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भारत की यह प्राचीन परम्परा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारम्भ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते हैं।

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः।

देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥

अर्थात् हमारे पास चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले, सदैव सुरक्षा करने वाले देव हमारा सदा संवर्धन करने के लिए तत्पर रहें।

ऐसे महान उत्साही पूर्वजों की संतान होना सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है। भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा है और इसके उत्तर में हिमालय पर्वतश्रेणी है। किंतु ये सीमाएं कभी विश्व के अन्य देशों से भारत के नजदीकी संबंध बनाने में कभी बाधक नहीं बनी। हजारों वर्षों से भारतीय लोगों ने सुदूर देशों की यात्राएं की और वे जहां भी गए, वहां उन्होंने भारतीय संस्कृति की अमिट छाप छोड़ी। इसके साथ, ये लोग सुदूर देशों के विचार, प्रभाव, रीति-रिवाज और परंपराओं को भी साथ ले आये। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का प्रसार मध्य एशिया, दक्षिणपूर्व एशिया, सहित विश्व के विभिन्न भागों में हुआ। इस प्रसार की सर्वाधिक विलक्षणता यह है कि इस प्रचार का उद्देश्य किसी समाज या व्यक्ति को जीतना या डराना नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को स्वेच्छा से स्वीकार करवाना था।

एक सहस्राब्दी से भी अधिक समय की अवधि तक, विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता से पीड़ित रहने के बाद भी हमारी परंपराएं आज भी यथावत हैं। 1947 में स्वतंत्र होने के बाद से ही भारत दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने लगा। आज आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, सामरिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सम्प्रुभतासम्पन्न भारत की स्थिति बहुत मजबूत हो गई है। यद्यपि कई चुनौतियां हैं फिर भी हमारी सहिष्णुता, उदारता और सकारात्मक दृष्टिकोण हमें विश्व पटल पर उच्च स्थान दिलाते हैं।

भारत का संविधान, भारत का सर्वोच्च विधान है जो संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। भारतीय संविधान की उद्देशिका का मूल भाव मानवता है। एक ऐसी मानवता जिसमें मनुष्य ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत के कल्याण की भावना व्याप्त है। संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का आदर करना भारत के प्रत्येक नागरिक का पहला मूल कर्तव्य है। हमारे देश में सदियों से विभिन्न संप्रदायों के लोग बड़ी समरसता के साथ रहते आए हैं। राजनीति इस समरसता को कलुषित ना कर सके, यह उत्तरदायित्व जनता जनार्दन का बनता है। यह भी याद रहे कि धर्म में जब भी राजनीति का प्रवेश हुआ है; विभाजन हुआ है, धर्म का अहित ही हुआ है। तुष्टिकरण की राजनीति समाप्त होनी चाहिए। धार्मिक उन्माद फैलाने वाले तत्वों को तुरंत प्रभाव से फ्रभावहीन किया जाना चाहिए। यही सुशासन है और यही राजधर्म है।

जय हिंद।

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