लोक कथाओं की समृद्ध विरासत देवनारायणजी, पाबूजी एवं रामदेवजी के फड़

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लोक कथाओं की समृद्ध विरासत देवनारायणजी, पाबूजी एवं रामदेवजी के फड़

विवेक मित्तल

समाजसेवी, विचारक एवं पत्रकार

भारतीय लोक-जीवन में लोक देवताओं का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान में भी अनेक लोक देवताओं की यहाँ के जनमानस में इनके प्रति गहरी आस्था, दृढ़ मान्यता और अटूट श्रद्धा है। ऐसे ही लोक देवताओं श्री देवनारायण जी महाराज, श्री पाबूजी महाराज और श्री बाबा रामदेवजी महाराज की फड़ का जीवन्त प्रदर्शन 75 फीट गुणा 9 फीट के केनवास पर बीकानेर के डॉ. करणीसिंह स्टेडियम में आयोजित 14वें राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव के अन्तर्गत भारत की विविध संस्कृति और विरासत का उत्सव पण्डाल में संस्कृति मन्त्रालय द्वारा इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सहयोग से किया गया।

लोक देवता का प्रत्येक फड़ एक चलायमान मन्दिर है। राजस्थान के इन प्रमुख लोक देवताओं की कहानियों को दर्शाने वाली यह अनूठी फड़ कल्याण प्रसाद जोशी, भीलवाड़ा के नेतृत्व में तैयार की गई। जिसे भीलवाड़ा स्कूल के बीस कलाकारों की टीम ने पारम्परिक शैली का उपयोग करते हुए बीस दिनों से भी कम समय में तैयार किया। जिसमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया। निश्चित रूप से इस फड़ के माध्यम से बीकानेर वासियों को संस्कृतिक विरासत के बारे में सूक्ष्मता से जानने का अवसर प्राप्त हुआ।

श्री देवनारायण जी महाराज की फड़

श्री देवनारायण जी महाराज जिन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। उन्हें ऊद, उदल, कृष्ण, भीम, धर्मराज, ठाकुर-देव या दरबार जैसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है।

श्री पाबूजी महाराज की फड़

श्री पाबूजी महाराज की फड़ राजस्थान के एक प्रमुख धार्मिक महाकाव्य को चित्रित करनता है। माना जाता है कि 14वीं शताब्दी में राजस्थान के राठौड़ प्रमुख पाबूजी को भगवान अवतार माना जाता है। इनकी कहानी तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व्यवस्था और जीवन-शैली के विवरणों के साथ पाबूजी के जीवन और कार्यों को प्रदर्शित करती है।

श्री बाबा रामदेवजी महाराज की फड़

श्री बाबा रामदेवजी महाराज का जन्म बाड़मेर में शिव तहसील के ऊदकासमेर गाँव में तंवर वंश में हुआ था। इन्हें अर्जुन का वंशज माना जाता है। भगवान द्वारकाधीश की तपस्या के फलस्वरूप जन्म लेने के कारण वीरमदेव जी और रामदेवजी को बलराम और कृष्ण का अवतार माना गया है। रामदेवजी मल्लीनाथजी, हड़बूजी और पाबूजी के समकालीन थे। बाबा रामदेव जी ने पश्चिम भारत में धर्मान्तरण व्यवस्था को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाई। उनकी रचना ‘चौबीस वाणियाँ’ बहुत लोकप्रिय हैं। सीएलआई, आईजीएनसीए के ए.एन. मिश्रा तथा भोपा फुलाराम ने फड़ के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई।

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