शिक्षा – दीक्षा का निरन्तर प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार से समय पड़ने पर उन संचित शक्तियों का उचित प्रयोग किया जा सकता है। लक्ष्मण के द्वारा कविवर गुप्त जी ने समुचित शिक्षा – दीक्षा का महत्त्व बताते हुए पंचवटी में कहलवाया है कि –
मेरे मत में तो विपदाएं
हैं प्राकृतिक परीक्षाएं ।
उनसे वही डरें कच्ची हों
जिनकी शिक्षा – दीक्षाएं ।।
वस्तुतः जो भी कार्य या परिस्थिति सौभाग्य या दुर्भाग्य से हमारे सम्मुख आ जाये, उसका प्रभु श्री राम के चरणों में मन को दृढ़ करके समस्त शक्ति से सामना करना चाहिए । फल कुछ भी हो, अपनी शक्ति भर प्रयास करना चाहिए। जो भी फल निकले, वही प्रभु चरणों में अर्पित है । श्री राम ने कृष्णावतार की अवधि में सर्वज्ञानमयी भगवद्गीता में यही कहा है –
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन्
मा कर्मफल हेतु र्भू मा ते सड्ढोऽस्तु अकर्मणि।
अस्तु उस महान् विभूति श्री राम के सत्कर्मो का अनुसरण करते हुए उन्हीं का स्मरण करना चाहिए । राम ही परम ब्रह्य है तथा इस संसार का उद्धार करने वाले भी श्री राम ही हैं, अतः उन्हीं के आदर्शों का अधिकाधिक अनुशीलन होना चाहिए। उपनिषदों में भी श्री राम की महिमा का बखान इसी प्रकार किया गया है –
राम एव परं ब्रह्य, राम एव परं तपः।
राम एव परं तत्त्वं, श्री रामो ब्रह्य तारकम्।।
वस्तुतः युगों पूर्व जिस मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श व्यक्तित्व का तुलसीदासजी ने अपने रामचरितमानस में गुणगान किया है, वे ही राम परम ब्रह्म परमात्मा के प्रतीक हैं । वेदों में भी उसी निर्गुण सगुण ब्रह्म का उल्लेख किया गया है –
सारद, सेस, महेस, बिधि, आगम निगम पुरान
नेति नेति कहि जासुगुन, करहिं निरन्तर गान।
राम समस्त चराचर के स्वामी हैं और सकल विश्व के कण कण में व्याप्त हैं –
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि
बन्दऊ सबके पद – कमल सदा जोरि जुग पानि
इस मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की उपासना में भगवान शिव भी अपना गौरव समझते हैं –
‘उमा सहित जेहि जपत पुरारी’
परन्तु समस्त धर्मो के मूल में कर्म की ही प्रधानता मानी गई हैं। ‘कर्म प्रधान विश्व करिराखा’ वास्तव में कर्म ही मानव का धर्म है । यह कर्म प्रवृति – परक व निवृति परक दो प्रकार का है। प्रवृति परक कर्मो से मनुष्य सांसारिक भोग विषयों की ओर आकृष्ट होता है जबकि निवृति परक कर्म मनुष्य को आत्म – कल्याण की ओर प्रेरित करता है । इन दो मूलभूत प्रवृतियों के कारण मानव स्वभाव दो प्रकार का होता है। सज्जन सत्कर्म करते हैं और दुर्जन दुष्कर्म। जिन्हें हम धर्म – अधर्म, पुण्य और पाप के नाम से जानते हैं । अधर्म की वृद्धि होने पर धर्म की स्थापना व आदर्श की प्रतिष्ठा हेतु भगवान संसार में बार बार दिव्य पुरुषों के रूप में अवतरित होते हैं।
जब जब होई धर्म की हानी
बाढ़हि असुर अधम अभिमानी ।
आज के युग में जहां सर्वत्र अधर्म का बोलबाला है। अनाचार, हिंसा व दुष्कर्मो ने सामाजिक व्यवस्था को दूषित किया है, ऐसे समय में भगवान श्री राम की भक्ति यानी उनके आदर्श गुणों का चिन्तन व मनन सर्वत्र नैतिक स्तर को उन्नत करने तथा सुसंस्कारों को सुदृढ़ करने में सक्षम हो सकता है। सचमुच सभी धर्मो की आत्मा में एक ही अन्तर्धारा प्रवाहित होती है जो परस्पर समन्वय के साथ मानवीय सद्गुणों के विकास की सीख देती है । इस प्रकार श्री राम की उपासना और भक्ति से पारलौकिक जीवन तो आनन्दपूर्ण हो ही जाता है, भौतिक जीवन भी रस से सिक्त होकर सरस बन जाता है।
अतः उस महान विभूति श्रीराम के सत्कर्मो का अनुसरण करते हुए उन्हीं का स्मरण करना चाहिए। राम ही परम ब्रह्य है तथा इस संसार का उद्धार करने वाले भी श्री राम ही है, अतः उन्हीं के आदर्शों का अधिकाधिक अनुशीलन होना चाहिए।
‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सिद्धान्त को अपने जीवन में अपनाने वाले कर्त्तव्यनिष्ठ, न्यायप्रिय व सद्गुणों के अथाह भण्डार भगवान श्री राम अपने सद्व्यवहार तथा कुषल मार्गदर्शक कार्यशैली के कारण युगों युगों तक मानव के लिए आदर्श व अनुकरणीय बने रहेंगे।
रामनवमी के सुअवसर पर घट – घट वासी, अन्तर्यामी, भगवान श्री राम को कोटिशः वन्दन व नमन।
[responsivevoice_button voice="Hindi Female" buttontext="Listen this article"] शाद्वल@बीकानेर। संगीतकार रफ़ीक़ राजा पिछले 25 वर्षों से बॉलीवुड में बीकानेर का नाम रोशन कर रहे हैं। रफ़ीक़ राजा...