इतिहास साक्षी है कि सभ्यता के उदय के साथ ही ऋतु क्रम की स्थिति के अनुसार मानव मिलजुलकर उल्लास व उमंगमय वातावरण बनाने का प्रयास करते थे। इसी को पर्व या त्यौहार नाम से जाना जाता है। जब मनुष्य की शक्तियां व गतिविधियां समान रही होंगी तब उनके सोचने का तरीका भी स्वाभाविक रूप से एक सा रहा होगा। समान चिन्तन के द्वारा समग्र विकास के तथ्य को हमारे पूर्वजों ने निरखा परखा तथा विभिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न स्थानों पर वहाँ की देशीय मौलिकता व प्राकृतिक अवस्था के अनुसार भिन्न-भिन्न पर्वो का निरन्तर क्रमिक विकास होता गया।
कहना न होगा कि समस्त ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसन्त ऋतु की विशेष उपादेयता व महत्ता है जो शीत ऋतु से कम्पित समस्त सृष्टि को नया उल्लास व उमंग प्रदान करते हुए जीवन्तता व कर्मठता प्रदान करती है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण जगत में बसन्त ऋतु के अवसर पर विविध प्रकार के आयोजन होते हैं जो सामाजिक समरसता के साथ-साथ संस्कारों के पोशक भी होते हैं।
जीवन में श्रेष्ठता मिले, दक्षता और असामान्य उपलब्ध्यिां मिलें, धन-मान-यश से हम पूर्ण हों, शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक सामर्थ्यों से हम सम्पन्न हों ये कामनाएं प्रत्येक साधक की रहती हैं। मानव कुछ एक कामनाओं की सिद्धि में तो सफल हो जाता है पर कई बार असफलताएं उसके हाथ लगती हैं। ऐसे में वेदों के उपदेश का मनन कर वह सर्वविध सफलताओं को प्राप्त करने की उम्मीद बांधता है।
पुराणों के अनुसार सृष्टि के आदि काल में ईश्वर की इच्छा से आद्या शक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थी, उस समय श्रीकृष्ण के कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ।
आविर्बभूव तत्पश्चान्मुखतः परमात्मनः
एका देवी शुक्ल वर्णा वीणा पुस्तक धारिणी
बागघिष्ठातृ देवी सा कवीनामिष्ट देवता
बागघिश्ठातृ देवी सा कवीनामिश्ट देवता
सा च शक्तिः सृष्टि काले पंचधा चेश्वरेच्छया
राधा पद्मा च सावित्री दुर्गा देवी सरस्वती
वागघिश्ठातृ या देवी शास्त्र ज्ञानप्रदा सदा
कृष्ण कण्ठोद्भवा सा च या च देवी सरस्वती
(ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्य 3/54-57)
श्री भगवती सरस्वती का तेज अत्यन्त दिव्य, ज्ञानमय व अपरिमेय है। इनकी महिमा अवर्णनीय अतुलनीय है। इन्हें वाग्देवी, शारदा, वागीश्वरी, वाग्देवता आदि नामों से भी जाना जाता है। ऋग्वेद के 10/12 सूक्त के आठवें मन्त्र में माता सरस्वती की महिमा का बखान करते हुए उसे सौम्य गुणों को प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। वे ही सारे विश्व का निर्माण करने वाली हैं। राष्ट्रीय भावना को प्रदान करने वाली वाग्देवी सदैव लोक कल्याण के लिए संघर्षरत रहती है। माता के प्रति सच्ची श्रद्धा व भक्ति रखने वाला मनुष्य मेधावी व विद्वान होकर संसार में सभी सुखों को प्राप्त करता है। इसमें कोई संशय नहीं है। माघ मास की (बसन्त) पंचमी को देवी सरस्वती का आविर्भाव दिवस माना जाता है अतः इस दिन इस दिव्यस्वरूपा माता की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। यही नही, बच्चों की शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व भी सरस्वती पूजन का विधान किया गया है –
माघस्य शुक्ल पञ्चम्यां विद्यारम्भ दिनेऽपि च ऽपिचं/पूर्वेऽह्नि संयमं कृत्वा तत्राह्नि संयतः शुचिः।
ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड, 4/34
श्री दुर्गासप्तशती, ब्रह्मवैवर्तपुराणादि में सरस्वती पूजन की विधि का वर्णन किया गया है। जिसके अनुसार माघ शुक्ल पंचमी को नित्य नैमित्तिक क्रिया से निवृत्त होकर प्रातः काल में ही घट (कलश) की स्थापना करके वागीश्वरी की भलीभांति पूजा अर्चना करनी चाहिए। ‘श्रीं ह्नीं सरस्वत्यै स्वाहा‘ इस अश्टाक्षर मन्त्र से उपचार सामग्रियां भगवती को समर्पित करें। सत्व गुण श्वेत का प्रतीक है। सत्व गुण से उत्पन्न होने के कारण भगवती सरस्वती के उपचार व पूजा सामग्री में श्वेत वर्ण की वस्तुएं- दही, मक्खन, सफेद तिल का लड्डू, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत मिष्ठान्न, नारियल, केला आदि प्रमुख रूप से अर्पित किये जाते हैं। लेखनी व पुस्तक में सरस्वती का निवास होने के कारण इस दिन लेखनी कलम की पूजा विशेष रूप से की जाती है । प्राचीनकाल में बच्चे को पाठशाला भेजने से पूर्व स्लेट व चॉक की पूजा की जाती थी।
भारतीय संस्कृति में व्रत, पर्व व त्यौहारों की चिरन्तन काल से गौरवमयी समृद्ध परम्परा रही है। यहां वर्ष पर्यन्त किसी न किसी स्थान पर कोई न कोई व्रत या उत्सव मनाया जाता है। इन पर्वों के साथ किसी भी जाति विशेष का अटूट सम्बन्ध रहता है, साथ ही उस स्थान की संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। भारतवर्ष में दीपावली, होली, गणेश चतुर्थी, गौरी-पूजन, नवरात्रि आदि पर्वों के साथ साथ माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाये जाने वाले बसन्त पंचमी पर्व का भी विशेष महत्व है। बसन्त के आगमन के साथ ही प्रकृति में नवीन परिवर्तन दृष्टिगत होने लगते हैं। चारों ओर खिली हुई पीली सरसों व हरियाली युक्त प्राकृतिक छटा मन को बरबस ही मोह लेती है। शीतकालीन ठिठुरन से शिथिल हुए अंग प्रत्यंगों में बसन्त पंचमी के आगमन के साथ ही नवीन रक्त का संचार होने लगता है। जिससे शरीर को पुनः स्फूर्ति व क्रियाशीलता प्राप्त होती है। इस दिन प्रकृति के अनुरूप ही पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसी दिन चंग अथवा ढप भी बजने प्रारम्भ हो जाते हैं जो आगामी होली त्यौहार के शीघ्र पदार्पण के संकेत देते हैं। इस ऋतु में प्राकृतिक सुन्दरता से मानव मन का एकाकार व उल्लासमय वातावरण अवर्णनीय होता है। इसे ‘सारसोत्सव’ भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन विद्या, बुद्धि व ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती का पूजन किया जाता है। यह समस्त शास्त्रों के ज्ञान की दाता है। अतः इनकी निरन्तर आराधना व भक्ति करने वाले उपासकों के लिए ज्ञान की अजस्त्र स्त्रोत प्रवाहित होता रहता है।
पुराणों के समवेत अनुशीलन से यह विदित होता है कि – महर्षि व्यास, वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि अनेकानेक ऋशि भगवती सरस्वती की उपासना करके कृतार्थ हुए।
‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’
इसके चार लाख जप करने से मन्त्र सिद्धि होती है।
‘ऊॅं नमो भगवति वाग्वादिनि वद् वद् स्वाहा’
यह दशाक्षर मन्त्र सर्वार्थ सिद्धिप्रद तथा सर्व विद्या प्रदायक माना जाता है।
विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की महिमा अपरम्पार है। विद्या धनं सर्वधन-प्रधानम्’ अर्थात् सब धनों में विद्या धन प्रधान है अतः हमें सरस्वती की उपासना के रूप में समस्त वेद पुराण आदि ग्रन्थों का समादर करना चाहिए। प्रातः काल में उठकर देवी सरस्वती का ध्यान करना चाहिए। विद्यार्थियों को चाहिए कि अपनी पाठयक्रम की पुस्तकों को देवी की मूर्ति मानते हुए उनकी अच्छी सार सम्भाल करे व भली भांति पठन-पाठन करे तो निश्चय ही भगवती शारदा प्रसन्न होती है और श्रेश्ठ ज्ञान प्रदान करती है।
वस्तुतः अज्ञान के निवारण व ज्ञान की स्थापना के द्वारा ही समाज का उत्थान सम्भव हो सकेगा। इस दिषा में विवेकी व सत्पात्रों को आगे आकर समाज सेवा के पुनीत कार्यों में सहयोग करना होगा। तभी मां सरस्वती की वरद अनुकम्पा बनेगी और मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होकर खिंची चली आयेगी। मां सरस्वती से यही विनम्र प्रार्थना करते हैं कि –
सदाचार च्युत समाज को
मां संस्कारों से संवार दो
उद्वेलित जीवन नैया को
भंवर से तुम निकाल दो
शताब्दियॉं बीत जाने के पश्चात् भी पूरे विश्व में ‘बसन्तोत्सव’ को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। चाहे विज्ञान ने सर्वत्र इतनी तरक्की की है लेकिन इन प्राचीन परम्पराओं को अभी तक भी महत्ता दी जाती है जो सामाजिक सुदृढ़ता के लिए आवश्यक भी है और महत्वपूर्ण भी है। इस प्रकार के आमोद-प्रमोद पूर्ण संस्कारित कार्यक्रमों से नई पीढ़ी को निष्चय ही उज्ज्वल भविष्य हेतु दिशा प्राप्त हो सकेगी, ऐसा विश्वास है।