शूरवीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप

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शूरवीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप

डॉं. श्रीमती बसन्ती हर्ष

प्रधान सम्पादक

पुष्करणा सन्देश

मासिक पत्रिका

अतीत की भारत भूमि में

वीरों की स्वर्णिम कहानी है

राजपूताने के इतिहास में

प्रताप का नहीं कोई सानी है

प्रातः स्मरणीय और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का नाम राजपूताने के इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व गौरवस्पद है । सच पूछा जाये तो राजपूताने के शौर्यमय इतिहास को इतना गौरवमय और उज्ज्वल बनाने का श्रेय महाराणा प्रताप और भक्तिमती मीरा को ही जाता है। महाराणा प्रताप स्वतन्त्रता के पुजारी, रण में कुशल, स्वार्थ त्यागी, स्वदेशाभिमानी, सच्चे क्षत्रिय, उदार, वीर और एक अच्छे कवि भी थे । उनका आदर्श था कि बप्पा रावल का वंशज किसी के आगे सिर नहीं -झुकायेगा । स्वदेश प्रेम और स्वतन्त्रता उनके मूल मन्त्र थे। उनको अपने वीर पूर्वजों पर गर्व था। उल्लेखनीय है कि अकबर जैसे सम्राट ने महाराणा प्रताप से लोहा लेने के लिए अपने सम्पूर्ण साम्राज्य का बुद्धिबल, बाहुबल और जनबल लगा दिया था लेकिन वह असफल रहा।

अपने छोटे से राज्य के बल पर राणा प्रताप अकबर जैसे ऐश्वर्य सम्पन्न सम्राट को वर्षों तक हैरान करता रहा और फिर भी उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की। वह केवल वीर और रणकुशल ही नहीं था अपितु धर्म के महत्व को समझने वाला सच्चा क्षत्रिय था।

प्रलोभन देकर राजपूत राजाओं और सरदारों को सेवक बनाने वाली अकबर की कूटनीति का कोई प्रत्युत्तर था तो वह केवल महाराणा प्रताप और उनका स्वातन्त्र्य बोध था । जिस समय बहुत से राजपूत सरदार अकबर के सहायक व सेवक बने हुए थे उस समय यदि महाराणा चाहते तो वह भी अकबर की अधीनता स्वीकार करके आराम और चैन से रह सकते थे, किन्तु वह स्वतन्त्रता के पुजारी अपने थोड़े से कर्त्तव्यपरायण, शस्त्र निर्माता और आन के धनी गाडोलिया लुहारों को लेकर कटिबद्ध थे। उनकी वीरता, रण-कुशलता, कष्ट-सहिष्णुता और नीतिमत्ता अत्यन्त प्रशंसनीय व अनुकरणीय थी।

सन् 1527 में महाराणा सांगा की हार, 1556 में हेमचन्द्र विक्रमादित्य की हार तथा 1565 में विजयनगर साम्राज्य के पराभव के बाद भारत पर फिर से पराधीनता का काला साया मंडराने लगा। पानीपत के दूसरे युद्ध में हेमू को हराने के बाद मुगल सम्राट अकबर ने कूटनीति, चतुराई तथा छल – कपट से अपने राज्य का विस्तार प्रारम्भ किया था । धीरे – धीरे अकबर ने साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति का आश्रय लेकर कुछ ऐसा सिक्का जमा लिया कि भारतीय राजा एक एक कर अकबर की अधीनता स्वीकार करने लगे और अकबर को सर्वषक्तिमान व अजेय माना जाने लगा । जिससे समाज में चारों ओर गहरी निराशा का भाव व्याप्त हो गया। ऐसी स्थिति से समाज को निकालकर फिर से राष्ट्र जीवन में चैतन्य भरने का महत्वपूर्ण कार्य महाराणा प्रताप ने ही किया । जैसा कि किसी कवि ने लिखा है –

यह प्रबल प्रलय की आग बना

जय जय शिवशंकर बोल उठा

हल चल फैली बैरी दल में

अकबर का आसन डोल उठा

हल्दीघाटी में मुगल सेना की दुर्गति होने का समाचार पूरे देश में बिजली की तरह फैल गया। इसी के साथ अकबर के अपराजेय होने का भ्रम भी टूट गया। महाराणा के शौर्य बल के कारण देश के जनमानस में स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने का साहस जगने लगा। उसके बाद महाराणा प्रताप के संघर्ष और चित्तौड़ को छोड़ सारा मेवाड़ फिर से जीत लेने से समाज में व्याप्त हताशा दूर हो गई । इस प्रकार अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी राष्ट्र का स्वाभिमान, गौरव तथा आत्म विश्वास बनाये रखकर प्रताप पूरे राष्ट्र की जिजीविशा और जीवटता के प्रतीक बन गये।

प्रताप के संघर्षमय जीवन में एक महानायक के सभी गुण श्रेष्ठ रूप में प्रकट हुए। जब किसी राष्ट्र के इतिहास में स्वतन्त्रता, स्वावलम्बन तथा संस्कृति पर खतरा मंडराने लगता है, राष्ट्रीय जीवन में हताशा व निराशा आने लगती है तब कोई महापुरुष राष्ट्र जीवन में व्याप्त उन संकटों को दूर करने में अवतारी कार्य करके युगों – युगों तक प्रेरणाप्रद व अनुकरणीय हो जाते हैं। महाराणा प्रताप की भूमिका भी इसी प्रकार की कही जा सकती है। जिसने मुगल शासक के चंगुल से सभी को मुक्ति दिलाई। आजादी की लड़ाई को उन्होंने सामान्य जन की लड़ाई बना दिया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अति प्राचीनकाल से आसुरी शक्तियों को पराजित करने वाले हमारे देश के महापुरूषों ने सामान्य जनता विशेषकर पिछड़े कहे जाने वाले लोगों को संगठित कर अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त की। जिस प्रकार श्री राम ने वनवासी वानर जाति को श्री कृष्ण ने ग्वालों को तथा छत्रपति शिवाजी ने मावलों को अपने संघ में सहयोग के लिए जोड़ा। उसी प्रकार महाराणा प्रताप ने वनवासी भीलों को अपना सहयोगी बनाया। प्रताप ने चित्तौडगढ़ की तलहटी के गांव में निवास के अपने लगभग दस वर्षों के समय में अधि कांश समय भीलों के साथ व्यतीत किया।

भीलों की प्रताप से अत्यधिक निकटता के कारण वह मात्र महाराणा उदयसिंह का पुत्र व मेवाड़ का राजकुमार न रहकर प्रतयेक भील परिवार का पुत्र व मेवाड़ के व्यापक भील समुदाय का राजकुमार बन गया। यही कारण था कि कठिनाई के समय प्रताप को मेवाड़ का व्यापक समर्थन व जनता का पूर्ण सहयोग मिला। अकबर की लाख कोशिशों के बावजूद प्रताप पूर्णतया सुरक्षित व साधन सम्पन्न रहे। यह प्रताप की संगठन कुशलता का ही परिणाम था कि मनुश्यों के साथ – साथ चेतक सदृश घोड़ा भी उनके कुशल नेतृत्व में अपनी स्वामिभक्ति के कारण इतिहास में अमर हो गया।

महाराणा प्रताप के अनेकानेक महान गुणों का थोडे से समय में पूरा वर्णन सम्भव नहीं है। बस इतना ही कहना होगा कि प्रताप अपने पुंजीभूत गुणों के कारण ही कवियों, लेखकों, इतिहास वेत्ताओं और जनश्रुतियों में महानायक हो गये। यही कारण था कि उनके समकालीन और परवर्ती कवियों व लेखकों ने अपनी – अपनी धारा में रचना करते हुए महाराणा प्रताप जैसे नायक को कभी विस्मृत नहीं किया।

ऐसे स्वाधीनता सूर्य और परम प्रतापी पुरू ष को कवि दुरासा आढ़ा के शब्दों द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित हैं।

अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा ।

पुन रासी परताप, सुजस न जासी सूरमा ।।

अर्थात् एक दिन अकबर चला जायेगा, दिल्ली पर दूसरों का शासन हो जायेगा, किन्तु हे पुण्य राशि प्रताप! तुम्हारा यश कभी नहीं जायेगा।

अन्त में यही कहना है कि –

महाराणा प्रताप का प्रताप

उनकी आन बान व शान

देश प्रेम व स्वाभिमान

स्मरण मात्र से करना पावन

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