Tue. Sep 1st, 2026

डॉ अभय सिंह टाक

Dr. Abhaya Singh Tak

यह कितना उत्साहजनक है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, भारत आजादी के 73 साल पूरे कर रहा है। किंतु समय की विडंबना देखिए कि लोगों द्वारा लोगों के लिए निर्वाचित सरकार एक मजाक बनकर रह गई है। तथाकथित सामाजिक सेवकों ने व्यवस्था का मखौल बना दिया है। निर्वाचित जन-प्रतिनिधि निरंकुश हो गए हैं। वर्तमान में भारतीय राजनीति इतिहास में अपने सबसे निचले स्तर पर है। राजनीतिक दल खुले तौर पर असामाजिक तत्वों को शरण देते हैं जो बहुउद्देशीय लाभ हासिल करने के लिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। संभवतः सत्ता की प्यास नए भारत के निर्माताओं को अनीतिपूर्ण समझौते करने के लिए मजबूर करती है। यदि यह इतिहास की पुनरावृति है तो फिर हमने इतिहास से सीखा क्या? फिर किस राम-राज्य की अपेक्षा क्या की जाए और फिर किससे की जाए?

जिस दिशा में भारतीय राजनीति बढ़ती जा रही है, वह दिन दूर नहीं जब सुशासन अर्थात् गुड गवर्नेंस हमारे लिए एक सपना बनकर रह जाएगा। कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति ने भारतीय समाज के एक बहुत बड़े हिस्से में निराशा उपजाई है जिसे भाजपा असहिष्णुता के रूप में काट रही है। बड़ी संख्या में लोगों ने धर्मनिरपेक्षता के विचार को अस्वीकार करना दिखाना शुरू कर दिया है। वहीं विवेकपूर्ण विरोध करने वाले लोगों को असामाजिक माना जा रहा है। असहिष्णुता से असामाजिक तत्वों को अराजकता फैलाने का अवसर मिलता है। राष्ट्र में धार्मिक उन्माद पैदा हो सकता है।

हाल ही में एक वर्ग विशेष के नेता ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध जाकर जहर उगलती टिप्पणियां की हैं, सरकार को चाहिए कि ऐसे बयानों को राजद्रोह मानते हुए दोषी को तुरंत दण्डित किया जाए। संविधान का सम्मान ना कर पाने वाले व्यक्ति निश्चित रूप से किसी ठोस उपचार के अधिकारी हैं। ऐसे व्यक्तियों जिनकी आस्था राष्ट्र के संविधान में आस्था नहीं है और पड़ौस के किसी राष्ट्र विशेष में है और यदि वह पड़ौसी राष्ट्र भी उनको अपनी नागरिकता प्रदान करना चाहता है तो सरकार को उनके स्थाई प्रवजन की त्वरित व्यवस्था करनी चाहिए। इस राष्ट्र के संविधान का सम्मान ना कर पाने वाले व्यक्ति की इस राष्ट्र में आवश्यकता भी कहाँ है?

कोविड-19 महामारी पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था की चमक को चुरा चुकी है। बड़े पैमाने पर राजनीतिक अधिकारों के हनन और बढती बेरोजगारी के कारण देश में नैतिक पतन और नागरिक असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सर्व धर्म सद्भावना भारतीय संस्कृति का मूल है। राम-राज्य की स्थापना धर्मनिरपेक्षता के अभाव में संभव नहीं है। इस बात का सदैव ध्यान रहे कि अब कोई समाज विरोधी तत्व सीता की अग्नि परीक्षा का कारण ना बन पाए। विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले विभिन्न भारतीयों की राष्ट्र भक्ति में दोष देखना छद्म राष्ट्रवाद है। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास ही सुशासन है जिसकी कल्पना कभी बापू ने की थी।

स्वतंत्रता दिवस पर प्रत्येक भारतीय को हार्दिक बधाई।

जय हिंद।

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