मानवता की अनंत आस्था के गायक : कीर्तिशेष राजस्थानी गीतकार धनंजय वर्मा

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मानवता की अनंत आस्था के गायक : कीर्तिशेष राजस्थानी गीतकार धनंजय वर्मा

गोविन्द जोशी

शिक्षाविद्, संस्कृतिकर्मी, हिन्दी एवं राजस्थानी के साहित्यकार

राजस्थानी के समर्थ, सुरीले गीतकार, रूपमाधुरी जैसी अनेक राजस्थानी कालजयी रचनाओं के सर्जक, रंगमंच के अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार, अद्वितीय शिक्षक, राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष के आगीवाण, ‘राजस्थानी साहित्य रा डाक्टर’ की मानद उपाधि से विभूषित और राजस्थानी भाषा साहित्य संगम (अब अकादमी) के पूर्व सचिव, कीर्तिशेष धनंजय वर्मा कभी परिचय के मोहताज नहीं रहे। राजस्थानी के लाडले यशस्वी गीतकार स्मृतिशेष श्री धनंजय वर्मा का नाम लेते ही एक जानदार और शानदार संजीदा व्यक्ति का स्वरूप सजीव सा हो उठता है।

श्री वर्मा का जन्म 13 अगस्त, 1932 को रतनगढ़ (चूरू) में श्री लक्ष्मीचंद वर्मा के घर हुआ। लक्ष्मीचंद जी चूंकि बीकानेर रियासत के तत्कालीन हाईकोर्ट, बीकानेर के रीडर पद पर सेवारत थे तो वे बीकानेर में ही बस गए थे और धनंजय जी भी बीकानेर के ही हो गए। उन्होंने बीकानेर को अपनी कर्मभूमि बनाया। धनंजय को बीकानेर ने भी आगे बढ़कर अपनाया। उन्होंने अपने को बीकानेर की भूमि की स्नेहसिक्त ‘अपणायत’ का ऋणी मानकर खुद को गौरवान्वित अनुभव किया। अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद वे शिक्षा विभाग, राजस्थान में शिक्षक के रूप में पदस्थापित हुए और बीकानेर के विभिन्न राजकीय विद्यालयों में अध्यापन करते रहे।

वे जिस समय अध्यापन कार्य कर रहे थे उस काल में कई शिक्षक अपने छात्रों को डंडे से या थप्पड़ मुक्कों से मारने दंडित करने में विश्वास करते थे। उसके ठीक विपरीत धनंजय जी बच्चों में गिजुभाई बधेका के ध्येय वाक्य ‘बालक ईश्वर का रूप है’ के हिमायती थे। वे आनंददायी शिक्षण के आदर्श शिक्षक थे। छात्रों में वे बहुत ही लोकप्रिय थे। वे पढ़ाते समय अपने मधुर कण्ठों से छात्रों को गीत, कविता सुनाते, प्रसंग अनुसार अभिनय करते। हास्य-व्यंग्य विनोद के सजीव दृश्य पैदा करने में वे सक्षम थे। करुण प्रसंग आ जाता तो वे ऐसी प्रस्तुति देते कि विद्यार्थियों को छोड़िए, आस-पास की कक्षाओं में शिक्षण करवाने वाले शिक्षकों तक की आँखों से झर-झर अश्रु बहने लगते। वीर रस की बात हो तो अंगद जैसे पांव गड़ा देते। श्रव्य दृश्य आधारित शिक्षण के वे निष्णात शिक्षक थे। धनंजय जी अभिनेता थे, संगीतकार थे, नाट्य निर्देशक थे, लेखक थे, कवि-गीतकार थे। वे राजस्थान ही नहीं देश भर की ख्यातनाम नाट्य संस्था अनुराग कला केन्द्र, बीकानेर के संस्थापक थे, जो उन्होंने अपने बड़े पुत्र अनुराग के नाम पर बनाई। देशभर में विख्यात सैनाणी के रचनाकार श्री मेघराज ‘मुकुल’ के वे छोटे भाई थे, मगर उन्होंने राजस्थानी के सुरीले गीतकार के रूप में अपनी अलग ही पहचान बनाई। वे पशु-पक्षियों की बोली बोलने में इतने पारंगत थे कि यूं लगता कि मानो सही में ही वो ही पशु-पक्षी हमारे आस-पास मौजूद हों। धनंजय अगर शेर की दहाड़ लगा देते तो लोग सर पे पांव रखकर भाग खड़े होते। जैसे सही में ही चिड़ियाघर के पिंजरे से शेर बाहर निकल आया हो।

इस मस्तमौला राजस्थानी गीतकार का निधन 19 सितम्बर, 2012 को गणेश चतुर्थी के उत्सव के दिन हो गया था। राजस्थानी भाषा को समर्पित इस महान रचनाकार को शत-शत नमन!

जब चिड़ियाघर से बाहर निकल आया शेर

धनंजय जी के परममित्र शिक्षाविद्-इतिहासकार जानकीनारायण जी श्रीमाली का सुनाया एक किस्सा साझा करना चाहूंगा। एक सत्य घटना पर आधारित किस्सा कुछ यूं है –

एक बार बीकानेर चिड़ियाघर से एक शेर किसी कर्मचारी की लापरवाही से पिंजरे से बाहर आकर, दहाड़ते हुए पब्लिक पार्क में विचरण करने लगा। पूरे बीकानेर शहर में हड़कम्प मच गया। लोग सिर पर पैर देकर भाग खड़े हुए। बीकानेर के सभी स्कूलों में छुट्टी कर दी गई मगर सादुल स्कूल के अनुशासन प्रिय प्रधानाध्यापक श्री तिलकराम भनोत ने स्कूल की छुट्टी नहीं की। धनंजय जी और जानकीनारायण जी श्रीमाली सहित कई शिक्षक स्टाफ रूम में बैठे इसी घटना की चर्चा कर रहे थे। शिक्षक तिलकरामजी से बोले आज तो छुट्टी जरूर होनी चाहिए। तिलकरामजी नहीं माने। वापिस स्टाफ रूम में शिक्षक जुड़े तो बोले- है कोई माई का लाल! जो स्कूल की छुट्टी करवा दे। धनंजय जी ने कहा- छुट्टी तो मैं पांच मिनट में कराद्यूं। सबने कहा- कराओ! देखते हैं, कैसे करवाते हो? धनंजय जी उठे। स्कूल की प्याऊ में गए। प्याऊ का दरवाजा अंदर से बंद किया और हूबहू शेर की आवाज में दहाड़ने लगे। बार-बार शेर की गर्जना सुनी तो अढ़ाई हजार बच्चों की संख्या वाला स्कूल मात्र अढ़ाई मिनट में खाली हो गया। सारे बच्चे बस्ते छोड़-छोड़ कर स्कूल से बाहर भाग निकले। हालांकि येन-केन प्रकारेण वन विभाग के कर्मचारियों ने शेर को पकड़ कर वापिस पिंजरे में बंद कर दिया। सौभाग्य की बात ये रही कि इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई।

राजस्थानी के यशस्वी गीतकार धनंजय

वे राजस्थानी के समर्थ मंचीय गीतकार थे, जिनके गीतों की गूंज राजस्थान के बाहर, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के अनेक राज्यों के मंचों पर धमाल मचाती रही। वे श्रृंगार, करुणा, वात्सल्य, हास्य-व्यंग्य विनोद की गीतों की इतनी सुरीली प्रस्तुतियाँ देते थे कि लोग मंत्रमुग्ध होकर “वंस मोर, वंस मोर” की आवाजें लगाते झूमते रहते थे।

धनंजय जी के शब्द और सुर आदमी को उसके अंतस के चितराम से साक्षात्कार तो कराते ही हैं साथ-साथ नर-नारी के देहाचार से भी परे नर-नारी के एकात्मभाव से भी रूबरू कराते हैं-

“बादळ भेळै बीजळी रमगी

दिन रै भेळै रात”

इस तरह के एकात्म भाव में अलहदा होने का भाव भी उन्होंने ही लिखा –

“कोरे कागद पर पड्या आंसूड़ा दो च्यार

गीली आंख्यां बांचसी दुख सींच्या उद्गार”

कवि ने पत्र लिखा, किसी की याद में आंसू बहाये या फूट-फूट कर रोया

कवि ने यह सब श्रोताओं और पाठकों को सोचने के लिए खुला छोड़ दिया है।

बाल गीत की एक बानगी देखिये, चंदा ‘चंदा आजा रै’ गीत में एक बालक चंदा मामा को घर पर आकर अपने साथ खेलने के लिए मनुहार कर रहा है –

सात ठीकरी भैळी, करल्या,

खेलणने जी सतोळियो

भीड़ू थारा साथै लाई, खेलणनै जी सतोळियो

डाई बाकी रहगी, तो तू मरसी लाजां रै

कै चंदा आजा रै, चंदा आजा रै…

वात्सल्य भाव के ही एक अन्य गीत ‘नान्हो गीगो सबनै प्यारो’ में माँ की ममता और नन्हे गीगे के अनूठे मनोहारी अंदाज को उन्होंने कितने सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है-

“चिमटी सूं बो कीड़ी पकड़ै

बिन बतळायां कूड़ो अकड़ै

बात बात में मीनू झगड़ै

पड़ियो हेठे गोडा रगड़ै

चांद सरीसो लाडां लडियो

दुखड़ो क्यूं झैले

ओ कुंण खेलै आंगणै

ओ कुंण झूलै पालणे।”

बच्चों के साथ पगलिया करते-करते कवि ने धर कूंचा, धर मंजलां मानव जीवन के अनेक पड़ाव तय किए। कवि मानव जीवन की समस्याओं से जूझते हुए कहता है-

“ठसूड़नै सूं बढ़गी थोथ

दूज पछै आयगी चौथ

तिथ टूटै पण सांस नी छूटै

पेट री सळां चैरे तक आयगी अधमरेड़ी भूख आकासां छायगी”

“बंण्योड़े रास्तां रा खुर्दखोज ढहग्या

कुदरत ओळै हाथ री ई सी कनपटी पर दे मारी कै

लोग चेताचूक होयग्या।”

मनुष्य की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगा देने वाले चित्रों के बीच भी इस कवि ने मनुष्य की जीजिविषा को बनाए रखा। जीवन जीने के यत्न करते हुए कवि ने लोगों को जगाया-

“झांझरकै री बेळा गूंजी भैरवी।

जागो रै करसां हेलो देवे धरती माता खेत में।”

कवि धनंजय चारों दिशाओं में ललकारता रहा, मानव के स्वाभिमान को-

“भुजबळ में विसवास जिकां नै

बारां दिन भी आसी रै

मजो घणो है जीणै में”

अपनी लम्बी रचना यात्रा में उन्होंने अनेक यादगार गीत-कविताओं की रचना की, मगर उनके प्रकाशन के रूप में एक मात्र राजस्थानी काव्य पुस्तक ‘रूपमाधुरी’ ही पाठकों के सामने छपकर आ सकी। राजस्थान शिक्षा विभाग के शिक्षकों की विविध रचनाओं के एक संकलन ‘बणगट’ का उन्होंने संपादन जरूर किया था। ये पुस्तक शिक्षक दिवस, 1995 को शिक्षा विभाग, राजस्थान द्वारा प्रकाशित की गई थी।

‘बणगट’ के अपने संपादकीय का नाम उन्होंने ‘बाताँ दो टूक’ रखा था। वे शिक्षा विभाग के नौकर थे लेकिन पुस्तक के संपादक के रूप में अपने साहित्यकार को जिंदा रखते हुए दो टूक लिखा- ‘बणगट’ री रचनावां टाळती बगत मगज में अेक बात बेजा भारी अण’र सै’लती रैयी कै हिन्दी री च्यार पोथ्यां पेटे अठै राजस्थानी रचनाकारां खातर फगत अेक पोथी है, जिण में उणां रै रचाव रा सगळा रंग बळ पड़ता राखणा है।” इस बात से आप सहज ही समझ सकते हैं कि वे राजस्थानी भाषा के कितने प्रबल पक्षधर थे।

सरलमना धनंजय जी

धनंजय जी सरलमना थे। उनके संदर्भ में मेरा एक संस्मरण है। 1980 में संस्थापित सुरभि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान, बीकानेर ने 7 जून, 1983 को उनका विशाल नागरिक अभिनंदन करने का तय किया। मैं संस्था के सचिव के नाते 25 मई, 1983 को उनसे मिलने उनके घर (नगर परिषद (निगम) के सामने) गया, वे बहुत खुश हुए। वे बोले-गोविन्द भाई! एक बात कैवूं, पार पड़ सकै है कै? मैंने कहा- आप कहिए तो सही, मेरी पूरी कोशिश रहेगी। बोले- म्हें शिक्षक हूँ, म्हारी इच्छा है कै म्हारे विभाग रो सबसूं मोटो धंणी डायरेक्टर आवै तो…..। मैंने हामी भरी। अगले दिन ही तत्कालीन निदेशक महोदय से मिला। उन्होंने अपने निजी सहायक से जून के कार्यक्रमों की जानकारी ली। हमारे वांछित दिनों में वे राजस्थान से भी बाहर की यात्रा पर रहने वाले थे। ये बात तो नहीं बनी, मगर मैं तत्कालीन अपर निदेशक श्री भंवरलाल जी शर्मा से मिला और उन्हें आमंत्रित किया। उन्होंने सहर्ष अपनी सहमति दे दी। विशिष्ट अतिथि के रूप में तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक श्री रोहिताश कुमार (जो खुद भी कवि थे) और समारोह अध्यक्ष, नगर विकास न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष श्री भवानीशंकर शर्मा को आमंत्रित किया गया। समारोह के सुव्यवस्थित मंच संचालन का जिम्मा सुरभि के संस्थापक अध्यक्ष गुरुदेव भवानीशंकर जी व्यास ‘विनोद’ ने सहज भाव से पहले से ही ले रखा था। निर्धारित तिथि 7 जून को खचाखच भरे टाउन हॉल, बीकानेर में उनका जो भव्य अभिनंदन समारोह हुआ, उस आयोजन से वे गद्‌गद् थे। अश्रु भरे नयनों और रुंधे कण्ठ से बोले, “मेरे जीवन में मेरा ऐसा सम्मान आज से पहले कभी नहीं हुआ, मैं सुरभि परिवार का आजीवन ऋणी रहूंगा।” आज भाई धनंजय इस संसार में नहीं हैं, मगर उनकी याद हमारे बीच सदा-सर्वदा बनी रहेगी।

सुरभि के सम्मान के बाद तो उनके सम्मान का सूखा मिट गया। एक सिलसिला ही चल पड़ा। उनको मिले सम्मान-पुरस्कारों में उल्लेखनीय हैं- पीथल पुरस्कार, राव बीकाजी अवार्ड, साहित्य श्री पुरस्कार, शब्दऋषि पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से आगीवाण सम्मान। राजस्थान विकास मंच संस्थान, जालोर द्वारा 2004 में उनको डाक्टर की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 2007 में नागरिक मंच, बीकानेर ने भी उनका अभिनंदन किया।

राजस्थानी भाषा को समर्पित इस महान रचनाकार को शत-शत नमन!

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बीकाणै री गणगौर

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राजाराम स्वर्णकार [responsivevoice_button voice="Hindi Female" buttontext="Listen this article"] मरूथळ मेळां रौ घर। ताळ-तळाव तिरियां मिरियां, जठै मंडै मेळा-मगरिया। लोक-जीवण रै सुख-दुःख, आस-निरास उच्छाव-उमंग रै समंदरियै...