Mon. Aug 31st, 2026

मधुबाला शर्मा

सदस्य, अखिल विश्व गायत्री परिवार

बीकानेर

होली त्योहारों की भारतीय परंपरा में हर्षोल्लास का सर्वोपरि पर्व है। यह वसंत ऋतु का यवन काल है। इस समय वनश्री के साथ.साथ खेतों की श्री एवं हमारे तन मन की श्री भी फागुन के ढलते ढलते संपूर्ण समृद्धि की आभा के साथ खिल उठती है। फागुन के सूरज की उष्मा का सुंदर चित्रण करते हुए कविंद्र रविंद्र नाथ कहते हैं-

सहस्त्र सहस्त्र मधु मादक

स्पर्शो से आलिंगन कर रही

सूरज की इन किरणों ने

फागुन के वासंती प्रातः

को सुगंधित स्वर्ण में

आह्लादित कर दिया है।

होली का आनंदोल्लास जाति, वर्ग, वर्ण के समस्त भेदों को समतल करता हुआ जन.गण.मन में प्रवाहित होता है। तभी सिस्टर निवेदिता के यह शब्द याद आते हैं- ‘होली भारतीयों के ह्रदय को आनंद की अभिव्यक्ति में उजागर करने वाला संसार का अद्वितीय त्यौहार है।‘

     होली का नामकरण हमारी संस्कृति की पुरातन यज्ञीय परंपरा से जुड़ा है। नवान्न की बालियों को प्रज्वलित अग्नि में भूनने की प्रथा के कारण ही इस त्यौहार का नाम होली पड़ा। अनाज की बालियों को संस्कृत में होला कहते हैं। तिनको की अग्नि में भुने हुए अधपके फली वाले अन्न को होलक कहते हैं। होलिका शब्द की व्युत्पत्ति इसी शब्द से हुए हैं। देश के कई भागों में आज भी चने की सिकी बालियों को होला कहा जाता है। यह पर्व अन्न को संस्कारित करके ग्रहण करने के उच्च आदर्श को स्वयं में समेटे हुए है।

     होली का नैसर्गिक संबंध ऋतु परिवर्तन के साथ तो है ही और होलिका दहन से नृसिंह प्रकटीकरण की पौराणिक कथा भी जुड़ी है। इसी दिन आसुरी दम्भ एवं आतंक के पर्याय हिरण्यकश्यपु एवं उसकी बहन होलिका के विनाश तथा भक्त प्रहलाद की अटूट भक्ति एवं सदाशयता की विजय का प्रसंग आता है, जो इस पुनीत पर्व को नूतन प्रेरणा से समृद्धि और संपन्न बनाता है।

     आज चतुर होलिका अपने दलबल के साथ हम सबके प्रहलाद पराक्रम के अभाव में सफल है। सवाल है. हमसे आखिर कहां खो गई वह भावना? कहां विस्मृत हो गई वह निष्ठा? कहां खो गई समरसता? होली में हर साल विभिन्न रंगों से गुलालों से घर-आंगन, चौबारे, गलियारों को रंगते चले आ रहे हैं। जड़ दीवारें भीगती हैं, कपड़े रंगीन होते हैं, तन रंगता है किंतु मन नहीं भीगता। मन संवेदनाओं के अभाव में छूंछा ही रह जाता है, पवित्रता की लहरें नहीं उठती।

आज होली है परंतु ना तो उसमें पवित्रता का रंग है और ना पुरुषार्थ की उमंग है। आज तो बस होलिका का कुचक्र और दमित वासनाओं का उफान है। परमार्थ के स्थान पर स्वार्थ और अहम रूपी तमस से यह रंग बदरंग हो चला है। इसी के छींटे हैं जो भ्रष्टाचार, व्यभिचार आदि दुर्गुणों और दुर्व्यसनों के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं। असहनशील और असहिष्णु मन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है। हम ही ने जब अपने अंदर भेद की दीवारें खड़ी कर दी है तो सामाजिक समरसता और सद्भाव के सुंदर रंग कैसे बिखरेंगे? हमने ही तो जाति, धर्म, संप्रदाय और वर्ग में लोगों को विभाजित और विखंडित कर दिया है।

आज हम पर्व से जुड़ी मूल भावनाओं को भुला बैठे हैं। तभी तो रंगों की सतरंगी उल्लासमय छटा बिखेरने की अपेक्षा हम एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और होली के रंग में भंग डाल कर इसको अरुचि, अवसाद, बैर और वैमनस्य से पूर्ण बना देते हैं। जो सहज ही अंतर के उल्लास और उमंग का पर्व है इसे अश्लील, c, कुत्सित चेष्टाओं और स्वच्छंद अभिव्यक्ति से प्रकट किया जा रहा है। मूल्य निष्ण के नाम पर अप संस्कृति का नग्न नर्तन देखा जा सकता है। आज यह भोगवादी संस्कृति के नशे में आत्मा विस्मरण और पतन उन्मुख वृत्तियों के पोषण का पर्व बनता जा रहा है। यह आत्मघाती वृत्तियां आज संपूर्ण राष्ट्र के लिए घातक है।

हम सघन संवेदना और प्रचंड पराक्रम के रंगों से ऐसी होली खेले कि नफरत की होलिका अपने ही षड्यंत्र में फंस-जलकर राख हो जाए और भय तथा आतंक को फैलाने वाले हिरण्यकश्यपु की छाती खुद ही भय से फट जाए। हमें संकल्पित होकर द्वेष, दुर्भाग्य और वैमनस्य की कालिमां को धोकर अपने अंतर में स्नेह, सद्भाव को बटोर कर इस पर्व को उल्लास और गरिमा से मनाना होगा। तभी हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में एकता समरसता का सुनहरी सूर्योदय होगा।

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