महात्मा गांधी का दर्शन एक व्यक्ति के सफल जीवन का मूल मंत्र हैं। उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व व्यक्ति को जीने की सही राह दिखाता है। गांधी जी ने समय समय पर अपने जो विचार दिए वो आज भी प्रासंगिक एवं व्यक्ति के जीवन प्रबंध के विविध आयाम बताने वाले हैं।
महात्मा गांधी कहते थे “किसी भी व्यक्ति के विचार ही सब कुछ हैं। वह जो सोचता है, वह बन जाता है।” इसका मतलब साफ है व्यक्ति के विचार उसके सोचने समझने की दिशा निर्धारित करते हैं। जो व्यक्ति जिस दिशा में सोचता है वह उसी राह पर चल पड़ता है। गांधीजी मूल रूप से अहिंसावादी थे, ये विचार उनके जीवन का अभिन्न अंग बने रहे। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने अहिंसा की राह को नहीं छोड़ा। यही अहिँसात्मक आंदोलन ही देश के स्वधीनता संग्राम का आधार बना और इसी आन्दोलन के बलबूते पर देश को स्वधीनता मिली। व्यक्ति को अपने जीवन में आज भी इस आचरण की आवश्यकता है।
गांधीजी ने व्यक्ति को सफल और सार्थक जीवन हेतु एक और मंत्र दिया। उनका कहना था कि “इस तरह से जियें जैसे आप कल मरने वाले हैं। इस तरह से सीखें जैसे आप वर्षों जीवित रहने वाले हैं।”
इस मंत्र से यह बात साफ है कि व्यक्ति आज के काम को कल पर न टाले। कल किसने देखा है इसलिए आज का काम आज ही कर लिया जाय। आज जितनी खुशी बांटनी है बांट लो। इसके साथ ही व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया में उत्साह और उमंग बनी रहे इस दृष्टि से सीखते समय व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि उसके द्वारा सीखा हुआ काम न केवल खुद के लिए वरन अन्य सभी के लिए वर्षों तक उपयोगी बना रहेगा।
“कमज़ोर कभी क्षमा नहीं कर सकते, क्षमा तो ताकतवर व्यक्ति की विशेषता है।” महात्मा गांधी का यह कथन हमारे प्राचीन नीति वाक्य के रूप में प्रचलित “क्षमा वीरस्य भूषणम” पर आधारित है इसकी मूल भावना यह है कि व्यक्ति में क्षमाशीलता का गुण होना नितांत आवश्यक है। इस गुण के बिना व्यक्ति को पग पग पर तनाव और बेचैनी का सामना करना पड़ सकता है। दूसरों की गलती को माफ करके उसको सुधरने का अवसर देना उसको नया जीवन देने के समान है। गांधीजी के इस विचार में व्यक्ति को सुधारने की भावना निहित है इसका यह कतई आशय नहीं है क्षमा करने वाला व्यक्ति कमजोर है, उसकी प्रतिरोध की क्षमता नहीं है।
महात्मा गांधी मन की सुंदरता और कोमलता को बहुत महत्व देते थे वो कहते थे कि “मेरा मन मेरा मंदिर हैं; मैं किसी को भी अपने गंदे पाँव के साथ मेरे मन से नहीं गुजरने दूंगा।” उनके इस कथन में मानव मन और हृदय की निर्मलता और कोमलता का भाव विद्यमान है। उनका यह भी मानना था कि कोई भी व्यक्ति अपने बुरे विचारों और भावनाओं के द्वारा किसी दूसरे के मन मन्दिर को प्रभावित नहीं कर सकता। जो व्यक्ति बुरे विचारों से उसके मन को प्रभावित करने का प्रयास करता है तो उसको अपने सद्विचारों से प्रभावित कर देना चाहिए। महात्मा गांधी में दूसरों को प्रभावित करने की असीम शक्ति निहित थी तभी तो पूरा देश उनके द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों का हिस्सा बन जाता था। आज भी कोई भी व्यक्ति इन विचारों का अनुसरण करें तो उसमें बुरे विचार न तो आयेंगे और न ही दूसरों के बुरे विचारों को वह अपने भीतर प्रवेश करने देगा।
गांधीजी जीवन में सफलता का मूल आधार बताते हुए लिखते हैं, “प्रयास करने में ही संतोष निहित है, प्राप्ति में नहीं। आपका पूर्ण प्रयास ही आपकी पूर्ण विजय है।”
गांधीजी का यह भी मानना था कि व्यक्ति को जो लक्ष्य प्राप्त करना है ऊसके लिए निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए। प्रयास ही सफलता का मार्ग है। बहु प्रचलित “प्रयास और भूल” की मान्यता में भी महात्मा जी का यह मूल मंत्र निहित है। उनका मानना था कि व्यक्ति जब किसी कार्य को करेगा तो गलती होने की संभावना बराबर बनी रहेगी। गलती गुरु है, हर गलती कुछ सिखा कर जाती है। उनका संदेश था कि गलती होने पर प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए गलती से सबक लेकर दुबारा पूरे जोश और उत्साह से कार्य करना चाहिए। निरन्तर प्रयास सफलता का मूल आधार है। यह मंत्र व्यक्ति के जीवन में हर कदम में सफलता सुनिश्चित करता है।
“आप भी अपने आप में वह परिवर्तन लाएं जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” गांधीजी का यह विचार व्यक्ति के जीवन को नई दिशा दे सकता है।एक व्यक्ति दूसरों को अपनी इच्छा के अनुरूप ढालने का प्रयास करे और खुद जैसा है वैसा बना ही बना रहे तो वह कभी सफल नहीं हो सकता।
यदि व्यक्ति दूसरों को परिवर्तित करना चाहता है तो पहले उसको खुद में झांक कर देखना चाहिए और यह सोचना करने कि मैं जिस तरह का व्यवहार चाहता हूँ क्या मैं खुद उस तरह से करता हूँ। क्या मैं दूसरे में जो परिवर्तन चाहता हूँ वह मैंने खुद में किया है या नहीं। स्वयं में परिवर्तन लाये बिना दूसरों को परिवर्तित करने की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
महात्मा गांधी परिवार को एक पाठशाला के रूप में मानते थे उनका विचार था कि “एक सभ्य और आदर्श परिवार से बढ़कर कोई विद्यालय नहीं है और एक भले अभिभावक जैसा कोई अन्य शिक्षक नहीं है।” परिवार द्वारा किया गया लालन पालन और मिला परिवेश व्यक्ति के व्यक्तित्व को गढ़ने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। बच्चा अपने अभिभावकों के आचारण और व्यवहार से बहुत कुछ सीखता है और खुद को उसके अनुरूप ढालता है। इस स्थिति में परिवार के अभिभावकों का यह दायित्व हो जाता है कि वे एक आदर्श गुरु की भूमिका का निर्वाह करें। बच्चों को अच्छे बुरे का भान करवाये। उनको घर परिवार और समाज में जिस तरह का व्यवहार करना चाहिए उस तरह का मार्गदर्शन समयानुरूप निरन्तर करते रहना चाहिए। परिवार उसकी वह पहली पाठशाला है जो उसके सफल जीवन की नींव रखती है।
“पैसा कोई बुराई नहीं है, उसका गलत प्रयोग करना बुराई है। किसी न किसी रूप में पैसे की हमेशा जरूरत रहेगी।” महात्मा गांधी का यह कथन इस बात को इंगित करता है कि पैसा अपने आप में कोई बुराई नहीं है। उनका मानना था कि धन कमाने के साधन पवित्र होने चाहिए साथ ही साध्य अर्थात जिस उद्धेश्य हेतु पैसा खर्च किया जा रहा है वह उद्देश्य भी पवित्र होना चाहिए। गलत तरीके से धन की प्राप्ति और उसका गलत कार्यों में उपयोग गांधीजी की दृष्टि में उपयुक्त नहीं है। यह बात आज भी पूरी तरह से प्रासंगिक है यह माना जाता है कि गलत तरीके से प्राप्त धन स्वतः ही गलत राह में खर्च हो जाता है।
सत्य और असत्य के मामले में गांधीजी के विचार एकदम स्पस्ट थे उनका मानना था कि “आप असत्य को कितना भी बढ़ा चढ़ा कर बोलें, वो सत्य नहीं बन जाता। इसी तरह सत्य भी असत्य नहीं बनता।” यह सूत्र वाक्य व्यक्ति को सत्य और असत्य की पहचान करने में सहायता करता है और उसें जीवन में सच्चाई की राह पर चलने हेतु प्रेरित करता है।
व्यक्ति से गलती होती रहती है। उसको अपनी गलती को स्वीकार करने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए उनका कहना था कि “अपनी गलती को स्वीकार करना झाड़ू लगाने के समान है जो सतह को चमकदार और साफ़ कर देती है।”
गांधीजी का मानना था व्यक्ति को फल की कामना के बिना निरन्तर कर्मकरते रहना चाहिए। उनका यह विचार श्रीमद्भगवत गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक 47 पर आधारित है जिसमें कहा गया है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
इसका आशय है व्यक्ति का कर्म करने का ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए व्यक्ति को फल की दृष्टि से कर्म नहीं करना चाहिए। यह बात व्यक्ति को बहुत सी अपेक्षाओं से मुक्त कर सकती है।
महात्मा गांधी अपने कार्यों और व्यवहार से बहुत कुछ इस तरह की बातें कह देते थे या ऐसा आचरण कर दिया करते थे जो एक व्यक्ति के जीवन प्रबध की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता था। उनके जीवन से आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।