स्वामी विवेकानंद का अध्यात्म और अद्वैतवाद

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 स्वामी विवेकानंद का अध्यात्म और अद्वैतवाद

 

डॉं. श्रीमती बसन्ती हर्ष

शोध निदेशक

मुख्य सम्पादक

पुष्करणा सन्देश मासिक पत्रिका

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
।।

 अर्थात् (श्री मद्भागवतगीता में श्री कृष्ण भगवान अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि) जब जब भी धर्म की ग्लानि अथवा पतन होने लगता है तब तब ही हे भारत (अर्जुन) धर्म के उत्थान के लिए मैं प्रत्येक युग में (बारम्बार) जन्म लेता हूँ।

स्वामी विवेकानन्द को भी यदि इसी प्रकार का अति मानव दिव्य पुरुष कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। सत्य द्रष्टा, वीर योद्धा तथा सन्यासी स्वामी विवेकानन्दजी के अद्भुत प्रयासों व क्रिया कलापों से न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के लिए मानो नये युग का सूत्रपात् हुआ।

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोतकाता के सिमुलिया मौहल्ले में प्रसिद्ध बैरिस्टर विश्व मोहन दत्त के घर हुआ। इनकी माता का नाम भुवनेश्वरी था । स्वामी विवेकानन्द का बचपन का नाम नरेन्द्र था । नरेन्द्र बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रवृति का था। किशोरावस्था में नरेन्द्र मेधावी, बलिष्ठ तथा निडर होने के साथ – साथ अपने साथियों के बीच नेता के रूप में सदैव सक्रिय रहे। महाविद्यालय में अध्ययन कर रहे नरेन्द्र नाथ की भेंट अपने भावी गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस देव से हुई। यहीं से नरेन्द्र नाथ के सोच – विचार व गतिविधियों का तरीका बदला तथा उनकी आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ हुई जो अनवरत आगे बढ़ती गई । नरेन्द्र नाथ रामकृष्ण परमहंस का सान्निध्य पाकर नरेन्द्र से नरैन बने तत्पश्चात् खेतड़ी के नरेश राजा अजीतसिंह ने उन्हें ‘स्वामी विवेकानन्द’ नाम दिया। बाद में इसी नाम से सुशोभित होते हुए उन्होंने समस्त जगत को विवेक और वैराग्य द्वारा स्थायी आनन्द प्राप्ति का सन्देश दिया।

स्वामीजी के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र की उन्नति या स्थायित्व का अलग – अलग तरीका व कार्यप्रणाली होती है, उसी के आधार पर अमुक राष्ट्र की प्रगति सम्भव है। धर्म के पुनरूत्थान हेतु आध्यात्मिक विकास ही हमारे देश की उन्नति हेतु आधारषिला है। अतः देश का अस्तित्व बचाये रखने तथा उसे उन्नति प्रदान करने के लिए धर्म रूपी मेरूदण्ड को सुदृढ़ रखना आवश्यक है। हमारे अन्तःकरण में विराजमान दिव्य गुणों को पहचान कर उनका विकास करना ही धर्म या कहें कि अध्यात्म की उन्नति हैं।

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्

नेमा विद्यतो भाति कुतोऽयमग्निः। (कठोपनिषद् 2/2/15)

वहां सूर्य प्रकाश नहीं करता, चन्द्र और सितारे भी वहां नहीं, ये बिजलियां भी वहां नहीं चमकती, फिर इस भौतिक अग्नि का तो कहना ही क्या है? कठोपनिषद् की इन दिव्य हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ को पढ़कर ऐसा प्रतीत होताहै कि हम एक ऐसे जगत में पहुंच गये हैं जो हमारे पास होते हुए भी मानो कालातीत हो। इसी महान भाव के साथ – साथ उसका अनुगामी एक और महान भाव है जिसे मानव जाति और भी आसान से प्राप्त कर सकती है एवं जो मनुष्य के दैनिक जीवन में अनुसरणीय होने के साथ – साथ मानव जीवन के प्रत्येक विभाग में प्रविश्ट कराया जा सकता है  वह क्रमशः पुष्ट होता आया है और परवर्ती युगों में पुराणों में और भी स्पष्ट भाषा में व्यक्त किया गया है । वह है भक्ति का आदर्श। भक्ति का बीज पहले से ही विद्यमान है। संहिताओं में भी इसका थोड़ा बहुत परिचय मिलता है, उससे अधिक विकास उपनिषदों में देखने में आता है।

उपरोक्त कथनोपकथन स्वामी विवेकानन्द द्वारा लाहौर में 9 नवम्बर 1987 में दिए गए भाषण का अंश है।

उन्होंने जीवन को उन्नत बनाने हेतु आध्यात्मवाद को महत्वपूर्ण माना । आध्यात्मवाद अथवा ईश्वर के प्रति आस्था या भक्ति हेतु हमें पुराणों को समझना नितान्त आवश्यक है, ऐसा उनका मत था। सभी पुराणों का आरम्भ से अन्त तक भलीभांति निरीक्षण करने पर हमें एक तत्व निश्चित और स्पष्ट रूप में दिखाई देता है ओर वह है अध्यात्मवाद। साधु, महात्मा और राजर्षियों के चरित्र का वर्णन करते हुए अध्यात्मवाद बारम्बार उल्लिखित, उदाहृत और आलोचित हुआ है। भक्ति के आदर्श के दृष्टान्तों को समझना ही समस्त पुराणों का प्रधान उद्देष्य जान पड़ता है। यह आदर्श साधारण मनुष्यों के लिए अधिक उपयोगी हैं।

ऐसे लोग विरले ही होंगे जिन्हें वेद – पुराणों का भरपूर ज्ञान हो। उसके तत्वों पर अमल करना तो और भी दूर की बात है। वस्तुतः एक वेदान्ती को सभी प्रकार के सांसारिक राग – द्वेष, लोभ – मोह आदि को छोडकर निर्भीक (अभीः) होना होगा। जो लोग सर्वत्र अनेकानेक विषयों में उलझे हुए हैं, नाना विषय भोगों के दासत्व के बन्धन में जकडे हुए हैं, वे मानसिक रूप से कितने दुर्बल होते जा रहे हैं, उसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है । ऐसे ही लोगों को हमारे पुराण या वेदान्त अध्यात्म का अत्यन्त मनोहारी सन्देश देते हैं। (विवेकानन्द साहित्य – पृष्ठ संख्या 278)

स्वामी विवेकानन्द ने वेदान्त का महत्व समझाते हए कहा कि इनमें उन लोगों के लिए सुकोमल और कवित्वमय भावों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । ध्रुव प्रहलाद तथा अन्यान्य सैकडो, हजारों सन्तों की अद्भुत और अनोखी जीवन कथाएं वर्णित की गई हैं। इन दृष्टान्तों का उद्देश्य यही है कि लोग उसी भक्ति का अपने – अपने जीवन में विकास करें। वस्तुतः वेदान्त की उपयोगिता प्रत्येक युग में रही है और भविष्य में भी चिरन्तन काल तक बनी रहेगी । केवल आवश्यकता है उसके भली भान्ति चिन्तन मनन की ।

स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार अन्य अनेक धर्मग्रन्थों में भी जन साधारण के लिए धर्म का मार्ग बताया गया, परन्तु वेदान्त या अद्वैत में बताये गये धर्मोपदेश अन्य धर्मों की अपेक्षा प्रशस्ततर, उन्नततर और सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त हैं। (विवेकानन्द साहित्य – पृष्ठ संख्या 279)। हमें अपने दैनिक जीवन में इसी भाव का अनुसरण करना होगा । जिससे भक्ति का वही भाव क्रमशः परिस्फुट होकर अन्त में प्रेम का सारभूत बन जाता है । हां, इसके लिए व्यक्तिगत स्वार्थ तथा जड वस्तुओं के प्रति अनुरक्ति से दूर होना होगा।

स्वामी जी ने अपने वक्तव्य में वेदों के बारे में बताया कि वेद अनादि व अनन्त है, वे ईश्वरीय ज्ञान राशि है, स्वतः प्रमाण है । वेद कभी लिखे नहीं गये, न कभी सृष्ट हुए। वे अनादिकाल से वर्तमान हैं । जैसे सृष्टि अनादि व अनन्त है वैसे ही ईश्वर का ज्ञान भी । यह ईश्वरीय ज्ञान ही वेद है । ‘विद्’ धातु का अर्थ है जानना । वेदान्त नामक ज्ञान राशि ऋृशि नामधारी पुरूशों के द्वारा आविष्कृत हुई है । वस्तुतः मन्त्रद्रष्टा वर्तमान भावराशि के द्रष्टा थे। ऋषिगण आध्यात्मिक आविष्कारक थे।

 यह वेद नामक ग्रन्थ राशि प्रधानतः दो भागो में विभक्त है- कर्मकाण्ड और ज्ञान काण्ड, संस्कार पक्ष और अध्यात्म पक्ष। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत साधारण व्यक्ति के कर्त्तव्य निहित है। जबकि दूसरा भाग ज्ञानकाण्ड हमारे धर्म का आध्यात्मिक अंश है जिसका नाम वेदान्त है अर्थात् वेदों का अन्तिम भाग, वेदों का चरम लक्ष्य। वेद ज्ञान के इस सार अंश का नाम है वेदान्त अथवा उपनिषद्। वस्तुतः उपनिषदों के ही बड़े बड़े आध्यात्मिक और दार्शनिक तत्व आज हमारे घरों में पूजा के प्रतीक रूप में परिवर्तित होकर विराजमान है। इस प्रकार आज हम जितने पूजा के प्रतीकों का व्यवहार करते आये हैं, वे सबके सब वेदान्त से आये हैं क्योंकि वेदान्त में उनका रूपक भाव से प्रयोग किया गया है फिर क्रमशः वे भाव जाति के मर्म स्थान में प्रवेषकर अन्त में पूजा के प्रतीकों के रूप में उसके दैनिक जीवन के अंग बन गये हैं। (विवेकानन्द साहित्य – पृष्ठ  संख्या 20)

स्वामी विवेकानन्द ने आध्यात्मिकता तथा ब्रह्मतत्व को जानने के लिए अपनी आत्मा के अनुसन्धान को महत्व दिया। वस्तुतः बाह्य जगत की घटनाएं उस सर्वातीत अनन्त सता के विषय में हमें कुछ नहीं बताती, केवल अन्तर्जगत् के अन्वेषण से ही उसका पता लग सकता है। डस परम सत्ता या कहें कि परमात्मा के भी हमारे शास्त्रों में दो रूप कहे गये हैं – सगुण और निर्गुण। सगुण ईश्वर के अर्थ से वह सर्वव्यापी है, संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कर्ता है। संसार का अनादि जनक तथा जननी है। जबकि निर्गुण ब्रह्म के लिये ये सभी विशेषण अतार्किक व अनावश्यक माने गये हैं।

वेदों में उसके लिए ‘सः’ शब्द का प्रयोग न करके उसके निर्गुण भाव को समझाने के लिए ‘तत्‘ शब्द द्वारा उसका निर्देश किया गया है। ‘सः’ शब्द कहने से वह व्यक्ति विशेष हो जाता तथा जीव जगत के साथ उसका पार्थक्य सूचित हो जाता है। इसलिए निर्गुण वाचक तत् शब्द का प्रयोग किया गया है और तत् शब्द से निर्गुण ब्रह्म का प्रचार हुआ है। इसी को अद्वैतवाद कहते हैं।

जब हम इस अनन्त और निर्गुण पुरुष से अपने को पृथक् सोचते हैं तब ही हमारे दुःख की उत्पत्ति होती है और इस निर्ववनीय निर्गुण सता के साथ अभेद ज्ञान ही मुक्ति है। निर्गुण ब्रह्मवाद की भावना से ही समस्त प्राणिजनों को आत्मवत् प्यार करने का सिद्धान्त प्रतिपादित होता है। इसका कारण यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकात्मकता व विश्व की एकता को अनुभव करने पर ही मनुष्य और इतर प्राणियों में कोई भेद नहीं रहता है। तब हमें यह बात समझ में आयेगी कि दूसरों को प्यार करना स्वयं को प्यार करना है व दूसरों को हानि पहुंचाना स्वयं का ही अहित है। उस निर्गुण ब्रह्म पर विश्वास कर सब प्रकार के कुसंस्कारों से मुक्त हो ‘मैं ही वह निर्गुण ब्रह्म हूँ इस ज्ञान के बल पर अपने पैरों पर खड़े होने से एक अद्भुत शक्ति का संचार हो जाता है । मनुष्य तब निर्भय होकर अपनी आत्मा में प्रतिश्ठित हो जाता हे जो असीम अनन्त अविनाशी है, जिसे कोई शस्त्र छेद नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।

स्वामीजी के अनुसार हमें इसी आत्मा पर विश्वास करना होगा, इसकी इच्छा से शक्ति प्राप्त होगी। हम जो सोचेंगे वही हो जायेंगे। यदि स्वयं को दुर्बल मानोगे तो दुर्बल और शक्तिशाली सोचोगे तो शक्तिशाली बन जाओगे। स्वयं अपवित्र सोचोगे तो अपवित्र तथा पवित्र सोचोगे तो पवित्र हो जाऐंगे। इससे हमें यही शिक्षा मिलती है कि हम अपने को कमजोर न मानकर वीर्यवान, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ मानें। हमारे अन्दर सम्पूर्ण ज्ञान, सारी शक्तियां, पूर्ण पवित्रता और स्वाधीनता के भाव विधमान है। फिर हम उन्हें जीवन में प्रकाषित क्यों नहीं कर सकते। यदि हम उन पर विश्वास करें तो उनका विकास अवष्यम्भावी है । निर्गुण ब्रह्म से हमें यही शिक्षा मिलती है। इसी प्रकार हमें अपने बच्चों को बाल्यकाल से ही निर्भीक व बलवान बनाना चाहिये। जिससे वे तेजस्वी हों तथा अपने ही पैरों पर खड़े हो सकें। साहसी, सहिष्णु व सर्वविजयी बन सकें। इसके लिए उन्हें सर्वप्रथम आत्मा की महिमा के बारे में ज्ञान प्रदान करना होगा। यह शिक्षा केवल वेदान्त द्वारा ही प्राप्त होगी। क्योंकि वेदान्त में ही वह महान् तत्व है जिससे सारे संसार के भावजगत् में क्रान्ति होगी और भौतिक जगत् के ज्ञान के साथ धर्म का सामंजस्य स्थापित होगा।

इस प्रकार से स्वामी विवेकानन्द ने द्वैत, विशिष्टाद्वैत, तथा अद्वैत मतों का वर्णन करके उनके सिद्धान्तों का समन्वय किया। उनके अनुसार उपर्युक्त सभी मतों में प्रत्येक मानो एक एक सोपान है – एक सोपान पर चढ़ने के बाद परवर्ती सोपान पर चढ़ना होता है। सबके अन्त में अद्वैतवाद की स्वाभाविक परिणति है और अन्तिम सोपान है – तत्वमसि। स्वामी जी ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि वर्तमान भारत में धर्म का मूल तत्व नहीं रह गया है। सिर्फ थोड़े बाह्य अनुष्ठान मात्र रह गये हैं। भारतवासी इस समय न तो हिन्दू हैं और व वेदान्ती हो। वे केवल छूआछूत मत के पोषक हैं इस स्थिति का अन्त होना ही चाहिये और जितना शीघ्र इसका अन्त हो, उतना ही धर्म के लिए अच्छा है। स्वामीजी के अनुसार बहुत्व में एकत्व की खोज को ही ज्ञान कहते हैं और किसी विज्ञान का चरम उत्कर्ष तब माना जाता है जब सारे अनेकत्व में एकत्व का अनुसन्धान पूरा हो जाता है। यह नियम भौतिक विज्ञान तथा आध्यात्मिक विज्ञान दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

कहने का सार यही है कि यदि ईश्वर को पाना चाहते हो तो काम कांचन का त्याग करना होगा । यह संसार असार, मायामय और मिथ्या है। लाख यत्न करो, पर इसे छोड़े  बिना कदापि ईश्वर को नहीं पा सकते। जो ब्रह्म को भली भान्ति जान चुका है, अर्थात् जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, जिसके लिए ईश्वर करतलामकवत् है – श्रुति का कहना है कि वही गुरू होने योग्य है। जब यह आध्यातिमक संयोग स्थापित होता है, तब ईश्वर का साक्षात्कार होता है – तब ईश्वर दृष्टि सुलभ होती है। गीता भी यही भाव व्यक्त किया गया है कि –

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।5.19।।

अर्थात् जिनका मन इस साम्य भाव में अवस्थित हे, जिन्होंने इस जीवन में ही संसार पर विजय प्राप्त कर ली है। चूंकि ब्रह्म निर्दोष और सबके लिए सम है, इसलिए वे ब्रह्म में अवस्थित हैं।

 इति शुभम् ।

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