डॉ. अभय सिंह टाक
Published on 09.07.2020
कितना खूबसूरत ख्याल है कि अखबार के लिए नहीं लगेगा शुल्क! अब फ्री में आएगा न्यूज पेपर! नहीं आएगा बिजली का बिल! एल आई सी की किश्तें होंगी स्थगित! बैंक ऋण अब होगा ब्याज मुक्त! घर बैठे आएगा मुफ्त राशन! निःशुल्क मिलेगा डीज़ल पेट्रोल और गैस का सिलेंडर! चौंक गए ना जनाब! हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल के खुश रखने को “ग़ालिब”यह ख्याल अच्छा है।
समझा जा सकता है कि सरकार के लिए भी यह संभव नहीं है। कोई बात नहीं, सरकार एक बार व्यवस्था करवा दे और शुल्क सामान्य स्थिति आने पर उपभोक्ता से वसूल कर लिया जाए। केंद्र तथा राज्य सरकारें पेट्रोलियम पदार्थों के भाव कम करने की दिशा में सोच भी नहीं पा रही हैं। बिजली की तो छोड़िए सरकार पानी के बिल भी माफ नहीं कर सकी है। फेस मास्क और हैंड सैनिटाइजर को अब आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के दायरे से बाहर कर दिया गया है। राजस्व एकत्र करने के लिए सरकार ने शराब को मंहगा कर दिया गया है। रिज़र्व बैंक ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में कहा कि जीएसटी के लागू किए जाने के बाद से राज्य सरकारें आबकारी की कमाई से अपने राजस्व का 10-15% इकट्ठा करती हैं। स्पष्ट है कि सरकारें जानती हैं कि बिना राजस्व किसी भी संस्था का संचालन संभव नहीं है।
गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए किसी भी प्रकार का कोई सहयोग ना देने वाली सरकार को यह नैतिक बल कैसे मिल जाता है कि वह किसी संस्थान से अपने जायज हकों को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर देने का आदेश दे। खैर, सरकार सरकार है। संपूर्ण राजस्थान में मात्र तीन कोरोना संक्रमितों पर सरकार संपूर्ण राज्य में लॉक डाउन लगवा देती है और तीन सौ संक्रमित व्यक्ति प्रति दिन पाए जाने पर भी बोर्ड की परीक्षा सफलता पूर्वक संपादित करवा देती है।
राजस्थान में कोरोना संकट के चलते गहलोत सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की ओर से ली जा रही स्कूल फीस पर सात जुलाई की रात बड़ा फैसला लिया। अब सरकार ने स्कूल फीस वसूली पर तब तक रोक लगा दी है जब तक कि स्कूल दोबारा नहीं खुल जाते। क्या मजेदार बात है कि जो लोग सरकारी नौकरी में है, वे भी फीस नहीं दे पाएंगे। क्या यह बात नजर अंदाज की जा सकती है कि समाज में ऐसे अभिभावक भी हैं जिनकी फीस देने की नीयत कभी रहती ही नहीं है? सरकार का उनके बारे में क्या विचार है?
अभी हाल ही में शिक्षा मंत्री जी का एक विडियो वाइरल हो रहा है जिसंमें वे एक स्कूल संचालक को समझा रहे हैं कि अभी कोर्स तैयार नहीं; सिलेबस का पता नहीं; स्कूल कब से खुलेगी, पता नहीं, तो फिर आप लोग किस बात की फीस ले रहे हैं? मंत्री जी को शायद याद नहीं रहा कि अभिभावकों ने पिछले सत्र की फीस भी जमा नहीं करवाई है। निजी शिक्षण संस्थान भामाशाहों की कृपा पर नहीं चलते हैं। इनकी फीस भी फीस निर्धारण कमेटी द्वारा तय की गई होती है। सारी जानकारी हासिल करने के पश्चात ही अभिभावक स्वेच्छा से अपने बालक/बालिकाओं को निजी विद्यालयों में पढने के लिए भेजते हैं।
लोकलुभावन सरकारी योजनाओं, सरकारी संरक्षण, फ्री किताबों, मुफ्त भोजन और उच्च वेतनभोगी योग्यतम अध्यापकों की सेवा के बावजूद, सरकारी विद्यालय कर्तव्यनिष्ठ निजी शिक्षण संस्थाओं के प्रभाव को कम नहीं कर पाए है। कटु सत्य तो यह है कि अपनी पैठ खो चुकी सरकारी स्कूलों का अस्तित्व बचाने के लिए प्राईवेट शिक्षण संस्थाओं को दबा कर, उनका गला घोंटने का इस कोविड-19 ने सरकार को अच्छा अवसर दिया है। आपदा को अवसर में बदलना तो राजनेताओं के लिए बाएं हाथ का खेल है।
