‘दीपावली’, पुरुषार्थ व अपनत्व का प्रतीक पर्व

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‘दीपावली’, पुरुषार्थ व अपनत्व का प्रतीक पर्व

डॉ. श्रीमती बसन्ती हर्ष

शोध निदेशक

मुख्य सम्पादिका

पुष्‍करणा संदेश (मासिक पत्रिका)

दीपावली पर्व को हम प्रतिवर्ष अत्यन्त धूमधाम से मनाते आये हैं। वर्ष – पर्यन्त मनाये जाने वाले त्यौहारों में दीपावली सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। इस दिन हम लक्ष्मीजी के साथ – साथ सरस्वती जी एवं विघ्न विनाषक गणेशजी की पूजा अर्चना करते आये हैं।

कार्तिक बदी अमावस्या को इस बार तदनुसार 31 एवम् 01 नवम्बर 2024 को दीपावली पर्व मनाया जायेगा। सकल विघ्नों का षमन करने के प्रतीक माने जाने वाले भगवान गणेशजी की सर्वप्रथम आस्था विश्वासपूर्वक पूजा – अर्चना निश्चय ही हमें इस पर्व को उल्लास पूर्वक मनाने का अवसर प्रदान करेगी। वहीं ज्ञान – विज्ञान की प्रतीक मां भगवती सरस्वती कर्मठता की ओर अग्रसर करेगी तभी महालक्ष्मीजी प्रसन्न होकर हमें पुनः आर्थिक सुदृ-सजय़ता प्रदान कर सकेगी।

इन्हीं परम्पराओं का निर्वाह करते हुए हम आज भी कार्त्तिक बदी अमावस्या को तीनों देवताओं की विधि विधान से पूजा करते आ रहे हैं।

आज के वैज्ञानिक, आर्थिक तथा भौतिक युग में विवेकपूर्ण सुख – समृद्धि मिले तथा मानव का निरन्तर कल्याण हो इस भावना से की गई यह पूजा समीचीन जान पड़ती है। परन्तु लक्ष्मी प्राप्त होने से ज्यादा लक्ष्मी का घर में निरन्तर वास बना रहे, स्थायित्व रहे, इसके लिए हमारे अन्दर व्याप्त अनेकानेक कलुशताओं को दूर करना होगा। जैसा कि महाभारत में लिखा गया है कि –

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा।

मित्राणाम् चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः॥

(महाभारत उ.38,38)

अर्थात् धैर्य, शान्ति, मन का दमन, पवित्रता, करूणा, कोमल वाणी और मित्रों के प्रति द्रोह न करना ये सात गुण लक्ष्मी रूपी ज्योति को प्रदीप्त करने वाली समिधाएं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सर्वत्र व्याप्त महालक्ष्मीजी की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए हमें मन, वचन व कर्म को पवित्रता पूर्वक अपने आचरण व्यवहार में लाना होगा । कठोर वाणी का त्याग करके सब लोगों के साथ मधुर व कोमल वाणी का प्रयोग करना चाहिए । किसी के भी प्रति ईर्ष्या, द्वेष व द्रोह की भावना न हो, तभी हम निरन्तर महालक्ष्मीजी का साहचर्य, सान्निध्य व सुख प्राप्त कर सकते हैं, इसमें कोई संषय नहीं है।

पुराणों में दिवाली मनाने के कारण से सम्बन्धित अनेक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार मां कैकेयी के कहने से श्रीराम, सीता व लक्ष्मण चौदह वर्ष वनवास में रहे। वहां लंकाधिपति रावण द्वारा सीता का हरण कर लिया गया। तत्पश्चात राम द्वारा रावण का वध हुआ तथा वनवास समाप्ति पर अयोध्या लौटने पर श्रीराम का राज्याभिषेक कार्त्तिक बदी अमावस्या को किया गया। नगरवासियों ने इसी खुशी में अयोध्या को दीपमालिकाओं से सजाया, जो प्रथा आज तक चल रही है।

दूसरी कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन में लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ। तीसरी कथा के अनुसार देवतागण दैत्यराज बलि से पराजित हो गये जिसके कारण दैत्यों ने देवताओं सहित लक्ष्मीजी को अपने कारागृह में बन्द कर दिया। तब लक्ष्मीपति विश्णु भगवान ने वामनावतार धारण करके राजा बलि से तीन पग पृथ्वी मांग कर देवताओं व लक्ष्मीजी को कारागृह से मुक्ति दिलाई। तब इस प्रसन्नता की अभिव्यक्ति हेतु देवताओं ने घरों में दीपक जलाकर लक्ष्मीजी का अभिनन्दन किया।

एक और कथा के अनुसार इन दिनों में खेतों में फसलें पककर तैयार हो जाती हैं तब किसान अपने घरों में मिट्टी के दीपक जलाकर लक्ष्मीजी की पूजा करके अपनी प्रसन्नता को अभिव्यक्ति देते हैं ।

इन्हीं परम्पराओं का निर्वाह करते हुए हम आज भी दीपावली पर्व को आनन्द पूर्वक मनाते आ रहे हैं। इस पर्व के आगमन से कई दिनों पूर्व से ही घरों में सफाई, रंगाई, पुताई आदि का कार्य प्रारम्भ हो जाता है ताकि दीपावली के दिन महालक्ष्मीजी का स्वागत व पूजन विधि विधान से किया जा सके। लक्ष्मीपूजन हेतु महिलाएं विविध पकवान बनाती हैं। धनतेरहस से लेकर भैयादूज तक दीपमालिकाओं के साथ – साथ आजकल भिन्न – भिन्न प्रकार की रंग बिरंगी लड़ियों से घरों को सुसज्जित किया जाता है।

दीवाली के दिन संध्याकाल तत्पश्चात महालक्ष्मीजी की पूजा – आराधना गणपतिजी व मा सरस्वती के साथ धूमधाम से की जाती है। चिरकाल से देश-विदेश में बसे लगभग सभी घरों में यह त्यौहार हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता रहा है। दीपावली पूजन के अगले दिन गोवर्धन पूजा तत्पश्चात भैयादूज पर बहिनों द्वारा भाईयों के तिलक लगाना, राम – राम के लिए परिजनों आदि से मिलना जुलना आदि कार्यक्रम मेलजोल को सुदृ-सजय़ता देने में सहायक होते हैं ।

दीर्घकाल से दीपमालिका त्यौहार मनाने के पीछे क्या कारण हैं? उपरोक्त कथाएं या खेतीबाड़ी से जुड़ी प्रसन्नता आदि? यह सब शोध का विषय हो सकता है परन्तु इतना निश्चित है कि हमारे पूर्वजों ने इस महान पर्व को मनाने की परम्परा को निरन्तरता दी । उसका मुख्य प्रयोजन व्यक्ति-निर्माण, परिवार निर्माण व समाज-निर्माण करके सांस्कृतिक व सामाजिक सम्बन्धों को सुदृढ़ता देना था। दीपावली के कई दिनों पूर्व घर की सलीके से सफाई करके कूडा करकट हटाने से स्वच्छता का वातावरण बनता है, दरिद्रता दूर होती है, तब स्वतः ही महालक्ष्मीजी के आने के रास्ते खुल जाते हैं। इस प्रकार अन्तःकरण व बाह्य जगत की मलिनता को दूर करके मानव हृदय में दिव्य भावनाओं का संचार करना होता है। जिससे सर्वत्र स्वर्गिक सुख की अनुभूति हो। मिल जुलकर पूजा-अर्चना तथा एक दूसरे के घर स्नेह मिलन की परम्परा से भाई – बन्धुओं तथा अन्य परिजनों में स्नेह व सहयोग की भावना का विकास होता है ।

आज के युग में तो दीपावली सदृष त्यौहारों का महत्व व प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि लगभग हम सभी जन अपने परिवारों में वर्ष पर्यन्त एकाकीपन के दंश को झेलने को मजबूर हैं। यही नहीं, परस्पर मनमुटाव, ईर्ष्या – द्वेश आदि भावनाएं सर्वत्र बलवती होने लगी हैं। इन पर्वो के माध्यम से सद्विचारों का उदय हो, हम परस्पर मिलन के द्वारा आपसी मन मुटाव को दूर करके स्नेह का स्त्रोत बहाकर हमारी नई पीढ़ी को भी दीपावली के इस आह्लादक पर्व का महत्व सम-हजयायें, सबके साथ प्रेम पूर्ण व्यवहार अपनाएं तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी, सांस्कृतिक मूल्यों की वृद्धि होगी तथा समाज व परिवारों के कल्याण के मार्ग प्रषस्त हो सकेंगे। आईये, हम सभी षुभ दीपावली का यह त्यौहार स्वजनों के साथ हॅंसी खुशी से मनाकर एकता व भाईचारे को बढ़ाने में सहभागिता करें। सभी पाठक बन्धुओं को दीपावली पर्व की कोटिषः मंगलकामनाएं।

दीपावली के पुण्य पर्व पर

आओ हम सब मिलजुल जायें

उत्साह, उमंग बनाये रखें

स्वस्थ, निरोग सभी रहें

सुख शान्ति का वास रहे

इति शुभम्

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बीकाणै री गणगौर

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राजाराम स्वर्णकार [responsivevoice_button voice="Hindi Female" buttontext="Listen this article"] मरूथळ मेळां रौ घर। ताळ-तळाव तिरियां मिरियां, जठै मंडै मेळा-मगरिया। लोक-जीवण रै सुख-दुःख, आस-निरास उच्छाव-उमंग रै समंदरियै...