‘नव-संवत्सर’ मंगलमय हो

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‘नव-संवत्सर’ मंगलमय हो

डॉ. (श्रीमती) बसन्ती हर्ष

मानद् शोध निदेशक

श्री शार्दूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्रयूट

बीकानेर

शीत ऋतु को देकर विदाई

नव संवत्सर ने की अगुवाई

नूतन शुभ्र ज्योति किरणों से

सृष्टि की बगिया मुस्काई

भारत देश में वर्ष पर्यन्त अनेकानेक पर्व मनाये जाते हैं। सभी पर्वो की अपनी-अपनी विषेशताएं होती हैं जो कई प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। सर्दी, गर्मी व वर्षा ऋतु इन तीनों ऋतुओं के अन्तर्गत आने वाले पर्व व त्यौहारों में विभिन्न प्रकार की संवेदनाएं व प्रतिक्रियाएं मानव मन को विभिन्न तरीकों से उद्वेलित करके कार्य करने को प्रेरित करती हैं। परिवर्तन धर्मा इन ऋतुओं में ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भिक समय में ‘नव-संवत्सर’ पर्व मनाया जाता है जो हिन्दू तिथि गणना के अनुसार नये साल का पहला दिन होता है। इसी ‘नव-संवत्सर’ के बारे में कुछ विचार हो जाये।

     विगत वर्ष की पुरानी यादें इतिहास के पन्नों में सिमट चुकी हैं। नए उत्साह और उल्लास के साथ नवजीवन का संदेश देने वाले नूतन वर्ष के उपलक्ष में आप सबका हार्दिक अभिनन्दन हैं। भारतीय संस्कृति में वर्ष का शुभारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता हैं। जब अन्धियारी, काली अमावस्या की रात्रि की समाप्ति के साथ-साथ वर्ष का समापन होता है  तथा नव प्रभात का सूर्य अपनी नवीन रश्मियों से हमारे जीवन को अद्भुत शक्ति व स्फूर्ति से भर देता  है। शुक्ल पक्ष की धवल चांदनी मानो अमृत वर्षा के द्वारा शरीर को एक विशिष्ट उमंग प्रदान करती हैं। इसी दिन को ‘नव-संवत्सर’ के नाम से पुकारा जाता है। संवत्सर 360 अहोरात्र का होता है। इसे सन् संवत् आदि नामों से भी पुकारा जा सकता है। होरा से लेकर दिवस, मास की वर्ष पर्यन्त गणना से संवत्सर बनता है। इसी से किसी भी देश की प्राचीनता की जानकारी मिलती है। साथ ही उससे अमुक समय में अमुक देश या स्थान की सभ्यता व संस्कृति की उन्नति या अवनति की भी जानकारी मिलती है। इतिहास पर दृ ष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि हमारे देश में संवत् का प्रयोग सृष्टि के प्रारम्भ से ही हो गया था। अतः सत्ययुग में ब्रह्म संवत्, त्रेता युग में वामन संवत्, द्वापर युग में कृष्ण संवत् तथा कलियुग में विक्रमादित्य राजा के नाम से विक्रम सम्वत् का प्रचलन हुआ। 2 अप्रेल 2022 से हम विक्रम संवत के 2079 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। देश भर में नूतन वर्ष के उपलक्ष में किसी न किसी रूप में अनेकानेक मनोहारी परम्पराओं का आयोजन होता रहता है। इन परम्पराओं में मुख्य ऋतु परिवर्तन, नई फसल का पकना, सगाई, विवाह, गौना सन्तानोत्पति आदि प्रमुख हैं। ऐसे आनन्ददायक अवसरों पर सामूहिक आनन्द और उल्लास नृत्य, गीत, भजन आदि के रूप में फूट पड़ता है।

     हमारे देश में नव संवत्सर का महत्व प्राचीनकाल से रहा हैं । ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आज ही के दिन नवरात्रि की स्थापना हुई, जिसमें जगज्जननी देवी शक्ति की पूजा का विधान है। इसी दिन भगवान श्री रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक किया गया । साथ ही महर्षि गौतम का जन्म, संत झूलेलाल का जन्मदिवस, डॉं. हेडगेवार का जन्म दिवस, आर्य समाज की स्थापना दिवस, षकारि विक्रमादित्य का विजय दिवस, सिक्खों के द्वितीय गुरू अंगददेव का जन्म चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को ही हुआ था ।

     आज नये वर्ष के दिन हम उन सभी महान् विभूतियों का पावन स्मरण करें जो हमारे देश के नव जागरण व पुनरूत्थान में सदैव सक्रिय रहे। साथ ही उन पुण्यात्माओं द्वारा स्थापित राष्ट्रभक्ति, अनुशासन व कर्त्तव्य निष्ठा को प्रस्थापित करने हेतु उन सांस्कृतिक मूल्यो को पुनः अपने जीवन में आत्मसात् करें ।

     परन्तु खेद का विषय है कि आज हम ईसवी सन् का जितना स्वागत करते हैं, उतना हर्षोल्लास विक्रमी सम्वत् पर दिखाई नहीं  पड़ता। जहां तक मेरा विचार है कि इसका प्रमुख कारण है कि आज भारत को विदेशी शक्तियों से स्वतन्त्र होने के 74 वर्षों के बाद भी हम उनकी गुलामी के पाश से बंधे हुए हैं। कहने को तो आज हम स्वतन्त्र हैं, परन्तु केवल शारीरिक रूप से ही। मानसिक रूप से अंग्रेजों की दासता की जड़ें हमारे देश में इतनी गहरी हैं कि हम उनसे जल्दी से छुटकारा नहीं पा सकते हैं। पाश्चात्य अन्धानुकरण के कारण 31 दिसम्बर के दिन हम धूमधाम व शोर शराबा करके, नये वर्ष 1 जनवरी का अभिनन्दन करते हैं। यह भौतिक विलासिता तथा उन्मुक्त स्वच्छन्दता क्या भारतीय संस्कारो के अनुरूप है? कदापि नहीं।

     हमारे यहां पर नव-संवत्सर का भी स्वागत तो होता है, परन्तु उसका तरीका भिन्न है। जैसे नवरात्रि प्रारम्भ होते ही विभिन्न सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान तथा मन्दिरों में पूजा अर्चना आदि की जाती है जिससे परस्पर सौम्यता, सहिष्णुता, कलात्मकता तथा सामाजिकता का विकास होता हैं । भारतीय संस्कृति को पुनः विकासोन्मुख करने हेतु इस प्रकार की आध्यात्मिक व सामाजिक व्यवस्था अवश्यम्भावी है।

     हम सब मिलकर सक्रिय भागीदारी द्वारा नूतन  वर्ष के अन्तर्गत समाज में व्याप्त कलुशित प्रवृतियों को मिटाकर सहजता, सरलता तथा सजगता रूपी गुणों को स्थापित करें तभी राष्ट्र के प्रति निष्ठा व कर्त्तव्य परायणता की भावना जागृति होगी । इसी में समस्त मानव मात्र का हित निहित है।

     प्रतिवर्ष पदार्पण करने वाले नव संवत्सर की सुखद संवेदना प्रापत करने तथा प्रतिक्रियाओं में आत्मसात् होने के लिए हमें निरन्तर कर्म में लगे रहना होगा । नवरात्रि पर भगवती दुर्गा की पूजा आराधना के द्वारा सामाजिक व आध्यात्मिक भावनाओं को प्रेरित करना ही इस पर्व का सही मूल्यांकन है । इससे सामूहिकता के संस्कार तो प्रशस्त होंगे ही साथ ही यह चित्त विशोधन करने वाला पर्व है जो निश्चय ही सामाजिक उन्नति का कारक बन सकता है। आइये हम सभी मिल जुलकर हर्षोल्लास पूर्वक ‘नव संवत्सर’ पर्व मनाएं । नया साल हम सभी के लिए मंगलदायी रहे, यही शुभकामना है ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।। 

 

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